| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 12.01.2007 |
|
नन्दू का प्रेम रोग सुमन कुमार घई |
|
नन्दू को
प्रेमरोग हो गया। यानि कि मर्ज़-ए-इश्क। नन्दू की आयु में आमतौर पर यह
बीमारी पाई जाती है,
या
यूँ कहिए यह व्याधि यही सोलह-सत्तरह की अवस्था में सिर उठाती है;
फिर सारा जीवन भर इसके परिणाम भ्îगतने
पड़ते हैं। नन्दू की इस प्रेम कहानी की नाiयका
है- उसके सामने वाले घर के पिछवाड़े वाले घर में रहने वाली एक सुकुमारी
कन्या। वैसे उस कन्या को कोई अन्दाज़ा नहीं है कि इधर नन्दू के दिल में आग
लग चुकी है। कहने का मतलब है कि अभी तक बात केवल इकतरफ़ा है। वैसे नन्दू
पूरी लगन के साथ प्रयत्नशील है कि किसी तरह सम्पर्क स्थापित हो। इसके लिए
वह अपने अंतरंग मित्र,
नील धोबी की काफी चाटुकारिता कर रहा है आजकल। नील धोबी वास्तव में धोबी
नहीं है और न ही दूर दूर से उसके परिवार वालों का किसी धोबी से सम्बन्ध है।
बस यूँ ही इस मुहल्ले की रीति है कि किसी को भी उसके सही नाम से न बुलाया
जाए,
जैसे कि नन्दू का असली नाम नरेन्द्र है,
वैसे ही नील का नाम अनिल है। धोबी तो बस उसकी बचपन से ही मित्रवर्ग में
पहचान है। उसकी माँ ने हमेशा ही उसे धोबी के धुले हुए ही कपड़े पहनाए तो बस
उसका नाम ही नील धोबी हो गया। इस नाम से उसे कोई आपत्ति नहीं है,
जब
तक कि उसकी माँ के सामने उसे ऐसे न पुकारा जाए। क्योंकि माँ लड़ने पर उतारू
हो जाती है और इसका अपमान मित्रों में उसे उठाना पड़ता है। हाँ,
तो
मैं किस्सा सुना रहा था नन्दू के प्यार का।
हुआ यूँ
कि हल्की सी सर्दी का मौसम है,
सो
नन्दू पढ़ने के लिए अपनी पुस्तकें लेकर खुली छत पर आ बैठता है। कभी पढ़ लिया
और कभी आसपास ताँक-झाँक लिया। ऐसे ही,
पिछले रविवार जब नन्दू महाशय की दृष्टि उठ कर सामने हुई तो देखा दूर छत पर
एक कन्या अपने बालों को धोने के बाद सुखाने के लिए गुनगुनी सी धूप में आ
बैठी है। उसने कन्धों पर तौलिया फैला रखा था और उसपर घने बाल बिखरे हुए थे।
जैसे ही उसने एक झटके के साथ अपने बालों को अपने चाँद से चेहरे के ऊपर फेंक
कर झटका तो नन्दू के दिल को ऐसा झटका लगा कि होशो हवास जाते रहे। हाथ से
पुस्तक कब गिरी इसकी कोई खबर नहीं है। बस दिमाग में वही फिल्मी धुन गूँज
रही थी कि-"न झटको ज़ुल्फ़ से पानी...",
जब
से होश आया है तब से होश गायब हैं उस छोकरी के लिए। अब नील धोबी की किस्मत
देखो। बिल्कुल बगल वाले घर में रहता है कन्या के और उसे कोई आभास ही नहीं
है कि साथ वाले घर में जवानी,
सर्दी की खिली धूप की तरह चढ़ रही है। नालायक है - और इधर नन्दू महाशय लम्बे
लम्बे साँस भर रहे हैं छत पर कि शायद कोई हवा का झोंका उसी ज़ुल्फ़ को छू कर
इधर भी आ जाए।
अब समस्या
यह पैदा हुई कि कैसे बातचीत शुरू की जाए। नील धोबी से परिचय तो पता चल
जाएगा,
जैसे कि नाम क्या है और उम्र क्या है?
