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03.14.2008
 
हत्या और विनय
डॉ. सुधा ओम ढींगरा

मैं तो एक नन्ही सी जां हूँ,
मुज पर यह सितम क्यों...
स्वयं तो आया नहीं,
लाया गया हूँ,
फिर यह ज़ुल्म क्यों?
कि
पालने की जगह
मुझे कूड़ादान दिया।

कभी तो सोचा होता
कि..... मैं
ख़ून के सैलाब से उभरा
कुत्तों का समाना
कैसे करूँगा?
जो
नोचनए को तैयार खड़े हैं मुझे
जब कि
मेरी अभी आँख भी नहीं खुली।

कहीं
ऐसा न हो कि.... मैं
प्यार की जगह
हवस का कलंक बन कर
तेरे आँचल से चिमट जाऊँ
और तुम
समाज में सिर न उठा सको।

इसलिए .... माँ
मुझे उठा लो
सम्भालो
ताकि.... मैं
दामन का दाग़ न बन कर
माथे का चाँद बनूँ
और चमकूँ।


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