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05.03.2012
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थप्पड़
सुमन कुमार घई

मलिक का जीवन भी कुछ सुगम होने लगा था। समय पर धुले इस्त्री किए हुए कपड़े मिलते, शाम को घर आते ही चाय और ढँग का खाना मिलता। यह जानते हुए भी कि यह सब पड़ोसन मौसी की शिक्षा का परिणाम है, मलिक को मालती का मौसी से मिलना जुलना पसन्द नहीं था। अजीबी शक्की आदमी था। सदा यही सोचता रहता कि मालती उसकी पीठ के पीछे न जाने क्या क्या मौसी को उसकी बातें बताती रहती होगी। धीरे-धीरे यह शक क्रोध का रूप लेने लगा। मौसी को वैसे ही मलिक की हरकतें, उसकी शादी के पहले से ही पसन्द नहीं थीं। दोनों ने ही अपने निजी वैमनस्य का हथियार मालती को बना लिया। मलिक मालती पर मौसी के साथ मिलने-जुलने के लिए बरसता तो उधर मौसी मलिक से बदला लेने के लिए मालती को उकसाती भड़काती रहती। चौधरी के हातेके अन्य परिवार या कुँवारे इस नित की उठा-पटक को मनोरंजन के रूप में देखते।

मलिक ने पुन: शराब पीकर देर से आना आरम्भ कर दिया। उसके लिए शादी पुरानी हो चुकी थी, सो जीवन का सामान्य गति पर आ जाना उसे तर्कसंगत ही लगता था या अपनी रुचियों की संगत बिठाने के लिए तर्क ढूँढ ही लेता। देर से यारों-दोस्तों के साथ बैठ कर दारू पीकर घर लौटना रोज का काम बन गया। मलिक को घर आते ही मालती और मौसी के सम्बन्ध अखरने लगते और ढँग-ढँग के बहाने ढूँढ कर मलिक मालती पर बरस पड़ता। धीरे-धीरे मालती ने भी अन्य पति-पीड़ित पत्नियों की तरह जीवन से समाझौता करना आरम्भ कर दिया। पहले की तरह अब वह मलिक से डाँट-फटकार खा कर रोती नहीं थी। मलिक की मार से बचने के ढंग भी वह धीरे-धीरे सीख गई। जिस दिन मलिक अधिक पीकर आता वह दिन मालती को अधिक भाता, क्योंकि उस दिन लाख चाहने पर भी मलिक उस पर निशाना नहीं साध पाता था। मालती मलिक के हर वार से बच निकलती और बौखला कर मलिक ठेकेदार चारपाई पर गिर पड़ता। उस दिन अगर मलिक घर आकर कुछ खाने की ज़िद्द भी करता तो मालती अपने पति को प्रसन्न करने का भी कोई प्रयत्न न करती। बस बात को टालने के लिए रसोई में जाकर बर्तन को उलटने पलटने लगती। रसोई से आने वाली बर्तनों की टंकार मलिक के लिए लोरी का काम करती और वह कहीं पर भी लुढ़क जाता। मालती पड़ोसन मौसी की सहायता से कई बार ज़मीन से उठा कर चारपाई पर भी डालती और दुखी होने की बजाय मौसी के साथ मिलकर मलिक की खिल्ली उड़ाती। इस तरह से एक तो मालती को अपने मन की भड़ास निकालने का अवसर मिल जाता और साथ ही साथ मौसी को प्रसन्न करने का भी। मौसी को लगता कि उसकी मलिक के खिलाफ दी जाने वाली शिक्षा का प्रभाव हो रहा है। अब तो कई बार मलिक के नशे के स्तर को ताड़ते हुए मालती उस पर बरस भी पड़ती। यह सब वह पड़ोसियों को सुनाने के लिए करती ताकि वह उसे उतनी असहाय न समझें जितनी की वह थी। मालती अब तक जान चुकी थी कि मलिक जैसे नशेड़ी व्यक्ति को रात की घटनाओं की सुबह तक कोई स्मृति नहीं रह पाती, सो वह अब कई बार मलिक को गालियाँ देने का दु:साहस कर चुकी थी। मालती जान गई थी कि अधिक नशे की हालत में मलिक अगर मारने के लिए आगे बढ़ेगा भी तो अपने ही क्रोध के कारण लड़खड़ा कर गिर जाएगा, उस तक पहुँच नहीं पाएगा।

