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05.03.2012
 
दीवाली का दिन
सुमन कुमार घई

हे राम! एक पल को भी आराम नहीं है
कौन कहता है बच्चों को कोई काम नहीं है

दोनों भाईयों में इस बरस दौड़ लगी है
किसका पहला पटाखा होगा होड़ लगी है
कई बार इसका गणित आंक चुके हैं
पटाखे साँझे कर फिर बाँट चुके हैं

आज फिर पापा साथ बाज़ार गए थे
उन्होंने भी कुछ पटाखे और लिए थे
पापा बोले "यह केवल मेरे हैं -"
हँस कर बोले, "न तेरे हैं, और न तेरे हैं"
हम जानते हैं पापा यूँ ही सदा कहते हैं
हमारे पटाखे खत्म होने पर हमें देते हैं

हर दुकान खूब सजी थी
तेली के भी भीड़ जमी थी
मोटू हलवाई भी खुश दिखता था
उसका माल भी खूब बिकता था

"चलो बच्चो दिये भिगो दो पानी में"
दादी माँ यूँ बोल रही हैं
"अब सब मिल रूई की बाती ओटो"
उनकी बातें रस घोल रही हैं

कई बार पापा से बोला "बेटा सुन ले
अभी लानी है ‘हाट‘, चावल की खीलें
खांड के खिलौने और चोमुख दिया भी लाना है
जल्दी घर आना अभी मन्दिर भी सजाना है"

बच्चों पर तो रात की प्रतीक्षा भारी है
उनकी तो सुबह से पटाखों की तैयारी है
साँझ होते ही हर चौखट पर दिये सजा रहे हैं
हर दीवार पर रंग-बिरंगी मोमबत्तियाँ लगा रहे हैं

"माँ जल्दी से पूजा करो हम क्यों रुके हैं
पड़ोस में तो पटाखे शुरु हो चुके हैं -

हे भगवान् तू भी तो कभी बच्चा होगा
आज हवा न चले तो अच्छा होगा
बार बार दिया मोमबत्ती बुझ जाती है
‘हवाई‘ भी तो उड़ कहाँ की कहाँ जाती है"

चल भैय्या फिर साँझ कर लेते हैं
मिला कर पटाखे देर तक चलते हैं
सुबह फिर हमें जल्दी जल्दी उठना है
मेहतर से पहले अनचले बमों को चुगना है
दीवारों पर बिखरी मोम को जमा करेंगे
फिर पिघला कर क्या क्या खिलौने बनेंगे

हे राम! एक पल को भी आराम नहीं है
कौन कहता है बच्चों को कोई काम नहीं है

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