अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.05.2014


पुरस्कार

यह उन दिनों की बात है जब मैं कलकत्ते में जय इंजीनियरिंग वर्क्स के अंतर्गत उषा फैक्ट्री में इंजीनियर था। जितना ऊँचा ओहदा उतनी भारी भरकम जिम्मेदारियाँ! खैर...मैं चुस्ती से अपने कर्तव्य पथ पर अडिग था।

अचानक उषा फैक्ट्री में लॉक आउट हो गया। छह माह बंद रही। हम सीनियर्स को वेतन तो मिलता रहा पर रोज़ जाना पड़ता था। आये दिन मजदूर अफसरों का घिराव कर लेते थे क्योंकि लॉक आउट होने का कारण, वे उन्हें ही समझते थे।

छ: माह के बाद नींद हराम हो गई तरह-तरह की अफवाहें जड़ जमाने लगीं - बंद हो जायेगा वेतन मिलना, छंटनी होगी कर्मचारियों की, इस्तीफा देने को मजबूर किया जायेगा - फैकट्री बंद हो जायेगी।

दिन-रात मैं सोचता - भगवान् नौकरी छूट गई तो क्या होगा...। तीन बच्चों सहित कहीं एक दिन भी गुज़ारा नहीं।

एक अन्तरंग मित्र जो देहली में रहते थे, ने सलाह दी - एक माह की छुट्टी लेकर तुम यहाँ आ जाओ। मशीनें मैं खरीदूँगा तुम कार के पार्ट्स बनाना।

वहाँ जाकर मैंने कार के पार्ट्स की ड्राइंग की फिर उसके अनुसार पार्ट्स बनवाये। मैंने अपनी सफलता की सूचना मित्र को बड़े उत्साह से दी।

बोले - पार्ट्स तो बनवा लिए पर इनके विज्ञापन का कार्य भी आपको करना पड़ेगा। प्रारंभ में तो दरवाज़े-दरवाज़े आपको ही जाना पड़ेगा। इनके इस्तेमाल करने से होने वाले फायदे आपसे ज़्यादा अच्छी तरह दुकानदारों को कौन समझा सकेगा। उनकी माँग पर निर्भर करेगा कितना माल बने। व्यापार में शुरू-शुरू में अकेले ही करना पड़ता है। मेरा मतलब माल बनाना, बेचना, पैसा उगाहना।

व्यापार के मामले में मैं नौसिखिया- बाप दादों में कोई व्यापारी नहीं - इतनी भागदौड़ वह भी अकेले। फैक्ट्री में तो अलग-अलग विभाग के अलग दक्ष अफसर व कर्मचारी। यहाँ मैं समस्त विभागों की खूबियाँ अपने में कैसे पैदा करूँ!

इस डावांडोल परिस्थिति में मैंने निश्चय किया - पार्ट्स लुधियाना में छोटे-छोटे कारखानों से बनवाकर उन्हें बेचूँगा। लुधियाने मैं मेरी जान-पहचान भी थी।

कार का एक विशेष पार्ट ५ रुपये का बना। मैंने उसकी कीमत १० रुपये रखी। इस बारे में दोस्त की सलाह लेनी भी आवश्यक समझी।

वे बोले – "१०रुपये तो बहुत कम है, १५ रखिये।"

"इतनी ज़्यादा! पार्ट बिकेगा नहीं।"

"सब बिकेगा। जो ज़्यादा से ज़्यादा झूठ बोलने वाला होता है वही बड़ा व्यापारी बनता है। यहाँ ईमानदारी से काम नहीं चलता।

कई दिन गुज़र गये पर उनकी बात पचा न पाया। मेरी स्थिति बड़ी अजीब थी! पैसा मेरा दोस्त लगा रहा था इस कारण उसकी बात माननी ज़रूरी थी मगर मानूँ कैसे! मेरी आत्मा कुलबुलाने लगती, बार-बार धिक्कारने आ जाती। आखिर हिम्मत करके एक सुबह बोल ही दिया -

"यार, मुझसे यहाँ काम-धंधा नहीं होगा। कलकत्ते ही वापस जा रहा हूँ।"

"जानता था...जानता था, तुमसे कोई काम नहीं होगा। ये इंजीनियर सब बेकार होते हैं।"

उस पल मैं हज़ार बार मरा होऊँगा....।

कलकत्ते पहुँचते ही फैक्टरी गया। मेरी मेज़ पर एक लिफाफा रखा हुआ था। काँपते हाथों से उसे खोला। लग रहा था सैकड़ों बिच्छू एक साथ उँगलियों में डंक मार रहे हों।

मेरे नाम पत्र था --

आपकी ईमानदारी व मेहनत से प्रशासक वर्ग बहुत प्रभावित है। अत: खुश होकर आपको हैदराबाद भेज रहे हैं ताकि फैन फैक्टरी में भी विकास विभाग संभालकर नये-नये डिज़ायन के पंखों का निर्माण करें।

हमारी शुभ कामनाएँ आपके साथ हैं।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें