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04.28.2007
 
ख़ामोश मन्दिर
सुधा कंसल

चुनौती लिये ये पर्वत
जीने की ललक,
ये उड़ते पन्छी खामोश सा मन्दिर,
उस पर घनघनाते घंटे
पुजारियों की विवशता
पर लाखों को आशीर्वाद के लिये उठता हाथ

भगतों के पेट खाली
प्रसाद की पुड़िया, हाथ में दबाये
एक कदम चलने पर उख़ड़ती साँसें
सैंकड़ों सीढ़ियाँ चढ़ कर पहुँचना
कुछ तो होगा इस ख़ामोशी में
मानो तो सब कुछ ना मानो तो पत्थर ॥

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