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01.23.2012
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थप्पड़
सुमन कुमार घई

जैसे ही सूर्य की किरणों ने मलिक ठेकेदार के चेहरे पर अपने प्रकाश का पहला प्रहार किया वह सदा कि तरह बौखलाया सा जाग उठा। उसे देर तक सोने की आदत थी। अक्सर वह नशे से धुत्त होकर घर लौटता और आते ही अपनी सुन्दर कोमल सी पत्नी पर रौब झाड़ते टूट पड़ता। पेट तो उसका पहले से ही दारू के साथ मछली के पकौड़े खाने से भरा होता था परन्तु घर पहुँच कर पत्नी को रसोई में व्यस्त कर देना उसका धर्म सा बन चुका था। कोई भी समय हो, रात कितनी भी बीत चुकी हो या उसकी पत्नी- मालती सारी रसोई सम्भाल कर लेट चुकी हो, सर्दी हो या गर्मी, मलिक ठेकेदार को फिर से रसोई में ताजा पका कुछ न कुछ खाने को चाहिए, बस यही उसका कर्म था। मालती को भी अच्छी तरह से मालूम था कि उसे उठना तो पड़ेगा ही। न उठने के परिणाम पहले ही कई बार भुगत चुकी थी। मलिक ठेकेदार के लिए धर्मपत्नी पर हाथ उठाना उसकी मर्दानगी का प्रमाण व उसके पति होने का अधिकार मात्र था और वह किसी भी अवसर पर अपने इस अधिकार को खोता नहीं था। फिर अगर उसकी पत्नी उसकी सेवा करने का पत्नीधर्म न निभाए तो उसका अपने पति के हाथों पिटना, मलिक ठेकेदार के सिद्धांतो के अनुसार उचित और उपयुक्त दोनों ही था। वह कोमालांगी अर्द्धांगिनी प्राय: यह मार चुपचाप सह जाती। हालाँकि चौधरी के हातेके सभी परिवारों को इस अन्याय का ज्ञान था परन्तु मलिक ठेकेदार को कोई टोके, यह साहस किसी में भी नहीं था।

मलिक ठेकेदार ने करवट बदली और चादर से मुँह ढाँप लिया। पर अब तक नींद तो उसकी उखड़ ही चुकी थी। पड़ोसी मौसी के रेडियो पर भजन भी कुछ ऊँची ही आवाज़ में बज रहे थे। कुछ देर तो वह ऐसे ही लेटा रहा परन्तु अचानक उसे लगा कि कुछ असाधारण सा अवश्य है इस सुबह में। कुछ पल वह चौकन्ने कुत्ते की तरह सोचता रहा और उसके कानों में आने वाली हर ध्वनि का विश्लेषण करता रहा। आँख तो वो खोलना ही नहीं चाहता था। कल रात के नशे के कारण प्रकाश और स्वर दोनों ही तीखे लग रहे थे। उसने अपने मस्तिष्क पर लगे मकड़ी के जालों को उतारते हुए सोचना प्रारम्भ किया। मौसी का रेडियो चल रहा है, यह तो सामान्य है। सामने वाली भी हमेशा सुबह ही आँगन में कपड़ों को धोते हुए जोर-जोर से बोल रही है। बरामदे में चौधरी के हाते के बच्चे भी भाग-दौड़ कर रहे हैं। तो फिर उसका मन क्यों कहता है कि कुछ ठीक नहीं है? उसने मालती को आवाज़ दी पर उधर से कोई उत्तर नहीं आया। मलिक ठेकेदार एकदम अपनी कोहनियों के बल आधा उठ गया। इस बार उसने फिर ज़रा जोर से मालती को पुकारा-

 मालती! कोई उत्तर नहीं। अब तक मलिक ठेकेदार का पारा चढ़ने लग गया था, क्योंकि उसके पारे को ऊपर चढ़ने के लिए अधिक तापमान की आवश्यकता नहीं थी। खाट से उठते हुए और अपने पैरों से अपनी चप्पल टटोलते हुए मलिक बुदबुदा रहा था- न जाने यह बहरी मेरी आवाज़ क्यों नहीं सुन रही है। अभी बताता हूँ इस हराम....। अचानक उसका बुदबुदाना वहीं पर थम गया। उसने फिर से गर्दन उकड़ूँ करके और अपने कान उठा कर रसोई की तरफ देखा। उधर से कोई भी आवाज़ नहीं आ रही थी। न बर्तन मलने की और न ही नाश्ता बनाने की।