पर
प्रेम भरी बातें तो आमने सामने ही होंगी न। और प्रणय निवेदन में किसी
बिचौले को डालने का मन भी नहीं था। कहीं बात न बनी तो नील धोबी ही असफलता
का प्रचारक बन जाएगा मित्रमंडली में। सो नन्दू महाशय ने सोचा हर काम बड़ी
योजना की तरह होना चाहिए। बड़ा सोच विचार कर और बड़ी सूझ-बूझ के साथ। सबसे
पहले प्रेमपत्र लिखना चाहिए। फिर देखा जाएगा कि प्रतिiक्रया
क्या हुई। जैसे कि उसने छत पर आकर नन्दू की दिशा में देखा या कि पत्र लेकर
सीधी नन्दू की मम्मी के पास आ पहुँची। ऐसा सोचते ही नन्दू अन्दर तक काँप
उठा। पर क्या करता,
यह
ग़ालिब वाली "आतिश" तो सुलग चुकी थी अब तो आग के दरिया में उतरना ही पड़ेगा।
अब
प्रेमपत्र लिखने के लिए रिसर्च शुरू हुई। कोई पुराना अनुभव तो था नहीं। और
न ही किसी भी पाठ्यक्रम में अभी तक प्रेमपत्र लिखना सिखाया गया था। पाँचवी
कक्षा से हर भाषा में,
जो
उसने अभी तक पढ़ीं थीं,
कभी फीस मुआफ करवाने का आवेदन पत्र सिखाया गया था या फिर बीमार होने के
कारण पाठशाला में अनुपस्थित होने का आवेदन पत्र रटाया गया था। कभी फुटबाल
के मैच पर निबन्ध लिखा था तो कभी "हाऊस ऑन फ़ायर" पर। प्रेमरोग से तो दूर
दूर तक का कोई सम्बन्ध ही नहीं था पढ़ाई लिखाई का। सारी विद्या बेकार लगने
लगी। सोचा कि अब तो बस जो कुछ फिल्मों से सीखा है और सस्ते उपन्यासों में
पढ़ा है,
वही शुद्ध ज्ञान है। इस आड़े समय यही विद्या काम आयेगी। चलो यह समस्या तो
हल हुई। अब प्रश्न यह उठता है कि पत्र पहुँचाया कैसे जाए।
साधारण
डाक विभाग का प्रयोग और भी विषम समस्याएँ उत्त्पन्न कर सकता था। डाक तो
दोपहर के आसपास बँटती थी इस मुहल्ले में। उस समय लड़की की माँ के सिवा किसी
और का घर में होना नामुमकिन था। अगर प्रेमपत्र पहली बार ही लड़की की अम्मा
के हाथों में आ गया तो यह प्रेम का अंकुर फूटने से पहले ही कुचल दिया
जाएगा। किसी के हाथ भेजने का जोख़िम नहीं लिया जा सकता। मानो वो नील धोबी के
हाथ भेजे,
जो
कि बड़ी सुगमता से संदेशवाहक बन सकता था,
और
नील धोबी ही प्रेमपत्र को दोस्तों में सार्वजनिक कर दे तो और मुसीबत। अन्त
में नन्दू प्रेमी ने सोचा क्यों न "डाइरेक्ट डलीवरी" का सहारा लिया जाए,
यानि कि प्रेमपत्र को एक कंकर के साथ बाँध कर गुलेल से प्रेमिका की छत तक
पहुँचा दे। "हाँ,
यही ठीक रहेगा",
नन्दू भाई
ने सोचा। जहाँ चाह वहाँ राह।
अब नन्दू
ने प्रेमपत्र लिखना शुरू किया। उसने आमतौर फिल्मों में देखा था कि जब भी
हीरो प्रेमपत्र लिखता है तो उसका पत्र हमेशा या तो गाने के रूप में होता है,
नहीं तो कम से कम शुरूआत तो उर्दू के शेर से ही होती है। अब शेर याद करने
की समस्या खड़ी हो गयी। नन्दू ने लिखना आरम्भ किया- "शीशी भरी गुलाब की
पत्थर पे तोड़ दूँ",
पहली पंक्ति लिखते ही उसे नापसन्द हो गयी। सोचने लगा कि बहुत ही चालू किस्म
का शेर है। कुछ अच्छा होना चाहिए। उसी शाम नन्दू
'ओमी'
की
दुकान पर गया,
जहाँ से वो अक्सर उपन्यास किराए पर लेता था। वहाँ से उर्दू शायरी की एक
पुस्तक ले आया। चलो यह समस्या तो हल हुई।
अब उसका
अगला कदम था कि कन्कर प्रेमिका की छत तक पहुँचाने का। उसने सोचा कि एक
"ट्रायल" हो जाए। सो शाम के समय,
जब
धूप के साथ साथ लोग भी छतों पर से उतर चुके थे,
नन्दू महाशय अपना "प्रेमपत्र लाँचर" लेकर ऊपर जा पहुँचे। आसपास किसी को भी
न देखकर,
गुलेल को कान तक खींच कर पत्थर दे मारा। दुर्भाग्य ऐसा कि पत्थर अपने
ठिकाने से पहले ही सामने के घर के आँगन में "लैंड" कर गया। लाजो ताई रसोई
में शाम की चाय बना रही थी। जैसे ही रसोई की खिड़की के काँच टूटने की आवाज
नन्दू तक पहुँची,
वह
लपक कर एक ही छलाँग में नीचे तक पहुँच चुका था। लाजो ताई क्रोध से लाल पीली
होती हुई अपने घर की चौखट पर खड़ी गालियाँ दे रही थी। नन्दू के घर के अन्दर
तक लाजो ताई की गालियाँ गूँज रहीं थीं--
"किस
मुए ने कंकर मारा है?
