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ISSN 2292-9754

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12.13.2018


डायरी के पन्ने
अबूझ पहेली

23.6.2003

अबूझ पहेली

 हम जब से ओटावा आए हैं, बेटा शाम को ऑफ़िस से घर जल्दी आने की कोशिश में रहता है। ऑफ़िस में समय से पाँच मिनट भी ज़्यादा रहना उसे अखरता है। एक दिन उसके बॉस ने उसकी इस जल्दबाज़ी को भाँप लिया। अवसर मिलते ही उसने निशाना लगा दिया- “चाँद, तुमको आजकल हमारे साथ बात करने का भी समय नहीं रहता!”

“इंडिया से मेरे माता-पिता आए हुए हैं।”

“कब तक रहेंगे?”

“तीन माह।”

“ती....न माह! क्यों?”

“क्योंकि वे मुझसे मिलने ही तो यहाँ आए हैं।”

“मेरे माता-पिता तो मुश्किल से मेरे पास दस दिन रह पाते हैं। एक हफ़्ते बाद ही मेरी माँ का पत्नी से झगड़ा होने लगता है।”

“मेरा तो यहाँ कोई भाई-बहन भी नहीं है। मुझे उनकी याद बहुत सताती है। घर–गृहस्थी की ज़िम्मेदारियों के कारण वे मेरे पास जल्दी-जल्दी नहीं आ सकते। क़रीब तीन वर्ष के बाद आए हैं। मैं तो पल-पल उनके साथ रहना चाहता हूँ। उनके आने से लग रहा है मानो मेरा बचपन लौट आया है।”

बॉस अवाक होकर चाँद की बात सुनता रहा। फिर उसने किसी दिन उसे नहीं टोका। उसके लिए चाँद की माता-पिता के प्रति आसक्ति अबूझ पहेली थी।

 

 

क्रमशः-

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