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ISSN 2292-9754

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11.29.2014


बिहार का साला

आफ़िस का कार्य ख़त्म हो गया था, सुकोमल वापसी के लिए चल पड़ा, मुंबई से दिल्ली का सफ़र था, प्रातः ५.४५ की ट्रेन थी, मुंबई वी.टी. से ट्रेन पकड़नी थी। होटल मैनेजर से ज्ञात हुआ की सुबह ६ बजे के बाद ही ऑटो या टैक्सी रेलवे स्टेशन के लिए मिल पायेगा, काफी सोच विचार करने के बाद सुकोमल ने निर्णय लिया कि अगर वह रात में ही रेलवे स्टेशन के लिए निकल पड़े तो ठीक रहेगा। ऑटो सामान रख वह तुरंत निकल पड़ा, खाना उसने पैक करावा करवा लिया।

रात १० बजे वह स्टेशन पर आ गया, वेटिंग रूम में वह सामान रख कुर्सी पर पसर गया। वेटिंग रूम के के केयर टेकर ने उसे बताया कि आधी रात के बाद सामान पर विशेष नज़र रखियेगा, चोर चुपचाप सामान लेकर चले जाते हैं,जागते रहने का फ़रमान वह सुना गया। सावधानी के नाते सुकोमल ने सभी सामान एक जगह कर उसे ताले-चाभी के द्वारा चेन से लॉक कर दिया। खाना खाकर वह कुछ देर तक सारा आकाश नामक उपन्यास को पढ़ने लगा। कुछ घंटे के बाद उसे नींद आने लगी। लाख कोशिश के बाद भी उसे नींद आ गयी और वह अपने सामान के पास ही लेट गया।

रात ३ बजे उसकी नींद टूटी, सारा सामान सुरक्षित पाकर उसने चैन की साँस ली परन्तु जैसे ही रुमाल निकलने के लिए उसने जेब में हाथ डाला, उसके होश उड़ गये। जेब में तो पर्स था ही नहीं, घबराकर उसने पेंट शर्ट की सभी जेबों की तलाशी ली, पर चोरों ने तो आपना काम कर दिया था। खुले नोट भी गायब थे, गनीमत थी की ऊपरी जेब में रखा ट्रेन का टिकट अपने स्थान पर पूरी तरह से सुरक्षित था और पेंट में बस कुछ सिक्के खनखना रहे थे। आसपास वालों ने सहानुभूति जताई, केयर टेकर ने कहा, "सर मैंने तो आपको ताकीद की थी।" ख़ैर मैंने जेब में रखे पैसों की गिनती की, कुल १६ रुपए सिक्कों की शक्ल में थे।

कुछ ही घण्टों में ट्रेन चलने वाली थी, हैरान तथा परेशान सुकोमल ने बेंच के नीचे निगाह दौड़ाई, दो उसे जूते भी दिखाई नहीं दिए। अब तो वह और भी परेशान हो गया, अब वह क्या करे? तभी पास में बैठे एक बुजुर्ग ने उससे कहा कि बाहर पानी की टंकी के पास कुछ जुते चप्पल पड़े हैं जाकर देख लो शायद वह जूता मिल जाये। सुकोमल वहाँ गया पर उसे उसका जूता नहीं दिखाई दिया। बुजुर्ग के कहने पर उसने वहाँ पड़ी एक टूटी सी चप्पल ले ली। क्या करता भागते चोर की लंगोटी ही सही वाली कहावत यहाँ चरितार्थ हो रही थी। नंगे पैर ट्रेन में कैसे सफ़र करता, पैसे भी तो नहीं थे कि ट्रेन में जूते या चप्पल खरीद सकता। अब तो मजबूरी थी टूटे चप्पल से ही काम चलना पड़ रहा था। मजबूरी थी, शरम-संकोच भी हो रहा था। जाड़े का दिन था सूट के साथ टूटी चप्पल के साथ सुकोमल जैसे-तैसे ट्रेन में चढ़ गया। कुली को देने को तो पैसे भी नहीं थे। मजबूरी थी ख़ुद ही सामान ले वह अपने बर्थ के पर आ गया।

ट्रेन में बैठते ही चाय की तलब लगी। सुबह की बेड-टी लेने वाला सुकोमल मन मसोस कर रह गया। पर जैसे ही ट्रेन ने रफ़्तार पकड़ी सुकोमल की चाय की तलब बढ़ती जा रही थी। १६ रुपए में ३६ घंटे का सफ़र करना था, चाय ख़रीदे या न ख़रीदे सुकोमल नहीं तय कर पा रहा था, सभी चाय पी रहे थे। मन को समझाना जब असंभव हो गया तब सुकोमल ने चाय तथा एक पैकेट बिस्कुट ले लिये। चाय पी लेने के बाद सुकोमल जेब में हाथ डाल तसल्ली कर लेना चाहता था कि उसकी जेब में ६ रुपए भी बचे हैं या नहीं। वह ६ रुपए सुकोमल के लिए इस समय ६० रुपए के बराबर थे।

