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01.16.2009
 

चेहरे के बि‍म्‍ब
सुधीर सक्‍सेना 'सुधि‍'


सुबह,
कमरे में आकर
टँग जाती है
खूँटी पर और
कदम चल पड़ते हैं,
जलता चूल्हा
देखने की खातिर
ड्यूटी पर।

फाईलों में डूबा दिन
शाम को धक्के खाकर
घर आता हैं और
सोफे पर पसर जाता है।

साथ लाई ढेर सारी चिंताओं को
चाय की एक प्याली के साथ
गिटक जाने का
प्रयास किया जाता है और
बीवी-बच्चों के सामने
संतुष्ट दिखने का
अभ्यास किया जाता है।

वक़्त को जेब में रखकर
टहलने की आदत छोड़ दी है; क्योंकि
अब तो ते-तेज़ भागना पड़ता है और
काँटों से भी जूझना पड़ता है।

असंख्य कैक्टस हथेलियों में
धंस जाते हैं।

रोज़ ऐसे ही जागती आँखों से देखे
सपने धुँधलके से
गहराते अँधेरों से ऊब जाते हैं
और चेहरे पर बने बिम्ब
लहुलूहान पलों में डूब जाते हैं।


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