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ISSN 2292-9754

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03.28.2015


डायरी के पन्ने
कनाडा सफ़र के अजब अनूठे रंग

8 अप्रैल 2003

उसके साथ बिताए पलों को मैंने मुट्ठी में कसकर बंद कर रखा था। केवल सोते समय मुट्ठियाँ खुलती थीं। परन्तु वे सुनहरे पल धीरे-धीरे मेरी उँगलियों के बीच से इस प्रकार सरकने लगे जैसे बालू। फोन पर बातें करते-करते आवाज़ भर्रा उठती और एक व्यापक मौन मुझसे ही टकराकर पूरे जिस्म में फैल जाता। चाँद बेटा मेरी हलचल को मीलों दूर कनाडा में बैठे भाँप गया। मेरी मनोस्थिति तो पतिदेव (भार्गव जी) भी ताड़ गए थे। इसीलिए शीघ्र ही कनाडा की राजधानी ओटवा जाने का कार्यक्रम बन गया।

8 अप्रैल, 2003 को सुबह 8:45 पर हमने अपने देश से विदा ली। एयर इंडिया विमान से लंदन हिथ्रो एयरपोर्ट बड़े आराम से पहुँच गए। लंदन घड़ी 9 की सुबह 11:30 बजा रही थी। वहाँ से 12:55 पर कनाडा उड़ान पकड़नी थी। दोनों उड़ानों के बीच का समय बहुत कम था। अत: औपचारिकता पूरी कर भी न पाए थे कि विदेशी भूमि पर एयर कनाडा उड़ान हम जैसे बहुत से लोगों को असहाय छोड़कर उड़ गई।

उन दिनों अमेरिका-ईराक जंग ज़ोरों पर थी। दूसरे टोरंटो में सार्स बीमारी के भयानक रूप से पैर जम गए थे। पूछताछ करने पर पता लगा- कोई उड़ान रद्द हो रही है तो किसी का मार्ग बदला जा रहा है परंतु टोरेंटों की उड़ानें ज़्यादातर खाली हैं। वहाँ से कनाडा जल्दी पहुँचना मुश्किल नहीं है। हम टोरेंटों का टिकट खरीदने वाले ही थे कि जयपुरवासी डॉक्टर राणा से टकरा गए। बड़ी आत्मीयता से बोले –आप भूलकर भी टोरेंटों नहीं जाइएगा। सार्स तो बड़ा खतरनाक रहस्यमय निमोनिया है। लक्षण हैं- सिरदर्द खांसी, साँस लेने में कष्ट...। उनकी पूरी बात सुने बिना ही भागे हम। सिरदर्द तो उड़ान छूटने के बाद ही शुरू हो गया था। एक दो मिनट और उनकी बात सुनते तो दम ज़रूर घुट जाता। दिमाग की हांडी में ख़ौफ़ की खिचड़ी पकने लगी। टोरेंटों की उड़ान का हमने इरादा छोड़ दिया।

एयरपोर्ट पर लेकिन कब तक पड़े रहते? टिकट पाने के लिए लंदन एयरलाइंस के अफसर को अपनी करुण कथा सुनाने बैठ गए। वह बड़े धैर्य से हमारी बातों पर कान लगाए रहा और अगले दिन 10 अप्रैल का एयर कनाडा का टिकट हाथों में थमाकर मुनि दधीचि की तरह हमें उबार लिया।

