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05.03.2012
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असली-नकली
सुमन कुमार घई

"आज फिर घर में झगड़ा खड़ा हो गया। लड़की ने बैठते हुए कहा- "फिर वही बातें और मम्मी पापा के वही तर्क। क्या करती?”

   "उँह, फिर से अच्छी सीट नहीं मिली। हमें सदा इसी कोने में क्यों बैठना पड़ता है.. बाहर तक नहीं देख सकते। लड़के ने कहा।

   "क्या!! मैं इतनी गम्भीर बात कर रही हूँ और तुम्हें कौन सी जगह से बाहर का अच्छा दीखता है की चिन्ता है। यहाँ मेरे जीवन का सवाल है और तुम्हें सीट की लगी है। लड़की थोड़ा तुनक उठी।

मेरे कान भी अब तक खड़े हो चुके थे। चलो आज का रेस्त्राँ में आना बेकार नहीं गया।मन ही मन सोच कर एक रोमांच की लहर उठने लगी। "आज मेरी अगली कहानी का समझो विषय मिल ही गया। सोचकर, थोड़ा आश्वस्त सा होकर कॉफ़ी की चुस्की ली और कुछ उस दिशा में सरक गया ताकि आगे की बातचीत ज़रा ठीक से सुन सë। मुझे दूसरों की बातचीत सुनने में कोई रस नहीं आता और न ही मैं ऐसी कोई मानसिक प्रवृत्ति से ग्रसित हूँ कि यह सामाजिक रूप से गलत ठहराया हुआ काम करूँ। दूसरों की व्यक्तिगत बातचीत सनूँ। परन्तु क्या करूँ, लेखक जो ठहरा। चाहे घटना कितनी भी साधारण क्यों न हो और वाद-विवाद कितना भी मामूली हो, राई का पहाड़ बनाना, मेरा  पेशा जो ठहरा। इसीलिए ऐसे घटनाक्रमों या वाद-विवादों को सहज में ही ढूँढ निकालता हूँ, ठीक उसी तरह जैसे शिकारी कुत्ता गन्ध से अपना शिकार। यह इतालवी रेस्त्राँ, बस यूँ समiझये मेरा मचान है और शिकार यहाँ स्वयं चल कर आता है। अचानक ही एक दिन खाने के लिए किसी के साथ चला आया था यहाँ। इस रेस्त्राँ की साज सज्जा बहुत रोचक लगी। अन्दर घुसने से पहले ही यूँ लगने लगता जैसे आप इटली में ही पहुँच गये हैं। वही पुरातन रोम की शैली में बने नकली स्तम्भ और स्थान-स्थान पर रखी क्षत-विक्षत मूर्तियाँ। उन पर जमती हुई नकली काई और चढ़ती हुई असली बेलें। गलियारा भी कुछ उबड़-खाबड़ पत्थरों का बना हुआ, इटली की किसी पुरानी गली का आभास देता है। दोनों तरफ़ मेहराबदार छोटी-छोटी दुकानों में सजाया हुआ खाना और गलियारा मध्य में जहाँ एक गाँव के चौंक की तरह हो जाता है, वहाँ पर एक फव्वारा। बहुत ही रोचक है यह जगह। ऐसा भान होता है कि आप न केवल दूसरे देश में हैं अपितु समय-काल भी कुछ पीछे का ही है।

पहली बार जब यहाँ आना अच्छा लगा तो दूसरी बार स्वयं ही चला आया। परिचारिका ने मुझे यही कोने वाली सीट दी थी। अकेला था इसीलिए। यूँ तो बहुत बड़ा है यह रेस्त्राँ। गलियारे के दोनों तरफ़ कई कमरे बने हैं और सभी की साज-सज्जा अलग-अलग है - पर है सब कुछ इतालवी शैली में ही। यह सीट बिल्कुल पीछे जाकर थी। छोटा सा एक कोने में मेज़ और दो कुर्सियाँ। मेज़ पर सामान्य वस्तुओं के अतिरिक्त एक फूल वाला फूलदान। यह मेज़ पर बैठने वालों को थोड़ा एकान्त का आभास देने के लिए, गमलों कुछ नकली पौधों का पर्दा सा बना दिया गया है। नकली पौधों से नकली एकान्त का आभास! फिर भी मेरे लिए तो बिल्कुल सटीक बैठती है यह जगह। इसी नकली एकान्त के आभास के पदे| के पीछे मैंने अनेक लोगों को अपने मन की गुत्थियों को खोलते हुए सुना है। और फिर पन्नों पर उतारा भी है। अकेला आता हूँ तो केवल कॉफ़ी के सिवा कुछ भी नहीं लेता, कुछ कागज़ बिखरे रहते हैं मेरे सामने और कुछ लिखने का अभिनय करता रहता हूँ। पहले-पहल जब आकर कई बार एक कॉफ़ी का कप लेकर घंटो बैठा रहा तो बैरे ने आपत्ति की थी और मैनेजर को भी बुला लाया था। मैनेजर ने बड़ी संजीदगी से कहा था, "महोदय, यहाँ पर यूँ ही बैठे रहने की अनुमति नहीं है।

 "कॉफ़ी पी तो रहा हूँ। मैंने तर्क दिया था।

"वह तो ठीक है, पर आपको यहाँ बैठे लगभग दो घंटे हो चुके हैं।

 "क्या करूँ, आपका रेस्त्राँ ही इतना रोचक है। लिखने के लिए यहाँ पर बहुत कुछ बिखरा पड़ा है। मैंने थोड़ी चापलूसी करते हुए कहा।

 "मैं समझा नहीं। सब कुछ एक सलीके से तो है, क्या बिखरा हुआ कह रहे हैं आप? कुछ समझ नहीं रहा। मैनेजर ने रक्षात्मक ढंग से कहा।

मैंने उसे समझाते हुए और कुछ याचना करते हु़ए कहा-

 "देखिए मैं एक लेखक हूँ, और आपके रेस्त्राँ के वातावरण में आते ही मेरी कल्पना शक्ति जागृत हो उठती है। जब भी मेरी कल्पना थोड़ी घटित होती है तो उसे पुन: नवजीवन देने के लिए यहाँ चला आता हूँ। कहते हुए मैं मुस्कुरा दिया - इतने विशाल रेस्त्राँ के इस एक कोने में अगर रचना का सृजन होता रहे तो आपको क्या आपत्ति हो सकती है?.. बस यही सोचता हूँ।

मैनेजर के चेहरे पर कुछ रुचि के भाव दिख रहे थे। वह स्वयं कुर्सी खींच कर बैठ गया। बैरा भौंचक्का सा खड़ा था।

"तो आप लेखक हैं। क्या लिखते हैं? मेरे रेस्त्राँ के विषय में भी लिखेंगे क्या?” उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी, और मैंने अपनी बातों का जाल उसके आसपास बुनना आरम्भ कर दिया। मकड़ी के जाले में शिकार फंस चुका था। कुछ समय मेरे साथ बातचीत करने बाद उसने पास खड़े बैरे से कहा-साहब के लिए ताज़ा बनी कॉफ़ी लाओ, मेरी तरफ़ से.. और हाँ, जब तक यह यहाँ बैठना चाहें किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।और फिर मेरी तरफ देखते हुए कहा-निश्चिंत रहिए, अब आपको कोई भी तंग नहीं करेगा।

 "धन्यवाद-- इससे पहले मैं कुछ और कहूँ वह जा चुका था। उस दिन के पश्चात कई बार यहाँ आ चुका हूँ और परिचारिका सदा मुझे यहीं कोने में बैठाती है। शायद उसे ऐसा ही आदेश दिया चुका है।

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