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ISSN 2292-9754

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09.16.2017


यह असामान्यत: क्यों?

विस्मृतियों के गर्भ से
यादों की अंजुरी भर लाई हूँ..
कुछ यादें इसमें टिकी हैं
कुछ इससे रिस रही हैं..
ढलते सूरज की लौ सी
तपिश अभी भी बाकी है
इन यादों में...

तपती दुपहरी सा तुम बने रहे
बदली बन मैं बौछारें देती रही
सूरज सा तुम जलते रहे
चाँदनी बन में ठंडक देती रही
जीवन संग्राम में तुम मुझे ढकेलते रहे
झाँसी की रानी सी मैं
तुम्हारी ढाल बनती रही..

राम बने तुम मेरी अग्नि परीक्षा लेते रहे
भावनाओं के जंगल में
मैं बनवास काटती रही..
देवी बना मुझे
पुरुषत्व तुम दिखाते रहे ..
सती हो सतीत्व की रक्षा
मैं करती रही...

स्त्री पुरुष दोनों से सृष्टि की संरचना है
फिर यह असामान्यत: क्यों?



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