मालती का बढ़ता हुआ साहस और मलिक की बिगड़ती हुई दशा किसी से भी छिपी नहीं थी- मलिक ठेकेदार के कमरे के ठीक सामने दूसरी मंजिल पर रहने वाले जसपाल सिंह की नज़र से भी। मालती की सुन्दरता, व्यर्थ जाते यौवन से लेकर रोज़ के झगड़े ने जसपाल के मन में मालती के प्रति प्रेम के बीज बो दिए थे। जसपाल बहुत ही भद्र नवयुवक था। मालती का विवाहित होना उसके लिए एक लक्ष्मण रेखा थी जिसे वह पार करने की सोच भी नहीं सकता था। जसपाल दोपहर के तीन-साढ़े तीन के करीब अपने काम पर जाता और रात ग्यारह के बाद घर लौटता। सुबह जब तक वह उठता तब तक चौधरी के हातेके मर्द अपने अपने कामों पर जा चुके होते। वह अकेला हो जाता। कोई मित्र नहीं सिवाय उसके रेडियो के, जिसपर वह हमेशा ऊँची आवाज़ में गाने सुनता। अगर कभी मलिक ठेकेदार दिन के समय घर रहता तो उसे जसपाल के रेडियो से भी परेशानी हो जाती। पर जसपाल का डील-डौल देखने के बाद मलिक का साहस जवाब दे जाता कि वह उसे टोक सके।

इधर पिछले कुछ महीनों से जसपाल ने रेडियो पर गाने सुनने कम कर दिये थे और अपनी बालकनी में बैठकर हीर गानी शुरू कर दी थी। जसपाल की दिनचर्या में आए इस अन्तर को कुछ दिन पड़ोसन मौसी समझ नहीं पाई परन्तु एक दिन उसके मन में संशय हुआ कि कहीं जसपाल मालती को सुनाने के लिए तो गाने नहीं गा रहा। बस फिर क्या था, मौसी ने अपनी कल्पना में मालती और जसपाल के कई महल खड़े कर डाले। और हर कल्पना में उसे मलिक की दुर्दशा ही दिखाई देती जो कि उसे बहुत ही खद लगती। अब मौसी अवसर की तलाश में थी कि कब वह जसपाल से सामना करे और उससे उसके मन की बात उगलवाए। एक दिन अवसर मिल ही गया। जसपाल पानी भरने के लिए नीचे बाल्टी लेकर उतरा ही था कि मौसी ने देखा कि वहाँ पर जसपाल अकेला ही है कोई दूसरा नहीं। बस फिर क्या था, मौसी तुरन्त जसपाल के पास पहुँच गई।

सुन जसपाल आजकल तू बहुत हीर गाने लगा है। क्यूँ कोई हीर का किस्सा तेरे साथ भी हुआ है क्या?” मौसी ने अपना पहला प्रश्न दागा।

जसपाल मुस्कुरा दिया, नहीं मौसी, ऐसे ही.. आजकल मन कुछ बेचैन सा रहता है। हीरसे दिल को थोड़ा चैन मिलता है।

अरे पगले हीर तो तेरी आँखों के आगे नित घूमती है, बस तू ही नहीं पहचानता। मौसी ने अपना अगला पैंतरा चला। जसपाल समझ नहीं पाया मौसी का इशारा। उसके चेहरे का भाव मौसी ने समझते हुए कहा, मेरे भोले, अपनी मालती की बात कर रही हूँ।

जसपाल इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था। वह भौंचक्का सा रह गया कि मौसी उसके दिल की बात कैसे ताड़ गई। फिर साहस करके उसने कहा, पर मौसी मालती तो शादी-शुदा है। मैं ऐसा सोच भी कैसे सकता हूँ।

ऐसी शादी भी कोई शादी है। बेचारी! दिन रात अपना समय उस बेकार के मर्द पर बरबाद कर रही है। सुन जसपाल तू ही हिम्मत कर। तू ही मुक्ति दिला इस गाय सी बच्ची को उस राक्षस से। कहते कहते मौसी का स्वर भर्रा गया। यह असली था या नकली यह तो मौसी ही जानती थी। जसपाल कुछ भी नहीं बोल पाया, बस चुपचाप नल से बाल्टी भरता रहा और फिर ऊपर लौट गया। मौसी की बातों ने उसके अन्दर तक झँझोड़ दिया था। क्या यह सम्भव है? मालती उसे अच्छी तो लगती थी। उसकी पीड़ा से उसके मन में टीस भी उठती थी परन्तु सदा ही वह अपने को मर्यादा को बन्धन में बाँधे रहता। अब मौसी ही उसे यह मर्यादा पार करने के लिए उकसा रही थी। क्या यह प्रेम उचित है? एक विवाहिता के साथ? ख़ैर अब प्रेम के रोपित बीज को मौसी के परोक्ष आशीर्वाद और सहमति ने सींच तो दिया था। अब दिन रात जसपाल की आँखों में प्रेम के सपने ही नाचते, उठते-बैठते, सोते-जागते मालती की ही सलोनी सूरत उसकी आँखों में रहती।

