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ISSN 2292-9754

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11.17.2014


डर

अपनों से अब डर नहीं लगता
पड़ोसी फिर भी ज़रूर सताते हैं
बच्चों का डर सताता है
कहीं वह ख़ुद से दूर न कर दें
पत्नी तो अब रहती है गुर्राती
न जाने कौन से जन्म का बैर है
दुनियां उड़ाती है जब भी उपहास
सच कहूँ अब डर नहीं लगता


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