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| 02.11.2008 |
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मध्यवर्गीय पारिवारिक मान्यताओं पर खुलती
"खिड़की" सुमन कुमार घई |
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साहित्य कुंज में कुछ अंक पहले इला प्रसाद की कहानी
“खिड़की”
प्रकाशित हुई थी। जबसे यह कहानी पढ़ी है तब से मन में इस कहानी के विषय
में
कई
विचार
उठ रहे हैं। कोई आवेशपूर्ण नहीं – क्योंकि कहानी आवेशपूर्ण नहीं है
परन्तु यह कहानी लोक-मान्यताओं पर चोट करने में हिचकिचाती भी नहीं है।
कहानी की नायिका मानो मुस्कुराते-मुस्कुराते अपने मन का रोष व्यक्त कर
देती है। इसी भाव को प्रतिबिम्बित करते हुए मेरे मन में भाव उठे हैं।
कथानक नया नहीं है – मध्यवर्गीय सफेदपोश परिवार में पत्नी पर लगाए गए
प्रतिबन्ध। पर नयापन इस विषय की अभिव्यक्ति में है। नयापन इस कथानक के
प्रतीक में है। नयापन रूपकों में है।
नायिका
की इच्छा है कि एक खिड़की हो घर में जो कि बाहर की दिशा में खुले। वह उस
खिड़की से झरती हुई स्वतन्त्रता में जी सके; वैसे तो घर में और भी
खिड़कियाँ हैं जो घर के अन्दर ही या पिछवाड़े में खुलती हैं। पर नायिका
की इच्छा ऐसी खिड़की की है जो बाहर की दुनिया को घर के अन्दर लाए। पति
को यह कदापि पसन्द नहीं है। इला प्रसाद ने इसी वैचारिक खींचा तानी को
ही रोचकता से प्रस्तुत किया है। लेखिका की कुशलता है कि उसने सभी
पात्रों के चरित्र कहानी में बुन दिये हैं। बिना किसी औपचारिक परिचय के
भी आप उनके चरित्रों और वृत्तियों से परिचित हो जाते हैं। शादी से पहले
के जीवन के बारे में नायिका अपनी सामान्यता और लगभग भीड़ में से एक होने
की वृत्ति को स्पष्ट कर देती है। विवाह के बाद ऐसी समझौतावादी युवती से
ठीक यही अपेक्षा की जा सकती है जिसकी इला प्रसाद ने इस कहानी में
कल्पना की है। नायिका कहती है –
“मैं
अच्छी लड़की बनी रही और एक दिन इन्हें पारंपरिक तरीके से ब्याहकर इस घर
में आ गई।... मुझे तो अच्छा ही लगा। कौन फालतू के झमेले मोल ले।“
परन्तु नायिका ऐसी भी नहीं है जो कि स्वतन्त्र विचारधारा न रखती हो।
परिस्थितियों, मान्यताओं और दकियानूसी विचारों पर प्रश्नचिह्न लगाने की
क्षमता है उसमें। अपनी बात को मनवाने का धैर्य भी है उसके चरित्र में।
परिवार में शांति बनी रहे, संतुलन न बिगड़े यह भी जानती है वह। अपनी
खुशी वह पिछवाड़े में फुलवारी लगा कर ढूँढ लेती है। परन्तु विवाह से
पहले की जीवन की स्वतन्त्रता तो उसमें रची-बसी है। वह कुछ और करना
चाहती है पर पति की मध्यवर्गीय सोच और दकियानूसी विचार उसे घर की
चारदिवारी से बाहर नहीं देखना चाहते। अगर वह आगे पढ़ना चाहती है या
नौकरी करना चाहती है उसकी भी अनुमति नहीं है उसे। इतने प्रतिबन्ध होने
के बाद भी नायिका अपने नारी-सुलभ धैर्य और कुशलता से खिड़की माँग रखती
है। उस खिड़क के औचित्य के पक्ष में तर्क भी प्रस्तुत करती है। घर की
आर्थिक अवस्था भी उसने समझ और सोच रखी है – अधिक खर्चा भी नहीं करवाना
चाहती पर उसका पति भी घाघ है। अपनी पत्नी की चतुरता खूब समझता है। हर
तर्क, हर चापलूसी को ठुकराता बात को महीनों खींच ले जाता है।
नायिका माँ बनने वाली है – अपने सपनों में खो जाती है कि बच्चे के
बहाने ही बाहर की दुनिया में निकल पाएगी। इसमें तो किसी को आपत्ति नहीं
होनी चाहिए। अब यहाँ भी पति का कहना –
“बेटा
है मेरा।“
नायिका को मात दे देता है।
“शौक
से गोद में लेकर कभी घर से निकल जाते। घुमाते। मैं घर में ... खोई
खिड़की को तलाशती हुई।“
और फिर एक दिन अचानक खिड़की बनवाने का निर्णय भी पति ही ले लेता है।
क्योंकि बेटे को बाहर की दुनिया से परिचित करवाने के लिए इस खिड़की का
होना आवश्यक है। पर अहसान पत्नी पर ही किया जाता है कि
“लो
खुलबा दी खिड़की तुम्हारे लिए।“
नायिका को खुशी नहीं है उसके मन में रोष है और विश्वास भी कि यदि बेटे
की जगह बेटी होती तो यह खिड़की का खुलना तो दूर; खुली खिड़कियाँ भी बन्द
करवा दी जातीं। पाँच साल के लम्बे अर्से में नायिका के अन्दर की वो
लड़की मर चुकी है –
“कहाँ
गई वो लड़की
? सोचती हूँ मैं। मैं इस खिड़की से बाहर झाँकती हूँ,
मेरे अन्दर कोई हलचल नहीं होती ब। कोई खुशी नहीं
जागती। मैं इस बच्चे को खिलखिलाता देखती हूँ और मुस्करा देती हूँ बस!
यह कहानी भारत के मध्यवर्गीय परिवारों की विशेषकर पति-पत्नी के
सम्बन्धों को पाठकों के समक्ष रखती है। यह तो अपेक्षा की
जाती है कि घर में बहू पढ़ी लिखी आए। परन्तु बहू की आर्थिक
स्वतन्त्रता से ससुराल भयभीत भी रहता है। इसीलिए विवाह होते ही बहू को
ऐसे चक्रव्यूह में फँसाने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है कि वह
पराश्रित ही रहे। किसी एक पीढ़ी पर इस सोच का दोष नहीं मढ़ा जा सकता। यह
तो हमारे मध्यवर्गीय सफेदपोशी की शायद आवश्यकता बन चुकी है। झूठा
मर्दाना गर्व अपनी पत्नी की कमाई
पर
“पलना”
नहीं चाहता। वास्तव में इस कठोर ऊपरी आवरण के नीचे पुरुष अपनी कमज़ोरी
को छिपाता है। वह जानता है कि आजकल के समाज में दो पहियों के बिना गाड़ी
नहीं चलती परन्तु जिस सोच की धरोहर उसे मिली है उसे उतार के फेंक देने
का साहस भी नहीं होता उसमें। अन्त में पुरुष की अपनी कुंठा और चरित्र
की शिथिलता नारी के ऊपर ही आकर टूटती है। कम से कम अपनी पत्नी पर
अनुचित प्रतिबन्ध लगा कर उस के आगे तो
“मर्द”
बने रहने का नाटक तो कर ही सकता है।
इला प्रसाद को इस कहानी के लिए बधाई देते हुए अपनी सोच पर विराम लगाता
हूँ। |
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