एयर बस से हमें रेडिसन एडवरडियन होटल रात गुज़ारने के लिए पहुँचा दिया गया क्योंकि यह एयरलाइंस की ज़िम्मेवारी थी। जल्दी से जल्दी पेटपूजा करनी थी, दोपहर के तीन बज गए थे। हम शाकाहारी भोजन कक्ष में बहुत देर तक माथापच्ची करते रहे। मनमाफिक भोजन न मिलने से केक-पेस्ट्री खाकर पेट भरा। वेटर और उसके साथी हमारी मुखमुद्राओं को देखकर हँस रहे थे जिसमें बड़ा तीखा व्यंग्य था। वहाँ से उठकर मैं गैलरी में निकल आई। सालों पुरानी चाँचाँ की हसली शीशे के फ्रेम में जड़ी दीवार की शोभा बढ़ा रही थी। ठीक वैसी ही दादी माँ ने मुझे भी दी थी पर मुझ मूर्ख ने उसे पुराने फैशन की कहकर तुड़वा दिया। ब्रिटिशर्स के कलात्मक प्रेम को देखकर मुझे अपने पर बेहद गुस्सा आया। हम क्यों नहीं अपने पूर्वजों की धरोहर सुरक्षित रखते हैं। आगे बढ़ी तो नज़रें उलझ कर रह गईं। 6/6 के आकार का, एक दूसरा ख़ूबसूरत फ्रेम और टँगा था। चाँदी पर मीनाकारी की दो पुरानी घड़ियाँ उसमें विराजमान थी। गुलाबी नगरी जयपुर की स्पष्ट झलक थी जो पुकार-पुकारकर कह रही थीं – हमें अपने वतन से ज़बर्दस्ती लाया गया है। इस महल में लगता है कोई हमारा गला दबा रहा है। ओ मेरे देशवासी, मुझे अपनों के बीच ले चलो।

एक क्षण विचार आया ,शीशा तोड़कर उन्हें आजाद कर दूँ मगर मजबूर थी। कुछ शब्द हवा में लहरा उठे –गुलामी की दास्तान!

भोजन कक्ष में बड़ा सा दूरदर्शन रखा था। बी.बी.सी से समाचार प्रसारित हो रहे थे----------------

 

अमरीकन फौज बगदाद में घुस गई है। सद्दाम हुसैन घायल हो गए हैं। अमरीकी फौज को पानी भी मयस्सर नहीं। पानी के पाइप काटकर व्यवस्था छिन्न–भिन्न कर दी गई है। फौजियों की कष्टप्रद दशा को देखकर ईराकवासियों का दिल भर आया है। अपने घरों से पानी–खाना लाकर दे रहे हैं।

अमेरिका अपनी कूटनीति से यहाँ भी बाज नहीं आया। ईराकी भ्रमजाल में फँसे लगते हैं कि अमेरिका विजयी होने पर उनकी ज़िंदगी मे ख़ुशियों का चंदोवा तानदेगा। वे अमेरिकन फौज के हरे–भरे वायदों के चक्कर में पड़े उनके चारों तरफ मक्खियों की तरह भिनभिना रहे हैं। मुझे तो ईराकी जनता पर तरस आने लगा है। अमेरिका अपना मकसद (तेल के कुंओं पर आधिपत्य) पूरा होने पर उनकी तरफ से गूंगा, बहरा और अंधा हो जाएगा।

आग की तरह लपलपाती ख़बरों से यही समझ में आया कि अमेरिका ईराक की प्राचीन बहुमूल्य धरोहर तथा सांस्कृतिक गौरव की धज्जियाँ उड़ा कर रहेगा और छोड़ दिया जाएगा निर्दोष वतन प्रेमियों को केवल कराहने के लिए। हाँ, मदद के नाम पर उनके सामने चुग्गा ज़रूर डाल देगा। दिन-दहाड़े एक राष्ट्र का बलात्कार! यही द्वंद्व मुझे खोखला करने लगा। नफ़रत का बीज फूट पड़ा। रात की स्याही गहरा उठी पर मेरी नींद चिंदी-चिंदी होकर न जाने कहाँ उड़ गई।

रेडिसन होटल में जूस, फल चॉकलेट आदि का सेवन करते-करते गड़बड़ा गए। एयरलाइंस की ओर से प्रति व्यक्ति 42 अमेरिकन डॉलर्स खाने-पीने को मिले थे। मगर वहाँ तो सब फीका लगने लगा। स्वदेश की दाल-रोटी याद आ गई। एक डर अंदर ही अंदर हर शिरा को कंपा रहा था कि कहीं कल भी होटल में न रुकना पड़ जाए। होटल की गगनचुम्बी भव्य इमारत कहने को तो विलासिता की देवी थी पर उस सुनहरे पिंजरे में ज़्यादा देर कैद होना हमें मंजूर न था।


क्रमशः-

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