सुबह के १० बजने को थे, सुकोमल पुनः परेशान हो गया। कारण भूख तो थी पर उसे ऐसा लगा कि सामने बैठे मारवाड़ी परिवार के लोग उसे दिखाने के लिए अपना नाश्ते का डब्बा खोल कर बैठ गये हैं। परिस्थिति अनुकूल न हो तो सभी कुछ प्रतिकूल नज़र आता है, अच्छे लोग भी दुश्मन नज़र आने लगते हैं। खूब ठूँस-ठूँस कर खा लेने के बाद मारवाड़ी परिवार चैन की नीद सो गया। पेट भरा हो तो चैन की नीद आती ही है। पर सुकोमल विवश था उन्हें खाते वह नहीं देख पा रहा था। मन ही मन वह मारवाड़ी परिवार को कोस रहा था कि मानवता के नाते भी उन्होंने उसे नहीं पूछा। एक ढोकला खिला देते तो उनका क्या घट जाता? प्रतिष्ठित कंपनी में एरिया सेल्स मैनेजर का काम करने वाला सुकोमल मन ही मन सोच रहा था कि वह एक साथ २०-२० की सेल्स टीम को ट्रेनिंग दे दिया करता था, उनके प्रश्नों के उत्तर बड़ी ही सरलता से दे दिया करता था, आज ऐसी स्थिति बन आई थी कि वह अपने ही प्रश्नों का उत्तर नहीं तलाश कर पा रहा था। सभी के लिए रास्ता निकालने वाला सुकोमल अपने लिए रास्ता नहीं निकल पा रहा था। पानी का बस एक घूँट ले, वह आँख मूँदकर सोने का प्रयत्न करता रहा, पर भूखे पेट नींद भी नहीं आ रही थी।

किसी भी सामान्य व्यक्ति की भाँति सुकोमल में भी अनेक खूबियाँ थीं, कमियाँ थीं, किन्तु उसके अंदर पूरी ईमानदारी से सच स्वीकारने का साहस भी था। उसके भीतर का प्रेमान्वेषी किशोर हर परिस्थति में जीतता रहा था और उसका मन पराजय स्वीकार करने को कभी भी तैयार न होता था, फिर आज तो परीक्षा की घड़ी थी।

अपने लिए सोचते-सोचते उसे लगा कि शायद ईश्वर कोई रास्ता निकाल ही दे। उसने अपना सामान जंजीर से लॉक किया और सुकोमल मेन गेट के पास जा कर खड़ा हो गया। सोचने का क्रम जैसे ही रुका उसे ट्रेन की पैंटी-कार का स्मरण हो आया। आशा की एक छोटी सी झलक पा वह प्रसन्न मन से चल पड़ा। ११ डिब्बे चलने के बाद वह पैंटी-कार तक पहुँच सका। मैनेजर से मिलने औ बात करने वह मैनेजर के केबिन में जा पहुँचा। मैनेजर भी एक सूटेड-बूटेड व्यक्ति को टूटी चपल्ल में देख चौंक उठा। मैनेजर ने कुछ बोलने के लिए मुख खोलना ही चाहाथा कि सुकोमल ने उसे जेब कटने की बात कह सुनाई।

मैनेजर ने कहा कि यह सब आप हमें क्यों सुना रहे हैं?

"भई मैं आपसे कुछ पैसे रुपए नहीं माँग रहा हूँ," सुकोमल ने मैनेजर से कहा।

"फिर आप मुझसे क्या चाहते हैं?" कुछ अनमने मन से मैनेजर ने पूछा।

मैनेजर की भाषा सुनने के बाद सुकोमल को अहसास हो गया था कि मैनेजर पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार राज्य का रहने वाला है। उसने अपने सेल्स अनुभव का लाभ उठाते हुए मैनेजर से पूछा, "आप रहने वाले कहाँ के हो, कहीं बिहा........," इससे पहले कि सुकोमल अपना बात पूरी करता, मैनेजर ने कहा, "मेरा घर समस्तीपुर में पड़ता है, क्यों आप भी बिहार के हैं क्या?" अपने जवार का नाम उसने बड़े ही उत्साह से लिया।

"नहीं-नहीं मेरा गाँव तो बनारस है, पर मेरा ससुराल बिहार में कैमूर जिला में पड़ता है," सुकोमल ने जवाब दिया।

"अच्छा-अच्छा कैमूर में कौन सा गाँव है?"

सुकोमल को लगा काम बन सकता है, उसकी गाड़ी पटरी पर है, उसने अपने ससुराल पिपरियाँ का जैसे ही नाम लिया, मैनेजर तो चहक उठा, "अरे उहाँ की तो एक लड़की हमारे छोटे भाई से ब्याही है!"

