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ISSN 2292-9754

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07.19.2014


12 क्षणिकाएँ

1
गुलाब की नन्हीं कली
तोड़, तुम्हारे बालों में
सजा दी
उँगली में चुभा काँटा
रहा याद दिलाता
कि तुम चली गई …
2
कैक्टस कठोर
काँटों से भरा, बदसूरत
निकली कली
कोमल / अपूर्व सुन्दरी॥
दन्तैल भयावह राक्षस की
सपना बिटिया।
3
मुद्दत बाद
तुम्हारे शहर आना हुआ
धड़कते दिल से
मौहल्ला, गली, मकान
खोज डाला / सब कुछ
वही था।
जस का तस
सिर्फ़ तुम थे गुम
4
पावस-साँझ ।
आकाश में
इन्द्र धनु उग आया
मन भरमाया
ख़यालों में लहराया
तेरा / बहुरंगी आँचल ।
5
सीप के अधर खुले
कोई / स्वाति- बूँद
आ गिरे
मोती बन… उगे ।
6
अभी भोर थी
दस्तक पड़ी
खोला जो द्वार
हर्ष का न रहा
पारावार,
वसन्त खड़ा था ।
7
नहा-धोकर
ऊषा ने खोले
पावन द्वार
निराले पंछी
मधुर स्वरों में
गाते गुरबानी ।
8
तुम्हें विदा दे
ज्यों ही मुड़ी, देहरी के पार
एक साथ यादें करने लगीं
कदम ताल-------
9
आज के नाते-रिश्ते
बोझ –केवल बोझ
गरमाई
बरसों पुरानी भरी
ठण्डी बोसीदा रज़ाई ।
10
हज़ारों
नन्हें-नन्हें पुरज़े
लिख मारे
प्रेम -मतवारे वसन्त ने
धरती के नाम
अब /इधर –उधर
हवा में
उड़ते फिर रहे हैं।
11
सपनों ने लुभाया
तो चट्टानों से टकराया
आशा ने बुलाया-
बियाबान में ला पटका
मासूम बेचारा दिल ।
12
धूल से अँटा
मैला- सा एक दिन
खुल पड़ा / अनायास
मन का भण्डार
वहाँ भी भरा था
यादों का गर्द-गुबार ।


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