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ISSN 2292-9754

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12.02.2014


 सच

महकता है वही जग में
निपट जो खरा होता है
कुएँ के पास जाने से
कभी प्यास नहीं बुझती
किश्ती पकड़ लेने से
नाव कभी नहीं चलती
लगती है जब कभी विचारों में आग
कवि के सीने में कैसे भी धधकर
मचल उठती है उसकी अँगुली
शब्दों के अंगार उगलने को
सच कहता हूँ ये मेरे मित्रों
जो सीखता नहीं कभी किनारों से
डूबना उसे हर हाल में होता है


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