फिर तो सुकोमल उत्साह में आ गया और उसने मैनेजर से कहा, "मेरे सारे भाईयों की शादी बिहार में हुई है, मई तो पूरे बिहार को ससुराल मनाता हूँ।"

"अच्छा जी है..... है, पूरा बिहार ही आपक ससुराल है।"

"और का जब हमर परिवार के ४६ भाईयों का ससुराल बिहार में है तो काहे न हम पूरे बिहार को अपना ससुराल मानें?"

"अच्छा मजाक कर लेते हैं सर।"

"सर नहीं जीजाजी कहिए!"

तभी वेटर एक काफी रख गया।

"लीजिये न सर.... नहीं नहीं ....... जीजाजी!"

फिर क्या था सुकोमल और मैनेजर ऐसे बात करने लगे कि जैसे कितनी पुरानी जान पहचान हो। जेब कटने से लेकर भूखे रहने की दास्तान जब सुकोमल ने सुनाई तो मैनेजर के साथ वहाँ उपस्थित सभी का मन भर आया। मैनेजर ने सुकोमल से पूछा, "आप क्या खाएँगे बताइये, नास्ता तैयार है, नॉन-भेज कहते हैं न ल भाई जरा चार अंडे का आमलेट बना कर ला।" मैनेजर के कहने की देर थी कि ऑमलेट हाज़िर था। सुकोमल गरम नाश्ते पर टूट पड़ा था।

इससे पहले सुकोमल कुछ कहता मैनेजर ने वेटर से कहा, "साहब जो कुछ खाने को माँगें इनको दे देना, ठीक है न।"

"आप अपना आर्डर बता दीजिए खाना आपको सीट पर मिल जायेगा।"

चिकन का आर्डर दे सुकोमल चलने लगा तो उसने मैनेजर से कहा, "मैं आपको चेक दे जाऊँगा आप दिल्ली बैंक में डाल दीजियेगा, या जहाँ कहियेगा पैसा आपको मिल जाएगा।"

"ठीक है सर, आप निश्चिंत होकर जायें।"

एक बजे पूरा मारवाड़ी परिवार सोकर उठा और तुरंत खाने के डिब्बे लेकर बैठ गया। सुकोमल को वह दिन याद आये जब मात्र ५० रुपए में इतना खाना चेन्नई में मिलता था कि उसे ३ लोग खा सकते थे। एक बार उसने एक साथी सिपाही से खाना खाने को कहा था, पर उसने थोड़ी देर पहले खाना खाने की बात बताई, तब सुकोमल ने दो आदमी का खाना स्टेशन पर भीख माँगने वालों को दे दिया था। पर अब तो सुकोमल को चिंता कहाँ थी उसने तुरंत अपना लंच मँगवाया, दो नॉन वेज के पैकेट ऐसे खोल कर सुकोमल बैठ गया। मारवाड़ी परिवार उसे देख रहा है या नहीं, वह कनखी से देख लेता। जब वेटर ने सुकोमल से पैसे नहीं लिये तो उन्हें घोर आश्चर्य हुआ। पैसे नहीं लेना उन्हें समझ में नहीं आ रहा था। उन्होंने उससे पूछ ही लिया कि वह सुकोमल से पैसे क्यों नहीं ले रहा है। उसने कहा कि सर मैनेजर साहब के रिश्तेदार हैं।

नाश्ता, चाय, काफी तथा रात में पराठे तथा पनीर, छोले की सब्जी तथा दाल के साथ स्वादिष्ट भोजन खा कर सुकोमल रात में सो गया। सुबह नाश्ता करने के बाद जब सुकोमल मैनेजर के पास पहुँचा तो मैनेजर ने उससे कहा कि सर.… नहीं .......नहीं जीजाजी अब आपसे भी पैसे लेने हैं?"

"नहीं भाई मैं तो पैसे की जगह यह ४६८रुपए का चेक दे रहा हूँ।"

"जब इतने सारे टी.टी., पुलिस वाले मुफ्त में खाना खा जाते हैं तो एक आपने खा लिया तो क्या फर्क पडआ जायेगा।"

पर सुकोमल न माना, वह चेक मैनेजर शिवलाल को देकर ही माना। मैनेजर की उदारता के लिए सुकोमल ने सभी स्टाफ का धन्यवाद किया, पर सुकोमल यह देखकर चकित हो गया की मैनेजर ने चेक बैंक में नहीं डाला। सुकोमल कई बार स्टेशन पर गया पर उसे मैनेजर नहीं मिला, भूखे पेट रहकर सुकोमल ने जो रात बिताई थी वह याद आते ही सुकोमल काँप उठता था। तीसरी बार जब मैनेजर नहीं मिला तो सुकोमल ने फैसला किया कि वह भी कुछ ऐसा करे जैसा मैनेजर ने उसके साथ किया है। वह स्टेशन से बाहर निकला और बहार खड़े सारे भिखारियों में ५०० रुपए के केले बाँट दिये।


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