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03.27.2012
 
रस झरता "बूँद-बूँद आकाश"
रचयिता :
 डॉ. गौतम सचदेव
सुमन कुमार घई

रस झरता बूँद-बूँद आकाश

 लेखक  :       डॉ. गौतम सचदेव

 प्रकाशक :    उपासना पब्लिकेशन्स

            डी-10/1061 (समीप महागौरी मन्दिर)

            खजूरी खास, दिल्ली – 10094

            दूरभाष : 22967638

                  ISBN : 81-901914-1-1

मूल्य : रु० 175.00

 

बूँद-बूँद आकाश काव्य-रस झरता रहा और मैं चिर-प्यासे की तरह इसका भरपूर आनन्द लेता रहा। डॉ. गौतम सचदेव का काव्य संकलन पढ़ते हुए यह अनुभूत भाव मन में उभरता रहा। विशेष बात तो यह है कि अभी तक जितने भी काव्य संकलन मैं पढ़ चुका हूँ यह पुस्तक उन सबसे अलग श्रेणी में आती है। कविता को कल्पना लोक से निकाल कर यथार्थ के धरातल पर रखते हुए भी रसमय रखने में कवि सर्वथा सफल रहा है। यथार्थ को पन्नों पर उतारते हुए जन-वादी हो जाने की संभावना बनी रहती है; जो कि इस काव्य-संग्रह में नहीं।

आँख से टपके नहीं दिल में दबे मजबूर आँसू

चाँद मिट्टी में मिलाते पोंछकर सिंदूर आँसू

क्या ये हैं जंग के तारे और तमग़े?

(अढ़ैये – पृष्ठ ७)

 

इसी तरह पहली रचना में डॉ. गौतम सचदेव जीवन की व्यवहारिकता का सबक देते हुए कहते हैं –

चोट का तक़ाज़ा है ओंठ भींच रोक चीख़

पाल आँच पीड़ा की पकने का सबक सीख

 

मीठा मत बन इतना जाएँ सब तुझे हड़प

प्यारे वे पेरेंगे मान तुझे नरम ईख

 

X    X          X          X

सींच ख़ुशी ज़ख़्मों में और हँसें तू भी हँस

दर्द सौंप दे दिल को रो भीतर कुशल दीख

जीवन के यथार्थ को सरल और स्पष्ट शब्दों उकेरती हुई कई रचानाएँ हैं –

 

ज़िंदगी समझे जिसे हम आह निकली

ख़ूबसूरत थी ख़बर अफ़वाह निकली

X    X                      X          X

ख़ूब देखे हैं नज़ारे इस जहां में

ज़िंदगी अच्छी तमाशा गाह निकली

(पृष्ठ -६२)

 

गोलियाँ हों और फूलों से बनी हों

ज़ख़्म होते कम नहीं इस दिल्लगी से

(पृष्ठ -७६)

डंगर हैं जो समाज के रख बाँधकर उन्हें

भूँकें अगर तो ले छड़ी दर से खदेड़ तू

(पृष्ठ -९९)

 

यहाँ पर मैं यह स्पष्टीकरण भी उचित समझता हूँ कि यह पुस्तक केवल यथार्थ में ही नहीं सिमटी रहती अपितु विभिन्न रसों और भावों को विभिन्न छंदों में ढालती है। पुस्तक की अन्तिम कविता कोमल भावों में भी व्यवहारिकता की सीख देती प्रतीत होती है –

तितलियाँ ये क्या टटोलें

फूल हँस दें कुछ न बोलें

 

कौन कलियों को बताये

रूप ये ऐसे न खोलें

 

फूल हम जैसे नहीं हैं

ये न जग में ज़हर घोलें

 

प्यार की दस्तक सुनें तो

दें न कुछ पर द्वार खोलें

 

मिल गये हैं मुस्कुरा दें

बाद में बोलें-न-बोलें

(पृष्ठ – ११७) 

 

