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04.28.2007
 
क्यों ना जीवन से प्यार करूँ
सुधा कंसल

मैं क्यों ना जीवन से प्यार करूँ
सुखी जीवन का अपनी कल्पना में विस्तार करूँ

धूप खिली हो जब कोमल सी
क्यों उसका तिरस्कार करूँ
मैं क्यों ना जीवन से प्यार करूँ

रास्ता जब हो कोई दिखाने वाला,
क्यों दर-दर भटकूँ और सहारे की तलाश करूँ
मैं क्यों ना जीवन से प्यार करूँ

चचहाते हों पक्षी, मंदिर की बजा जाए घंटी
सुखी जीवन का संदेश जब लाए
तब मैं क्यों अनपढ़ बन, उसको इंकार करूँ

मैं क्यों ना जीवन से प्यार करूँ
सुखी जीवन का इंतज़ार करूँ

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