किसी का सर फट जाता तो। आए तो मेरे सामने वो हराम..."। नन्दू ने कानों पर
हाथ धर लिए।
लाजो ताई
से नन्दू का रिश्ता भी दर्द भरा है। लाजो ताई वैसे तो किसी की भी ताई नहीं
है पर मुहल्ले के सभी छोटे बड़े उसे ताई ही कहते हैं। नन्दू की दादी की
सहेली है और ताई ने सारे मुहल्ले के बच्चों को सच्चरित्र रखने का ठेका भी
ले रखा है। बात बहुत पुरानी है। नन्दू कोई आठ वर्ष का रहा होगा कि गली की
नुक्कड़ पर किसी की अधबुझी सिगरेट उठा कर हीरो की तरह धुआँ उड़ाने का अभिनय
कर रहा था। न जाने किधर से लाजो ताई आ पहुँची। सीधा नन्दू को कान से पकड़
कर खींचती हुई घर तक ले आई। मजाल है कि बुढ़िया ने रास्ता भर कान की पकड़
ज़रा भी ढीली की हो। तब से लेकर अब तक जब भी नन्दू ताई को देखता है,
उसके दोनों हाथ स्वयंमेव दोनों कानों को ढाँप लेते हैं। अब तो पत्थर से
बाँध कर प्रेमपत्र भी नहीं पहुँचाया जा सकता। कहीं लाजो ताई के हाथों में
प्रेमपत्र आ गया तो..। यह सोच कर ही नन्दू की रूह काँप उठी।
फिल्मों
में पुराने ज़माने से लेकर आजकल के दौर तक हीरो जब भी हिरोइन से पहली बार
मिलता है,
तो
कोई न कोई मीठी सी दुर्घटना अवश्य होती है। जैसे कि पुराने ज़माने में
साधारणत: पिकनिक पर जाती हुई या कॉलेज जाती हुई सहेलियों की टोली से हीरो
की साईकिल की टक्कर हो जाती थी। हिरोइन की साईकिल का पहिया टेढ़ा हो जाता।
हीरो बड़े प्यार से हाथ पकड़ कर हिरोइन को उठाता था,
और
हिरोइन उठते ही या तो हीरो के चाँटा लगाती या मुँह फुला कर गुस्सा दिखाती
और साथ ही कोई गाना शुरु हो जाता। गाने के समाप्त होते होते प्रेम की पहली
सीढ़ी पर दोनों एक साथ कदम रख चुके होते थे। आजकल के समय में हीरो और हिरोइन
की पहली भेंट आमतौर पर कॉलेज के प्रांगण में होती है,
पहले हीरो हिरोइन के साथ अच्छी खासी धक्केबाजी करता है और फिर लड़कों की
टोली और लड़कियों की टोली एक सी वर्दी पहन कर नाच गाना करते हैं। फिर प्यार
होता है। जिस तरह से पुराना हीरो और आज का हीरो,
हिरोइन से पहली बार मिलता है,
बेचारी हिरोइन का शरीर चोटों से नीला पीला तो हो ही जाना चाहिए। कपड़े फटें
सो अलग। पर ऐसा होता नहीं है,
बस
प्यार हो जाता है।
तो मैं
किस्सा सुना रहा था नन्दू की मुहब्बत का। नन्दू ने सोचा कि रास्ते में
टकराने का,
यानि कि मिल जाने का रास्ता ही ठीक है। कल से ही नज़र रखनी शुरु करेगा कि
लड़की किस समय स्कूल जाती है और कैसे जाती है?