पीर भरे मन की पुकार कुछ इस तरह से गौतम जी की कविता में उभरती है –

काँटों पर शबनम

चुभती है पूनम

जागी है रो कर

पीड़ा की सरगम

सीला मन दामन

दुखता है मौसम

काँटों की सीवन

छालों की जाजम

आँखों में जगमग

यादों का नीलम

छीजे दुख से सुख

सुख में दुख मरहम

तनहा है घिर कर

जमघट में ’गौतम’

(पृष्ठ – १५)

 

हम प्रवासी भारतीय अक्सर जब भी किसी महफ़िल में स्वदेश की बात करते हैं तो शीघ्र ही बात तुलनात्मक विश्लेषण पर आ अटकती है और प्रायः देश को तो प्रेम से याद किया जाता है पर अनुभवों को नहीं। दैनिक जीवन मे छाया भ्रष्टाचार और बेईमानी की कुंठा ही प्रेम-स्मृतियों पर हावी हो जाती है। परन्तु जब प्रवासी काव्य रचा जाता है तो वह केवल अमराईयों कोयल की कुहुक तक ही सीमित रहता है। वास्तविकता की कुंठा की अभिव्यक्ति उस साहित्य में देखने को नहीं मिलती। यहीं पर यह काव्य संकलन प्रवासी साहित्य में एक नया पन्ना जोड़ता है – ईमानदारी का। डॉ. गौतम सचदेव ने पुरानी स्मृतियों को रंगीन चश्में से नहीं बल्कि वास्तविकता की नज़र से देखा है शुरू से लेकर अन्त तक पुस्तक में कई रचनाएँ इसी पर आधारित हैं –

आज़ादी नेता ने खाई बाक़ी सब उपवासी

भारत माता के दफ़्तर में जनता है चपरासी

बाँझ हुई मिट्टी यह बुढ़िया अवतारों की जननी

गंगा मन की गँदली तन की क्यारी भूखी-प्यासी

X    X                      X          X

लोकतन्त्र के आस्मान का चाँद कलंकित लगता

अर्द्धशती के बाद सजी बस आधी पूरनमासी

(पृष्ठ – ५)

इक पार्टी बनायें हम ’ख़्वाहमख़्वाह’ की

हर पाप से सनी हो माहिर गुनाह की

X    X                      X          X

ठग रत्न चोर भूषण ये दे उपाधियाँ

नेता बनाये जिसने दुनिया तबाह की

(पृष्ठ – ४०)

हीरों की माला फेरत हैं प्रभु के पक्के भक्त गुसैयाँ

राजनीति से धरम जुड़ावत नेता नित्य दबावत पैयाँ

X    X                      X          X

चीरहरण होवत है खुलकर हर घाटी की हरियाली का

बेचत वनदेवी की इज़्ज़त उसके नवल युधिष्ठर सैयाँ

(पृष्ठ – ४३)

 

अलविदा दिल्ली तुम्हारा आस्माँ में डॉ. गौतम सचदेव का दिल्ली को अलविदा कहने का अन्दाज़ भी अलग है। दिल्ली की खट्ठी मीटी यादों को ताज़ा करती हुई यह कविता देर तक स्मृति में गूँजती रहती है –

अलविदा दिल्ली तुम्हारा आस्माँ

अलविदा दमघोंट ज़हरीला धुआँ

X    X          X          X

 

अलविदा दिल्ली की ज़िंदा महफ़िलें

अलविदा मुर्दा बनातीं मुश्किलें

अलविदा धक्कों से ठिलती ज़िंदगी

अलविदा दौलत ढकी बेपर्दगी

अलविदा वे तंग गलियाँ क़ैद बू

अलविदा बिजली बिना गरमी व लू

अलविदा देवासुरी सब मोटरें

अलविदा वे जानलेवा टक्करें

 