मलिक ने अपने मन को तसल्ली दी कि शायद मालती दूध या डबलरोटी लेने के लिए नुक्कड़ तक गयी होगी। वह कुछ आश्वस्त सा होकर अपनी लुंगी सम्भालता हुआ कमरे से निकल कर बाहर बरामदे में आ गया। उसने देखा सभी कुछ तो सामान्य था चौधरी के हाते में। सामने वाली आँगन के बीचों-बीच लगे हैंड-पम्प पर बैठी कपड़े धो रही थी। पड़ोसन मौसी नाश्ता करने के बाद, पूजा करते हुए, रेडियो पर भजन सुन रही थी। बच्चे भाग-दौड़ कर रहे थे। उसकी दूसरी तरफ के पड़ौसी, इंजीनियर कुँवारे अपनी नौकरी पर जा चुके थे। यानि कि चौधरी के हाते का जन-जीवन सामान्य गति से ही चल रहा था, बस मालती यहाँ तक दूध या डबलरोटी ही लेने गयी थी। सब कुछ ठीक ही था। उसने एक लम्बी साँस भरी और फिर से लेटने के लिए चारपाई की तरफ चल दिया। पड़ोसन मौसी ने पूजा करते करते एक आँख खोल कर मलिक की पीठ को देखा और मुस्कुरा दी। कपड़े धोती हुई पड़ोसन ने कपड़ों को पछाड़ना रोक दिया और गर्दन उठा कर मलिक को देखने लगी। सामने के बरामदे में बैठे अखबार पढ़ रहे पण्डित जी ने भी उधर ही दृष्टिपात किया। इन सबको मलिक ने देखा तो नहीं पर न जाने उसे लगा कि उसकी पीठ में कुछ सुइयाँ सी चुभ रही हैं। ना...कुछ भी तो नहीं है। मेरा वहम ही है। शायद मुझे कुछ थोड़ी ही पीनी चाहिए। अपने आप से बातें करता हुआ फिर से वह अपनी चारपाई पर आ बैठा और रात के नशे के विषय में सोच कर पुन: उसका आनन्द लेने लगा। चौधरी के हाते के परिवार भी अपनी साँस रोक कर इस नाटक के अगले दृश्य की प्रतीक्षा करने लगे।

चौधरी साहब ने जब यह घर बनाना शुरू किया तो उन्होंने किसी से भी घर का नक्शा बनवाने की चेष्टा तक नहीं की थी। बस दो पोर्शन ही बनवाये। बगल बगल में दो कमरे और दो कमरों के साथ दो रसोइयाँ और स्नानघर। सब एक ही सीध में और किराये पर चढ़ा दिये। चौधरी के पास जैसे-जैसे पैसे आते गए वह ऐसे ही पोर्शन जोड़ता चला गया। करते करते बीच में आँगन बन गया और चारों तरफ बरामदा। किरायेदार आकर बसते चले गये। छोटा सा कस्बा था कुछ वर्ष पूर्व तक, परन्तु दिल्ली की निकटता के कारण कस्बे को शहर में बदलते हुए देर नहीं लगी थी। जैसे-जैसे कस्बा शहर में बदलता गया तैसे-तैसे चौधरी का घर बढ़ता चला गया। पहले-पहल तो लोग इसे चौधरी के आहाते के नाम से पुकारते थे परन्तु अब यह केवल चौधरी का हाता बन कर रह गया था।

मलिक को प्रतीक्षा करते करते लगभग बीस मिनट हो चुके थे और मालती का कोई नामो-निशान नहीं। इतनी देर तो नहीं लगती दूध लाने में। वैसे तो दूधवाला घर पर ही दूध देकर जाता है परन्तु अगर गर्मी के कारण दूध फट जाए तो उसकी डेरीतक भागना पड़ता है। शायद ऐसा ही कुछ हुआ होगा - मलिक ने सोचा और अपने चढ़ते हुए पारे को नीचा किया। मन शांत होते ही मलिक फिर से लेट गया। छत पर लटका पंखा घर-घर की आवाज से चल रहा था। यह पंखा कभी भी अपनी पूरी गति पर नहीं चलाया जाता था। क्योंकि असंतुलित होने के कारण, अगर तेज़ चलाया जाता तो बुरी तरह से डोलने लगता। मलिक ने सोचा कि कितनी समानता है इस पंखे की गति में और उसकी गृहस्थी में। वह पूर्ण गति से चल कर समाज के उच्च स्तर के लोगों में मिल जाना चाहता है। परन्तु यह मालती तो उसके गले से लटका एक पत्थर या उसके पाँवों की बेड़ी की तरह है। न ढंग का पहनना और न ढंग से उठना बैठना। वही गँवार की गँवार। मलिक फिर से खीज उठा। कहाँ मर गई यह औरत। अभी तक लौटी नहीं। - बुड़बुड़ाता हुआ मलिक उठ कर फिर से बरामदे में आ खड़ा हुआ।