आगे योजना इस जानकारी के प्राप्त होने पर निर्भर करेगी। लड़की से कैसे पहली
भेंट की जाएगी- सोचा जाएगा।
अगले दिन
नन्दू भाई समय से पहले उठ कर स्कूल जाने के लिये तैयार हो गया। माँ ने देखा
कि आज नन्दू बिना जगाये ही तैयार होकर स्कूल जाने के लिए उत्सुक है,
बेचारी फूली नहीं समा रहीं थीं। कितनी पढ़ाई की चिन्ता है मेरे लाल को। सारा
दिन छत पर बैठ कर पढ़ता है और अब देखो तो स्कूल इतनी जल्दी जाकर क्या करेगा?
फिर सोचा कि होनहार बेटा करेगा क्या,
और
पढ़ना चाहता होगा स्कूल में! नन्दू जब नाश्ता कर रहा था तो माँ आते जाते
प्यार से उसके सर पर हाथ फेर जातीं। मेरा लाल...। उधर नन्दू को जल्दी थी कि
कहीं लड़की न निकल जाए उसके घर से निकलने से पहिले।
मास्टर
प्लान तैयार था। अगर तो घर से निकलते ही कोई मित्र मिल गया तो कोई बहाना
बना के फिर घर लौट आएगा,
जैसे कि पेट में दर्द है आदि। फिर कुछ मिनटों के बाद निकलेगा। अगर कोई नहीं
मिला तो थोड़ा आगे जाकर फिर कन्या की गली का रुख करेगा। आगे तो जाना ही
पड़ेगा क्योंकि सम्भावना थी कि आज माँ भावविभोर होकर बेटे को स्कूल जाता
हुआ भी पीछे से देखे। आज सितारे नन्दू के पक्ष में थे। न तो कोई मित्र ही
मिला और घर से निकलते निकलते हमेशा की तरह पापा ने मम्मी को नाश्ता बनाने
में व्यस्त कर दिया। सो सुअवसर जानकर वह सीधा ही लड़की के घर की दिशा में
चल दिया। साँस न जाने क्यों फूल रही थी। कोई पाप तो नहीं कर रहा था वह।
सच्ची मुहब्बत थी उसके दिल में। फिर भी चलते चलते दाँयें बाँये आगे पीछे
मुड़ मुड़कर देख रहा था कि कोई देख तो नहीं रहा । लड़की की गली की नुक्कड़ तक
पहुँचते पहुँचते उसे बोध होने लग गया था कि उर्दू की शायरी में "यार की
गली" का इतना चर्चा क्यों है। एक अलग किस्म का रोमांच था। यही कुछ कदमों का
सफर मीलों लगा उसे। मंiज़ल
पर पहुँच ही गया किसी तरह। अब लड़की का कहीं नामो निशान नहीं! अब प्रतीक्षा
कैसे और कहाँ करे,
यह
तो उसके मास्टर प्लान में कहीं भी नहीं था। अभी वह खड़ा सोच ही रहा था कि
उसने नील धोबी के घर का फाटक हिलते देखा। अरे उसकी चोरी तो अभी पकड़ी गयी,
सोचते ही उसके पाँवों तले ज़मीन सरक गयी। उलटे पाँव भाग खड़ा हुआ नन्दू
बहादुर। थोड़े समय बाद लौटा तो तब तक नील धोबी जा चुका था। लैंप पोस्ट का
सहारा लेकर फिर से इन्तज़ार की घड़ियाँ शुरु हुईं। अभी कुछ ही क्षण बीते थे
कि कन्या के घर का फाटक भी खुला। फाटक के हिलते ही नन्दू की साँसें तीव्र
हो गयीं,
रोंगटे खड़े हो गए और दिल की धड़कन तो राजधानी एक्सप्रेस से भी तेज़ हो रही
थी। पर यह क्या,
लड़की तो बाहर निकली पर यह तो उम्र में काफी बड़ी थी। हाव-भाव तो छत वाली
कन्या जैसे लगते थे परन्तु देखने में नन्दू से लगभग दस वर्ष बड़ी होगी। उस
लड़की ने एक उड़ती सी नज़र से नन्दू की दिशा में देखा,
नन्दू ने सोचा कि बड़ी बहन कॉलेज जा रही होगी,
सो
थोड़ी और प्रतीक्षा करनी होगी। सब्र का फल मीठा। नन्दू प्रेमी मजनू की तरह
इन्तज़ार करता रहा पर कन्या ने नहीं आना था सो नहीं आई उस दिन। स्कूल का समय
पास आ रहा था और नन्दू की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। अन्त में उसे जाना ही
