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| 12.01.2007 |
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असली-नकली सुमन कुमार घई |
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“लगता
है कि तुम अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आओगे!”
“मैंने
अब क्या कर दिया?”
प्रेमी ने भोले बनते हुए कहा।
“सब
देख रही हूँ और जानती भी हूँ। बैठे
यहाँ हो और दिल तुम्हारा कहीं और है। मैं इतनी गम्भीर समस्या से घिरी हूँ
और तुम अपना ओछापन अभी भी दिखा रहे हो। यह नहीं कि कुछ समाधान सोचो,
कुछ दिलासा दो.. बस थोड़ी देर के लिए नज़र इधर हुई और तुम्हारी नज़र फिसलने
लगी।”
लड़की निरन्तर बोले जा रही थी और प्रेमी सुना अनसुना सा कर रहा था।
“तुम
भी तो गम्भीरता से किनारा करके मीनू में ऐसे खो गई थी जैसे कि कोई उपन्यास
हो।”
अवसर पाते ही उसने भी दलील देने की चेष्टा की।
“मैं
तो यहाँ पर तुमसे कुछ समर्थन की आशा लेकर आई थी। मुझे क्या मालूम था कि तुम
सड़क-छाप रोमियो की तरह गोरियों को ही देखते रहोगे.. वह भी मेरे सामने ही!”
कहते-कहते प्रेमिका का स्वर लड़खड़ाने लगा था।
“नहीं,
नहीं ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ। ज़रा दृष्टि ऊपर की तो सामने वह ब्लाँड बैठी
थी- मैं क्या करता,
कौन सा मैं तुम्हें छोड़कर वहाँ जा बैठा हूँ।”
लड़के ने फिर बात को बदलते हुए कहा-
“जो
तुमने सोचा है वह कोई समाधान तो नहीं है। तुम बात को लटका रही हो। साफ़-साफ़
क्यों नहीं कह देती अपने मम्मी-पापा से। जो होना है एक बार में ही हो जाए।”
“क्या
कहूँ?”
“बस
यही कि अगर तुम विवाह करोगी तो केवल मुझसे -..”
“फिर
वही बात,
अरे बाबा तुमसे कितनी बार कह चुकी हूँ कि जब तक तुम कोई काम-धन्धा नहीं
करने लग जाते तुम्हारे विषय में तो मैं मम्मी पापा से कोई बात कर ही नहीं
सकती।”
लड़की ने उसकी बात को काटते हुए कहा।
“क्या
करूँ,
हर
सम्भव प्रयत्न कर रहा हूँ।”
कहते कहते प्रेमी का स्वर धीमा हो गया था। एक मायूसी छाने लगी थी उस टेबल
पर। कुछ क्षण ऐसे ही बीत गए। मैं भी सोचने लगा कि कुछ नहीं होने वाला यहाँ।
यह नया-नया सा प्रेम,
फुटबाल की तरह कभी प्रेमी-प्रेमिका के मैदान में और कभी माँ-बाप के मैदान
में लुढ़कता ही रहेगा। ऐसे ही भारी से क्षण बीतते गए। फिर लड़की कहने लगी-
“मेरे
लिए तो बात करना ही कठिन है प्रेम के विषय में पापा के सामने।”
“अभी
तो कह रही थी कि अगर मम्मी-पापा ने विवाह के लिए जोर डाला तो अड़ जाओगी। अब
क्या हुआ?
थोड़ा सोचो- तुम भारत में पैदा हुई- दुबकी,
सहमी बेटी तो नहीं। आख़िर विदेश में पैदा हुई,
पश्चिमी सभ्यता में पली-बड़ी हुई स्वतन्त्र महिला हो।”
प्रेमी ने प्रेमिका में साहस पैदा करने के लिए भाषण दे डाला।
“यही
तो त्रसदी है हमारी पीढ़ी के भारतीय मूल के बच्चों की!”
“क्या
कहती हो?
कुछ समझा नहीं।”
“बस
यही सोचती हूँ सदा। सत्य है कि पैदा तो हम पश्चिमी धरती पर हुए हैं,
पर
यह भी सत्य है कि भारतीय सभ्यता से भी पृथक नहीं हुए हैं। घर के बाहर,
अपने मित्रों में चाहे जितना भी पश्चिमी आचरण करें पर दिनान्त पर हम रहते
भारतीय के भारतीय ही हैं।”
“सभी
तो ऐसा नहीं करते। अभी अपने मित्रों को ही देख लो- कोई कह सकता है उन्हें
देखकर कि वह कनेडियन नहीं हैं- बस चमड़ी के रंग को छोड़कर।”
“हाँ
सब बिन पैंदे को लौटे की तरह ही तो हैं। किसी ठोस मूल के साथ कहीं बंधे ही
नहीं हैं। वह तो ऐसे पेड़ की तरह हैं जिसकी जड़ ही नहीं है। हल्का सा भी
धक्का लगा कि गिर जाएँगे।”
“ऐसी
गम्भीर बाते करके तो मेरा मूड भी उदासी-भरा कर रही हो। जो है-सो है,
हम
दोनों के सोचने और कहने से क्या होता है।”
“यही
तो कह रही थी कि क्या त्रसदी है। कहने को माता-पिता हमारा मार्गदर्शन कर
रहे हैं कि हम लोग कहीं पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से बिगड़ न जाएँ। इसी
कारण वह हमारी पीढ़ी को उन बेड़ियों में जकड़ देना चाहते हैं जो कि आजकल
भारत में भी युवावर्ग
को
नहीं पहनाई जातीं।”
“यह
तो तुम ठीक कहती हो।”
लड़के ने समर्थन किया। और मैंने भी स्वयं को उस लड़की बातें सुनकर,
गहरी सोच में डूबते हुए पाया। कितना सच था इस छोटी सी लड़की की बातों में।
“अब
हम दोनों को ही देखो। हम दोनों एक दूसरे को चाहते हैं। प्यार करते हैं और
विवाह के बन्धन में बंध कर जीवन-साथी बनना चाहते हैं.. पर न तो तुम अपने
माँ-बाप को बिना किसी डर के कह सकते हो और न मैं ही। अगर कहें भी तो बिना
किसी नाटक के बात नहीं बनेगी।”
“जानता
हूँ। सबसे पहला प्रश्न होगा- लड़का क्या करता है?
उसके माँ-बाप क्या करते हैं?”
कहते-कहते लड़का झूठी सी हँसी हँसने लगा। मुस्कुराहट की हल्की से रेखा
लड़की के होंठों पर भी बिखर गई।
“हाँ
बस सब कुछ थोथा सा है। जीवन के सभी मूल्य बदल से गए हैं हमारे से पहली पीढ़ी
के। हमारे माँ-बाप कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। स्वयं ही कहते हैं कि
परस्पर मानवीय सम्बन्ध सर्वोपरि हैं और विवाह के विषय में पैसा ही सब कुछ
हो जाता है। जात-पात,
लेन-देन चाहे न भी हो इस समाज में,
पर
यह बात उनके मन में उठती अवश्य है।”
“हाँ,
मेरा भी अनुभव कुछ ऐसा ही है। हमारे माँ-बाप ने तो अपनी समझ के अनुसार अपना
जीवन जी लिया। अब हमें ही कुछ ऐसा करना होगा कि अपने जीवन में इन दोनों
सभ्यताओं को संतुलित रखें। माँ-बाप का सम्मान रखना अगर हमारा धर्म
है
तो अपने अनुसार जीवन जीना स्वधर्म
है। यदि हम दोनों का प्रेम दृढ़ है तो ऐसा कर पाना भी कठिन नहीं है।”
“क्या
करें दो संस्कृतियों का टकराव है। और हमारी पीढ़ी अपनी संस्कृति का अन्वेषण
स्वयं ही कर रही है। माँ-बाप भारतीय संस्कृति हम पर लाद देना चाहते हैं,
जबकि स्वयं वह भी उसका अनुसरण नहीं करते। जब भी देखो मम्मी अपनी
“किट्टी
पार्टी”
में व्यस्त रहती है। होता क्या है वहाँ?..
वही जुआ या दूसरों की चुगलीबाजी। हमारी भारतीय सभ्यता तो यह नहीं कहती।”
लड़की ने फिर से कहा।
“मेरे
घर में तो इससे भी एक कदम आगे का वातावरण है। दादा जी,
जब
भी अवसर मिलता है,
धर्म,
सभ्यता,
भाषा या संस्कृति का भाषण देते रहते हैं,
और
स्वयं महीने में दो बार
“केसिनोरामा”
जाकर जुआ खेलना नहीं भूलते। हर शाम
“माल”
में बैठकर आने-जाने वाली सभी महिलाओं को घूरना भी उनकी संस्कृति का ही अंग
है।”
लड़के ने मुस्कुराते हुए कहा।
लड़की ने
ठंडी साँस भरी। चेहरे पर गम्भीरता के बादल छाए थे। प्रेमी के मुस्कुराने का
उत्तर भी मुस्कुरा कर न दे पायी। फिर आगे को झुककर बोली-
“चलो
कुछ खाने के लिए लिया जाए। हम दोनों के कहने-सुनने से क्या होगा। न तो कोई
हमें समझता है और न ही समझना चाहता है। अपने मूल को हम भूल नहीं सकते और
नये वातावरण में कोई जीने नहीं देता।”
कहते कहते वह अपनी सीट में पस्त सी होकर ढलक गयी।
वातावरण
बहुत ही गंभीर हो चुका था। मैं भी उस लड़की बातों की सत्यता का कड़वापन
अनुभव कर रहा था। मेरी पीढ़ी की ही तो बात कर रही थी। कई मेरे भूले हुए
अनुभव इस बाला ने कुरेद डाले थे। मेरे मित्र विनोद का चेहरा उभर के सामने आ
गया। एक पार्टी
में,
नशे में धुत्त होकर भारत लौट जाने की रट लगा रहा था। बार कहता था कि वह
यहाँ रहा तो उसके बच्चे बिगड़ जाएँगे। बड़े होकर शराब पियेंगे इत्यादि। कुछ
ऐसे मित्र भी याद आए जिनका यहाँ आने का मुख्य उद्देश्य ही विदेशी लड़की से
विवाह करना था। और स्वयं वही लोग अपने बच्चों पर इतने बंधन लगाते हैं। कभी
सोचता हूँ कि ऐसे लोगों को अपनी सन्तान पर विश्वास नहीं या वह स्वयं अपने
ही भूत की भूलों को सुधारने का प्रयत्न कर रहे हैं।
इस असली
नकली साज-सजावट वाले इतालवी रेस्त्राँ में बैठा मैं सोच रहा था कि हमारी नई
पीढ़ी कितनी असली है और हमारी पीढ़ी कितनी नकली। क्या हम कभी इस नयी पीढ़ी को
सुनने कि या समझने की चेष्टा
भी करते हैं। अधिकतर मैं स्वयं को और अपने मित्रों को भाषण देते हुए तो
देखता हूँ पर सुनते हुए नहीं। यहाँ पर बैठा मैं उन दो प्रेमियों का
विश्लेषण करने की अपेक्षा स्वयं का विश्लेषण करने में खो चुका था। लगने लगा
कि हमारी पीढ़ी बाहर खड़ी क्षत-विiक्षत
नकली मूर्तियों की तरह है और यह नयी पीढ़ी का युवा वर्ग
उनपर चढ़कर,
यहाँ की स्वतन्त्र वायु में लहरा जाने की चेष्टा करती असली बेलें। |
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