पड़ोसन मौसी अपनी पूजा समाप्त कर चुकी थीं। रेडियो पर भजन अब भी चल रहे थे। मौसी ने अपनी रसोई में बैठे-बैठे गर्दन उठाकर मलिक को बरामदे में दरवाज़े पर खड़ा देखा और फिर से अपने काम में व्यस्त हो गयी। सामने पण्डित जी अभी भी अखबार पढ़ रहे थे उन्होंने भी समाचार पत्र के ऊपर से मलिक को देखा और फिर से समाचारपत्र के पीछे ओझल हो गए। सामने वाली अभी भी कपड़े ही धो रही थी। वह मलिक को देख कर मुस्कुरा दी। मलिक ने अपनी आँखें नीचे कर लीं। वह किसी के भी मुँह नहीं लगना चाहता था। परेशानी से उद्वेलित मलिक कभी आहाते के फाटक की दिशा में झाँकता तो कभी रसोई की खुले दरवाज़े की ओर। लाचार सा वह फिर से कमरे में आकर खाट पर लेट गया।

मालती से उसका विवाह हुए लगभग तीन वर्ष हो चुके हैं। मालती देखने में बहुत सुन्दर लगने वाली सुघड़ महिला है परन्तु मलिक न जाने क्यों उसमें सदा ही दोष देखता रहता है। सम्भवत:, अपने दोषों पर पर्दा डालने के लिए मालती एक बहाना बन कर रह गई है। चौधरी के आहाते में रहने वाले सभी लोगों के साथ मालती के अच्छे सम्बन्ध हैं पर मलिक किसी से भी सम्बन्ध नहीं रखना चाहता। उसकी दृष्टि में वह उन सबसे बेहतर है यह तो कुछ समय का ही फेर है कि उसकी आर्थिक स्थिति उसकी मानसिक अलग स्तर पर चल रही है। वह तो शहर के दूसरी तरफ नई बनी कोठियों में रहना चाहता है, जहाँ ठेकेदारी के चक्कर में उसका आना जाना लगा रहता है। कई सपने देख डाले हैं उसने, पर यह मालती - उसकी बेड़ी, पीछा भी नहीं छूटता इस गँवार से - यह सोचते सोचते मलिक फिर से बौखला कर खाट पर उठ बैठा।

शादी के कुछ महीनों के बाद ही मलिक मालती पर, उसकी हरकतों पर खीज उठता। मालती एक बहुत ही सादा परिवार से आई थी, िसमें लड़कियों को बहुत दबा कर रखा जाता था। न ठीक से पहनने दिया जाता था न ठीक से खाने दिया जाता था, बाहर स्वतन्त्रता से घूमने-फिरने का तो प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता था। ऐसे परिवार में पोषती नवयुवती को अचानक परिवार से दूर के शहर में विवाह के तुरन्त बाद अलग से रहना पड़े और उससे उम्मीद रखी जाए कि वह गृहस्थी को सहजता से सम्भाल पायेगी, मूर्खता ही होगी। परन्तु मलिक उन्हीं में से था जो सोचता कि पत्नी के रूप वेदों के अनुसार माँ से लेकर अप्सरा तक जैसा लिखा था, वैसे ही होने चाहिएँ। मालती को घर-गृहस्थी, किसी की भी समझ नहीं थी। मलिक अक्सर उस पर चीखता चिल्लाता। चौधरी के हाते में कुछ भी गुप्त रह पाना कठिन था। जितनी पतली दीवारें थी उससे भी पतले लोगों के कान थे। रसोई में बर्तनों की खटपट से लेकर चारपाई की चरमराहट तक की खबर सभी को रहती। पड़ोसन मौसी भी निरह मालती की अवस्था देखती और ममता, दया से भर उठती।

फिर एक दिन उसने मलिक के चले जाने का बाद आकर मालती को सहारा दिया। मालती फूट-फूट कर रो पड़ी। इस अजनबी शहर में आखिर कोई तो मिला उसका दर्द बाँटने वाला। मौसी ने भी उसे पुत्री की तरह घर-गृहस्थी की शिक्षा देनी आरम्भ कर दी।

 

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