पड़ा,
क्या करता- समय रुकता तो है नहीं,
प्रेमियों के लिए भी नहीं। अब तो स्कूल के लिए भी लगभग भागना ही पड़ेगा,
नहीं तो देर हो जाएगी। यही सोचता हुआ नन्दू द्रuत
गति से पाठशाला की दिशा में चल दिया-
'चलो
कल सही। शायद आज तबीयत ठीक न हो।'
मन
को तसल्ली दे ली बेचारे ने।
स्कूल में
कदम रखते ही घंटी बज गयी और वह भाग कर ही समय पर अपनी कक्षा तक पहुँच पाया।
अभी उसने डेस्क पर बैठ कर साँस भी नहीं ली थी कि नील धोबी ने उसकी पीठ पर
जोर से थपकी देते हुए कहा- "सुना नन्दू,
आज
से नई मिस आ रही है कैमिस्ट्री पढ़ाने। देखें तो कैसी दीखती है। मजा रहेगा।"
नन्दू
बेचारा तो अभी भी अपनी ही दुनिया में खोया हुआ था। पढ़ाई आरम्भ हो गई और
व्यस्त हो जाने के कारण,
दिन में नन्दू सुबह की घटना भूल सा गया।
दोपहर के
बाद कैमिस्ट्री का पीरियड था। कक्षा में काफी हलचल थी। नई अध्यापिका कैसी
होगी,
जानने की सभी को उत्सुकता थी। जैसे ही नई अध्यापिका ने कक्षा में प्रवेश
किया नन्दू हक्का बक्का रह गया। अरे! यह तो सुबह वाली ही लड़की थी। नील
धोबी,
जो
कि नन्दू के ठीक पीछे वाले डेस्क पर बैठता था ने आगे झुक कर नन्दू के कान
में फुस्फुसाया- "अरे यह तो मेरी पड़ोसन है।" अब तक अध्यापिका संभल चुकी
थी। अपना बैग सामने मेज़ पर रख कर उसने एक बार मुड़ कर ब्लैकबोर्ड की तरफ
देखा और फिर विद्यार्थियों पर नज़र दौड़ाई। अध्यापिका ने बहुत ही सधी हुई और
रौब भरे स्वर में कहा- "मैं आप लोगों की नई रसायन शास्त्र की अध्यापिका
हूँ।" उसने अपना परिचय देते हुए बताया कि अभी अभी वह अपनी पढ़ाई पूरी करके
वापिस इस शहर में लौटी है।
अध्यापिका
क्या कह रही थी,
नन्दू बिल्कुल नहीं समझ पा रहा था। अभी तक वह इसी सोच में अटका हुआ था कि
यह सब क्या हो रहा है। जो कहानी उसने अपनी कल्पना में सीधी सपाट सड़क की
तरह लिखी थी,
अचानक ही पहाड़ी रास्तों पर चल निकली थी। अब क्या करेगा?
अध्यापिका की छोटी बहन के साथ छेड़खानी! अगर उस ओर से सकारात्मक प्रतिiक्रया
न हुई तो?
उसकी प्रेम कहानी तो बुरी तरह से उलझ जाएगी। कैसे सुलझाएगा इस उलझन को?
वह
जितना सोचता उतना ही अपनी सोच की गर्त में उतरता जाता। इधर अiध्यापिका
ने विद्यार्थियों का विषय ज्ञान जानने के लिए,
हर
विद्यार्थी से प्रश्न पूछने शुरु कर दिए थे। नन्दू को इसका भी होश नहीं था।
हर विद्यार्थी क्रमानुसार प्रश्नों का उत्तर दे रहा था। बारी नन्दू तक
पहुँच चुकी थी,
पर
वह तो कक्षा में था ही नहीं। देह यहाँ थी तो आत्मा प्रेमिका को
’ढने
के लिए मजनू की तरह किसी मरुस्थल में भटक रही थी। अध्यापिका उसे सम्बोधित
कर रही थी पर नन्दू वहाँ होता था तो उत्तर दे पाता। अन्त में अध्यापिका ने
ठीक सम्मुख खड़े होकर नन्दू को पुकारा तो एक दम हड़बड़ा कर नन्दू
वास्तविकता की दुनिया में लौट आया। प्रश्न क्या किया गया था,
मालूम होता तो उत्तर देता। बस हकला कर रह गया। प्रेमिका की बड़ी बहन प्रश्न
कर रही थी। ज़मीन तो वैसे ही पैरों तले से निकल चुकी थी। उसके चहरे के बदलते
हुए रंग देखते हुए अध्यापिका ने गौर से उसके चेहरे को देखते हुए कहा- "अरे!