इधर मालती को भी मौसी ने न जाने कौन सी और कैसी पट्टी पढ़ाई कि देखते-देखते जसपाल के पराँठे, मलिक ठेकेदार की रसोई में पकने लगे। अब यह नया प्रेमी जोड़ा बस मलिक के घर से निकलने की ताक में रहता। अड़ोसियों-पड़ोसियों की सहमति तो उन्हें मिली ही हुई थी, विशेषकर जिनका वह दोनों आदर करते थे। बाकी के आहाते लोगों के नीरस जीवन में एक नया मनोरंजन का साधन जुट गया था। विशेषता यह थी कि यह फिल्मी कहानी होकर भी पर्दे पर न थी - उनके जीवन का ही एक अंग थी। मालती भी अब कुछ अधिक ही प्रसन्न रहने लगी थी। वह अक्सर गुनगुनाती हुई, शीशे में अपने को निहारती, सँवारती। मालती को इस दशा में देखकर मौसी के सीने में ठण्डक पड़ती और वह अपने भगवान को धन्यवाद देती।

मलिक यह तो नहीं जान पाया कि क्या हो रहा है, परन्तु मालती का फिर से खिला चेहरा, मालती में बढ़ता चुलबुलापन, बढ़ती प्रसन्नता और रसोईघर में घटता हुआ राशन उसकी दृष्टि से छिपा नहीं था। यह सब क्या हो रहा है - क्यों हो रहा है, यह तो मलिक समझ नहीं पा रहा था - परन्तु उसे यह रास नहीं आ रहा था। मन में कई संशय उठते थे परन्तु उनको शान्त करने के लिये स्वयं ही तर्क भी ढूँढ लेता। यह परेशानी उसे घुन की तरह अन्दर ही अन्दर से खा रही थी। अभी तक तो वह यह मान चुका था कि मालती का सारा जीवन उसके ऊपर निर्भर है। जब चाहे उसे रुला दे, जब चाहे उसे हँसा दे। वह मानता था कि मालती का होना केवल उसकी सुविधाओं के लिए है। मालती, स्वयं अपने लिये नहीं जी सकती, उसका जीना मरना सब मलिक ठेकेदार की अनुमति और सहमति पर निर्भर करता है। फिर अब मालती ने यह नया जीवन कहाँ से ढूँढ लिया? आजकल वह कैसे और क्यूँ गुनगुनाती है? यह सब बातें सोच कर मलिक खीज उठता। बिना बात के मालती पर बरसना तो उसका स्वयं-प्रदत्त अधिकार तो था ही परन्तु अब कुछ अधिक ही हिंसक रूप लेने लगा था। मालती ने भी यह सब अनुभव किया था किन्तु अब उसमें सहने की क्षमता या यूँ कहिए ाहस बढ़ रहा था। मालती का यह नया विकसित होता हुआ चरित्र भी मलिक को काँटे की तरह खटकता।

पिछले सप्ताह तो दोनों के झगड़े ने कई सीमायें पार कर लीं। हुआ यूँ कि मलिक ठेकेदार सामान्य रूप से नशे में धुत्त होकर लौटा। बरामदे में पड़ी पानी की बाल्टी से ठोकर खाकर लगभग गिरते गिरते बचा। बस फिर क्या था। ज़ोर-ज़ोर से मालती पर चीखने लगा। रात के लगभग दस, साढ़े दस का समय था। मालती ने मलिक को धीर बोलने के लिए कहा- समझाने की चेष्टा की कि वह कम से कम पड़ोसियों की नींद तो खराब न करे। मलिक और भी आग बबूला हो गया कहने लगा, गँवार औरत, तुझे.. घर बार कैसे सम्भाला जाता है, उसकी तो तमीज़ नहीं है पर पड़ोसियों की चिन्ता है। तेरे यार लगते हैं क्या?”

 

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