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04.28.2007
 
जीवन का पड़ाव, ज़िन्दगी में ठहराव
सुधा कंसल

ज़िन्दगी में लगता है,
आचानक पड़ाव आ गया
हँसते गाते चल रहे थे,
न जाने ये कैसा ठहराव आ गया।
पता ही न चला बालों में सफ़ेदी का
और लो ये तो ज़िन्दगी का उतार आ गया॥

चलते थे इतने ऊँचे-नीचे रास्ते
पता ही न चला था - उखड़ी साँसों का तब,
पर आज अचानक सीधे रास्ते चलते,
साँसों में तूफ़ान आ गया
लगता है ज़िन्दगी का पड़ाव आ गया॥

मंदिर के आगे से गुज़रते,
जुंबिश देते थे ज़रा सी गर्दन को।
अब घंटों सर झुका कर बैठना,
हर बात-बेबात पर हँसना-खिलखिलाना
और हर खिलखिलाहट पर हैरानी दिखाना
लगता है ज़िन्दगी का उतार आ गया
बहुत भागे हैं, इस ज़िन्दगी में
अब ज़िन्दगी में ठहराव आ गया
ज़िन्दगी में आचानक पड़ाव आ गया

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