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ISSN 2292-9754

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11.17.2014


चाहत

टीसती रहती हो क्यों मुझको
रहा नहीं क्या मैं तेरे काबिल अब
छुआ था जब तेरा आँचल
तो लिपटती क्यों थी तुम
आज कैसे बन गया मैं
आग का दहकता हुआ दरिया
मेरे लिए तो तुमने कितनी ही रातें
पूरी रातें जागकर थी गुज़ारीं
अब ऐसा क्या हो गया कुछ तो कहो
काँटे मेरे शरीर से तो नहीं निकल आये


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