अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
12.06.2014


गुण का ग्राहक

एक बार कुछ व्यापारी पानी के जहाज़ से दूसरे देशों में अपना माल बेचने निकले। साथ में दिशा बताने वाले कौवे को भी अपने साथ ले गए। उस समय रास्ता बताने वाले यंत्र नहीं थे। अत: भटकने से बचने के लिए दिशा जानने वाला कौवा साथ में रखना ज़रूरी था। जिस देश में वे पहुँचे वहाँ पक्षी नहीं होते थे। जिसने भी कौवे को देखा उसकी प्रशंसा करते लगा। कोई कहता –इसकी चमड़ी तो मक्खन सी चिकनी है। आह! कैसा चटक रंग है। कोई कहता - गले तक सुराही सी लम्बी चोंच है और आँखों का क्या कहना, वे तो मणि की तरह गोल-गोल चमचमा रही हैं।

"मित्र, यह पक्षी हमें दे दो। हमें भी इसकी ज़रूरत है। तुम्हें तो अपने देश में ऐसा दूसरा पक्षी मिल जाएगा," एक नगरवासी ने कहा।

"यह हमारे बहुत काम का है मगर मित्रता के नाते हम तुमको दिए देते हैं," व्यापारी बोले।

सौ सोने के सिक्कों के बदले में कौवे को दे दिया गया।

नगरवासियों ने उसे सोने के पिंजरे में रखकर माँस-मछली खिलाया और बड़े ध्यान से पालने लगे।

कौवा अपना इतना आदर देख फूल कर कुप्पा हो गया।

दूसरी बार बनिए व्यापारी उसी देश में फिर आए और इस बार अपने साथ एक सुन्दर मोर भी लेकर आये जो चुटकी बजाने पर आवाज़ लगाता और ताली बजाने पर रंगबिरंगे पंख फैलाकर नाचने लगता। उसे देखने सारा नगर उमड़ पड़ा। भीड़ को देखकर मोर उल्लास से भर उठा। नौका पर खड़े होकर उसने अपने सुंदर पंख फैला कर नाचना शुरू कर दिया।। नगरवासी उसे देख मुग्ध हो गए और बोले – "मित्रो,यह तो बड़ा ही सुन्दर सुशिक्षित पक्षी है। नाचते हुए पक्षी को पहली बार देख रहे हैं। इसे तो हमें दे दो।"

हम कौवा लेकर आये, तुमने ले लिया। अब मोर लेकर आये तो उसे भी लेना चाहते हो। तुम्हारे देश में तो कोई पक्षी लाना ही मुसीबत है।"

"मित्रो, कुछ भी हो – इसे तो मेहरबानी करके हमें दे ही दो। तुम्हें तो अपने राष्ट्र में दूसरा मिल जाएगा।"

व्यापारी तो व्यापारी ठहरे, उन्होंने उनकी ऐसी माँग देख मोर की कीमत बढ़ा दी और उसे हज़ार स्वर्ण सिक्कों के बदले में दे दिया।

मोर के लिए कौवे से भी ज़्यादा सुन्दर सात रत्नों का पिंजरा बनवाया। उसे मछली-मांस, फल और मीठा शरबत खिला–पिलाकर पाला जाने लगा।

मोर के आने से कौवे के बुरे दिन आ गये। उसकी तरफ अब कोई देखना भी नहीं चाहता था। एक दिन तो उसे खाने-पीने को कुछ मिला ही नहीं, तब वह कांव–कांव - चिल्लाता हुआ कूड़ा-करकट गिराने की जगह उतरा और अपनी भूख शांत की।।

असल में गुणवानों के सामने बेगुणों को कोई पसंद नहीं करता।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें