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05.03.2012
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असली-नकली
सुमन कुमार घई

अरे! फिर बिगड़ उठी! सब सुन रहा हूँ। वैसे कोई दूसरी सीट मिल जाती तो अच्छा रहता। परिचारिका से तुमने कुछ कहा क्यों नहीं दूसरी सीट के लिए?” लड़के ने आश्वासन देने का प्रयत्न किया था,  जो कि बिल्कुल उसी की तरह थोथा था।

 (“अरे घोंचू कुछ सुनो तुम्हारी प्रेमिका क्या कह रही है तुम्हें! वह अपने माँ-बाप से उत्पीड़ित है.. उसे तुम्हारी सहानुभूति चाहिए और तुम्हें आस पास के दृश्यों में अधिक रुचि है। मेरे मन में भाव उठा कि इस लड़के का कान खींचकर कहूँ।)

 नहीं कहा। कहना भी नहीं चाहती थी। मुझे यहीं बैठना था ताकि तुम इधर-उधर ताक-झाँक न कर सको और मेरी बात सुनो। लड़की ने कुछ शिकायत भरे और कुछ गुस्से में लिपटे स्वर में कहा।

लड़के को शायद आस-पास कुछ भी रोचक नहीं दिखा तो उसने अब प्रेमिका में रुचि लेते हुए पूछा-

कैसे हुआ यह सब? शुरू से बताओ।

होना क्या था, वही पुरानी कहानी। मम्मी ने बोला बेटी तेरे पापा के मित्र ने तुम्हारे लिए रिश्ते की बात की है। लड़का देखने में अच्छा लगता है। अच्छी नौकरी करता है और परिवार भी ठीक है। देख लेने में तो कोई हर्ज़ नहीं।

 तुमने क्या कहा?” प्रेमी चौकन्ना हो गया। यहाँ तो प्रेमिका के छिन जाने का डर पैदा हो गया था।

 कहती क्या? वही पुराना बहाना- मैंने नहीं करनी अभी शादी! पर मम्मी मानती कब हैं। पापा का दबाव जो रहता है उन पर। अपनी माँ को बचाते हुए उसने उत्तर दिया।

 फिर तुम अपने पापा से स्पष्ट क्यों नहीं कह देती?”

 क्या कहूँ? कि तुमसे विवाह करना चाहती हूँ।

 हाँ क्यों नहीं? तुम क्या मेरे से प्यार नहीं करती?”

 करती हूँ, पर खाली प्यार से तो जीवन नहीं बसर होता। कोई काम-धाम करने वाला लड़का भी तो चाहिए। तुम्हारी तरह बेकार तो नहीं।

 यह तुम अपने पापा की भाषा कब से बोलने लगी?”

 सच तो यही है। पापा काल्पनिक नहीं व्यावहारिक बात करते हैं। देखो कितना सफल जीवन जिया उन्होंने। लड़की के स्वर में गर्व की झलक थी, और अब लड़के के तुनकने की बारी थी-

चोर-बाज़ारी करके सारा धन संचित किया है तुम्हारे पापा ने। कभी भी उन्होंने किसी से प्यार नहीं किया होगा जीवन भर सिवाय पैसे के। लड़के ने क्रोध भरी वाणी में कहा- कम से कम मेरी तुलना तो न करो ऐसे व्यक्ति के साथ।

 खबरदार जो मेरे पापा के बारे में कुछ भी कहा तो! सफल हैं तो चिढ़ते क्यों हो.. बेकार का आदमी! करते हैं प्यार मुझसे! मेरी मम्मी से!! लड़की हुंकार उठी।

प्रेमी को ऐसी प्रतिक्रिया की आशा नहीं थी। वह घबरा गया। वह तो केवल अपने मर्द होने का प्रमाण देना चाहता था प्रेमिका के पिता पर आक्रमण करके। वह स्वयं भी तो उसके लिए अपने माँ-बाप से लड़ती रहती है। अगर अब उसने दो शब्द कह दिये तो इतनी आपत्ति क्यों? बात को सम्भालते हुए लड़के ने कहा-