तुम्हें तो मैंने पहले भी कहीं देखा है। " फिर पहचानते हुए कहा "तुम तो
सुबह मेरे घर के पास खड़े किसी की प्रतीक्षा कर रहे थे। वहीं पर कहीं रहते
हो क्या?"
नन्दू को काटो तो खून नहीं! बस सर झुका कर खड़ा रह गया। नील धोबी के,
जो
बहुत रुचिपूर्वक यह वार्तालाप सुन रहा था,
सुनते ही कान खड़े हो गए कि नन्दू उसकी गली में खड़ा प्रतीक्षा कर रहा था -
तो किसकी?
इधर नन्दू भगवान से मना रहा था कि किसी तरह से यह अध्यापिका उसका पीछा
छोड़कर आगे को बढ़े। नील धोबी क्या सुन रहा है,
अभी उसे इसकी चिन्ता नहीं थी। अध्यापिका थी कि वहीं अटक कर रह गई थी। जैसे
उसके बारे में सब जान लेना चाहती थी,
सो
बोली-
"उत्तर
क्यों नहीं देते?
मैं तुम्हीं से पूछ रही हूँ।"
किसी तरह
से नन्दू ने साहस बटोर कर कहा-
"जी
मिस,
मैंने सुना नहीं कि आप प्रश्न क्या पूछ रहीं थीं।" अध्यापिका ने प्रश्न फिर
से दोहरा दिया और नन्दू फिर भी उत्तर नहीं दे पाया। अध्यापिका जो उसे अब तक
अच्छे से पहचान चुकी थी,
ने
हल्के से डाँटते हुए कहा-
"
ध्यान से
पढ़ा करो। मैंने तुम्हें छत पर पढ़ते हुए देखा है। तुम पुस्तक में कम और
लोगों के घरों में ताँक-झाँक अधिक करते हो। अभी पिछले रविवार जब मैं छत पर
बाल सुखा रही थी तो तुम मुँडेर पर खड़े मेरी तरफ क्या देख रहे थे?
कुछ पढ़ा लिखा करो।"
अध्यापिका कह कर अगले विद्यार्थी की तरफ बढ़ गई। नन्दू लज्जा के मारे पाताल में समा गया। यह क्या हुआ? कन्या तो उसकी अध्यापिका निकली। वो छत पर बाल सुखाती हुई सुकुमारी और यह अध्यापिका!! उसका मन मानने को अभी तैयार ही नहीं था। उसके सपनों का संसार तो बसने से पहले ही उजड़ गया। पिछले डेस्क पर नील धोबी मुँह पर हाथ रखकर खी-खी करता हुआ हँस रहा था। अब प्रेम कहानी तो अधूरी थी ही, साथ ही साथ नील धोबी की बातें भी सुननी पड़ेंगी। सोचते हुए नन्दू भाई अपनी सीट पर लगभग गिर ही गया। इस घटना या दुर्घटना के पश्चात स्कूल में क्या हुआ, नन्दू को याद नहीं रहा। बाकी समय किसी तरह से वह अपने आप के समझाने की चेष्टा करता रहा। नील धोबी से भी नज़रें बचाता रहा। छुट्टी होने के पश्चात वह पाँव घसीटता हुआ घर की दिशा में चल दिया। दिमाग में अभी भी इश्क का भूत तहलका मचा रहा था। रह रहकर तरह तरह के विचार मन में कौंध रहे थे। अचानक उसे रास्ता मिल ही गया। सोचने लगा कि अगर "मेरा नाम जोकर" फिल्म में एक विद्यार्थी अपनी अiध्यापिका से प्रेम कर सकताहै तो वो क्यों नहीं। नन्दू का प्रेम अभी जीवित था। .....और शुद्ध फिल्मी ज्ञान ही इस आड़े समय मार्गदर्शन कर रहा था। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|