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| 01.26.2008 |
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’मदिराल” - हालावाद पर प्रहार |
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ऐसा बहुत कम पाया जाता है कि कोई साहित्यकार अपनी चिरपरिचित शैली को ताक पर रख कर अपने सामाजिक दायित्व को निभाने के लिए एक ऐसा काव्य रच दे जो बहुजन हिताय की भावना से ओत-प्रोत हो। अपने अन्तर्मन में उठे ज्वार को कविता में ढाल दे जो प्रचिलित विचार-आचार धारा के विपरीत हो। “मदिरालय” प्रो. हरिशंकर आदेश का मौलिक रूप में कवि आदेश का हालावाद का विरोधी स्वर है। आदेश जी कवि को न केवल युग की वाणी मानते हैं अपितु उसे युग-निर्माता, विचारक और मार्ग-दर्शक भी स्वीकार करते हैं। ऐसे में अगर कवि ही समाज को नष्ट कर देने में सक्षम मदिरा के गुणगान करने लगें तो महाकवि का हृदय निश्चय ही चीत्कार उठेगा और यही चीत्कार “मदिरालय” के रूप में उठी है। कवि अपने सहकर्मियों का आह्वान करता है – जागो! जागो! कवि गण जागो! “मदिरालय” प्रो. हरिशंकर आदेश द्वारा रचित परिवर्द्धित संस्करण एक अप्रतिम रचना है। यह पुस्तक अलंकृत भाषा के धनी महाकवि आदेश ने यह काव्य रचते हुए लक्षणा, व्यंजना, प्रतीक, मिथक, रूपक आदि सभी को त्याग कर अभिधा को अपनाया है – सम्भवत: कवि नहीं चाहता था कि उसका संदेश कविता के लालित्य में लुप्त हो जाए। इसी लिए महाकवि ने सीधी-स्पष्ट भाषा में अपना संदेश पाठकों के आगे प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक की पहली चतुष्पदी (रुबाई) से लेकर अंतिम पंक्ति तक मदिरापान के कुपरिणामों को प्रस्तुत किया गया है। सभी समाज और धर्म यह स्वीकार करते हैं कि नशीले पदार्थों का सेवन न केवल व्यक्तिगत संहार का मूल है अपितु समाज और धर्म का भी समूल नाश करने में समर्थ है। महाकवि आदेश का भी यही संदेश इस पुस्तक में उनके काव्य में प्रस्तुत हुआ है। किसी भी साहित्यकार के साहित्य को समझने के लिए उसके
व्यक्तित्व से परिचत होने के बाद ही हम उसके साहित्य को पूर्ण रूप से समझ
पाते हैं। आदेश जी के विषय में जो लोग जानते हैं वह उनके व्यक्तित्व के
विभिन्न आयामों से भली भाँति परिचित हैं। प्रो. हरिशंकर आदेश न केवल
उच्चकोटि के साहित्यकार हैं बल्कि वह संगीताचार्य, समाज सुधारक और धर्म
प्रचारक भी हैं। भारत में रहते हुए उनके व्यक्तित्व के पहले तीन रूपों से
ही उनके मित्रगण परिचित थे। उनका धर्म प्रचारक का रूप ट्रिनिडाड में रहते
हुए सामाजिक परिस्तिथियों वश विकसित हुआ। मदिरालय पढ़ते हुए उनके तीनों
रूपों के दर्शन उनकी कविता में स्पष्ट होते हैं। जाने वाला जब जाता है, आदेश जी एक धर्मप्रचारक की तरह लौट लौट कर इस पुस्तक में पाठकों को सम्बोधित करते हैं कि किसी भी धर्म को मदिरा स्वीकार्य नहीं है और पीने वाले को हर उपदेश उल्टा ही समझ आता है – विष से लगते उपदेश सकल, सामाजिक चरित्र हनन के विषय पर भी कवि ने पर्याप्त मात्रा में इस पुस्तक में लिखा है। महाकवि कहते हैं- आशाओं के मरघट हैं ये, प्रो. हरिशंकर आदेश जी ने यूँ तो हर रस में बहुत लिखा है, परन्तु जिन पाठकों को उनके द्वारा रचित महाकाव्यों को पढ़ने का सौभाग्य मिला है वह भली भाँति इस तथ्य से परिचित हैं कि सौन्दर्य रस उनको अधिक प्रिय है। मदिरालय की रचना करते हुए शायद यह सम्भव ही नहीं था कि इस रचना में सौन्दर्य का कोई स्थान होता। हाँ वीभत्स रस के दर्शन अवश्य होते हैं कई पन्नों पर। इस पुस्तक का आवरण मैंने बनाया है और उसे बनाते हुए मेरे अन्तर्मन पर भी इसी रस का प्रभाव था जो कि स्पष्ट रूप से चित्र में उतर आया है। आकर देखो उस कोने में, आदेश जी का कहना है और यह सच भी है कि जो प्रतीक हालावाद का मूल है वह विदेशी हैं। भारतीय संस्कृति, सभ्यता या सामाजिक परिवेश में उनका कभी स्थान नहीं था। इस हालावाद के प्रतीकों की आलोचना नहीं करते आदेश जी बल्कि उन्हें गलत संदर्भ में (भारतीय परिवेश में) प्रयोग किए जाने पर उन्हें आपत्ति है- फारसी और उर्दू से ले, अगले अंक में मदिरालय के अन्य
पक्षों की समीक्षा – क्रमशः |
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