 अरे, जाने दो। बस ऐसे ही कह गया। बात यह है कि अगर कोई तुम्हें यातना दे तो मुझे से सहा नहीं जाता। तुम्हारे पापा तुम पर दबाव डालते हैं तो तुम्हें भी तो अच्छा नहीं लगता। घंटों रोती हो। बस तुम्हारे आँसू ही मेरा हृदय छलनी कर देते हैं।

लड़के ने भावनात्मक ढंग से फ़िल्मी संवाद से सुना डाले। स्पष्ट रूप से नाटकीयता झलक रही थी। मैं भी सम्भल कर बैठ गया कि देखें बात सुधरती है कि बिगड़ती है। प्रेमिका का मानसिक स्तर कैसा है जो इन झूठी सी बातों में उलझता है या यथार्थ का भान होता है उसे। साधारणतया प्रतिक्रिया वही होती जो मैं नहीं चाहता। शायद बहुत अधिक यथार्थवादी हूँ। भावुक नहीं, सो सदा की तरह मेरा अनुमान गलत ही निकला। शायद प्रेमी को वह सारे बटन पता थे जिनको दबाने से प्रेमिका पिघल जाती थी।

 जानती हूँ कि तुम मुझे सबसे अधिक प्यार करते हो। मुझे जन्म देने को बाद मम्मी-पापा क्यों सोचते हैं कि मेरे जीवन के सारे निर्णय लेने का अधिकार केवल उन्हीं का है। प्रेमिका मोम की गुड़िया की तरह प्रेमी के हाथों में पिघल रही थी। अब प्रेमी उसे कोई भी रूप दे सकता था।

 तो फिर क्या हुआ? दूल्हा देखा अपने लिए क्या?” लड़के ने व्यंग्य भरी आवाज़ में कुछ आश्वस्त होते हुए पूछा।

 नहीं, इस बार मैं अड़ गयी। स्पष्ट कह दिया कि मैं अपनी मर्ज़ी से शादी करूँगी। किसीको भी मेरे लिए लड़का ढूँढने की आवश्यकता नहीं है। प्रेमिका ने गर्व से कहा।

 ठीक किया तुमने। पर मम्मी-पापा तो बिफ़र उठे होंगे।

 हाँ, ऐसा ही हुआ। झगड़ा खड़ा हो गया। मम्मी ने आँसू बहाने शुरू कर दिये पापा चीज़ों की उठा-पटक करने लगे। मैं तो डर गयी।

कहीं डर कर हाँ तो नहीं कर दी। प्रेमी घबरा रहा था।

हाँ तो कर दी, क्या करती। अकेली थी। तुम्हारा सहारा जो नहीं था। आखिर मेरे माँ-बाप हैं। उनका भी तो अधिकार है मुझ पर।

प्रेमी बुरी तरह से घबरा चुका था। उसने हकलाते हुए से कहा-

पर तुम्हीं ने अभी कहा था कि अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार केवल तुम्हें ही है। तो फिर हाँ कैसे कह दी।वह प्रेमिका के छिन जाने के भय से ग्रसित था।

 डरो नहीं सब सम्भाल लूँगी। लड़का देखने का बाद अन्तिम निर्णय तो मेरा ही होगा। सभी यही कहते हैं। तब नहीं मानूँगी।

 अगर फिर से तुम्हारे मम्मी-पापा ने यही Ïामा किया तो?”

 नहीं तब नहीं मानूँगी। आखिर मेरे जीवन का प्रश्न है।

 तुम्हारे ही नहीं मेरे जीवन का भी प्रश्न है। अकेले तो नहीं जियोगी मेरे बिना अपनी ज़िन्दगी।

 नहीं, पर तुम्हें भी तो कुछ करना होगा।

 क्या?”

 जैसे कि कोई नौकरी वगैरह ढूँढो। बेकार में घूमते रहने से तुम्हारे बारे में लोग पता नहीं क्या क्या कहते हैं?”

 

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