X    X          X          X

अलविदा संसद व दफ़्तर ग़ज़ब के

अलविदा बाबू निकम्मे भी थके

X    X          X          X

अलविदा ऐ पाँडवों मुग़लों के धन

अलविदा अंग्रेज़ के लूटे चमन

अलविदा खंडहर उजड़े मक़बरो

अलविदा समय के सोये पत्थरो

अलविदा गढ़ कोट कीली लाट को

अलविदा यमुना के प्यासे घाट को

अलविदा इतिहास की दहलीज़ को

अलविदा बूढ़ी हुई हर चीज़ को

 

इसी तरह दिल्ली की संपूर्णता को समाहित करती हुई कविता अन्त में कवि की पीड़ा को नहीं छिपा पाती –

अलविदा फिर लौटने की आरज़ू

अलविदा मिलना वतन से रूबरू

अलविदा ऐ दोस्तो सब ख़ुश रहो

अलविदा कहकर कहो आते रहो

(पृष्ठ -१०२-१०४)

जैसा कि शुरू में भी कह चुका कि यथार्थवाद में मन के कोमल भावों को सहजता से गूँथ गौतम जी। यह सच्चे कवि की निशानी है। कविता अवचेतन से, हृदय से झरी है। तकनीकी मापदंड लिए हुए मस्तिष्क से नहीं। और यही कविता की सुन्दरता है।

रोशनी लेती सुबह अँगड़ाइयाँ

ख़ुश्बुएँ रस घोलती शहनाइयाँ

 

चुप अधर दोहे दिलों रचे गये

चार आँखें रच गई चौपाइयाँ

(पृष्ठ – ६१)

 

काव्य संकलन के आरम्भ में डॉ. गौतम सचदेव अपने शब्दों बूँदों से पहले मेघ शायद अपनी  रचना प्रक्रिया के दर्शन को व्यक्त करते हैं – कवि की मुक्ति केवल भावों, विचारों और कल्पनाओं की अभिव्यक्ति में है, लेकिन वह पूर्ण मुक्ति कहाँ है? अभिव्यक्ति की कुछ निजी सीमाएँ तो रहेंगी ही। कला चाहे कोई हो, उसमें पूर्ण अभिव्यक्ति शायद कभी नहीं हो पाती। कुछ-न-कुछ शेष रह जाता है, जो फिर-फिर नये रूपों में प्रकट होना चाहता है। कवि के यथार्थ की झलक यहाँ पर भी उपस्थित है। आगे चल कर हिन्दी ग़ज़ल की उर्दू ग़ज़ल से भिन्नताओं को परिभाषित करते हुए गौतम जी ने इस जटिल विषय को भी बहुत सीमा तक सहज कर दिया है।

मैं स्वयं ग़ज़ल हिन्दी की या उर्दू की – उसकी सूक्ष्मताओं से अनिभिज्ञ हूँ। परन्तु श्री प्राण शर्मा इस विषय के गुरु हैं। उन्होंने अगले कुछ पन्नों में ग़ज़ल का निर्झर  के अन्तर्गत डॉ. गौतम सचदेव की रचनाधर्मिता के विषय में लिखते हैं – उन्होंने उर्दू बह्रों में हिन्दी छ्न्दों की अस्मिता और गरिमा को बरक़रार रखते हुए हिन्दी छ्न्द-विधान का निष्ठा से पालन किया है। हिन्दी छ्न्दों की भाँति उर्दू बह्रों पर भी उनका पूरा अधिकार है। इसीलिए तो वे उर्दू की मुश्किल से मुश्किल बह्र को बड़ी आसानी से निभा जाते हैं। डॉ. गौतम सचदेव द्वारा प्रयुक्त उर्दू कि बह्रों में हिन्दी छ्न्दों जैसी सुगन्ध का आना उनके कौशल का परिचायक है

इन्हीं शब्दों के साथ मैं इस अनूठे कवि का धन्यवाद करता हूँ कि प्रवासी हिन्दी साहित्य शृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ने के लिए। इस आलेख में मैं केवल इस काव्य संकलन का एक पक्ष ही शायद व्यक्त कर पाया हूँ। पूरा आनन्द लेने के लिए तो पाठकों स्वयं चातक की तरह बूँद-बूँद आकाश से झरते रस का पान करना होगा।


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