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04.28.2007
 
नन्हा बच्चा
सुधा कंसल

नन्हा बच्चा है, इक चिड़िया,
पलक झपकते उड़ जाता है,
माँ बाप के फूल से दिल पर,
अपनी चोंच गड़ाता है,

रिसता वह ज़ख़्म,  बन जाता नासूर,
हर पल नन्हें की याद दिलाता है,
फिर, कुछ साल बाद,
नन्हा लौट घर
रिसते ज़ख़्मों पर,
अपनी शोहरत की मरहम लगाता है,

ऐसे ही यह चलता चक्र
नन्हा खुद बाप बन जाता है,
अब, कभी वह अपने ज़ख़्म सहलाता है,
कभी माँ-बाप के लिए मरहम बन जाता है

नन्हा बच्चा है, इक चिड़िया,
पलक झपकते, उड़ जाता है,
ऐसे ही चलता चक्र
नन्हा बहुत याद आता है।

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