काग़ज़
पर शब्दों को लिख देने से ही
कविता नहीं हो जाती
कविता वह होती है, जिसे दिल से जिया जाता है
अमृत–कलश
नहीं होती
वह तो विषपान है,
जिसे घूँट-घूँट कर पिया जाता है
क़तरा-क़तरा उतर जाए जो
दिल में
रोम-रोम में समा आए
सूखे गालों पर बिखर जाए जो
रोटी बन भूखों की भूख मिटाए
ठिठुरतेहुओं को गरमाहट दे
सलीब पर चढ़ जाए
जिक्र जिसमें फ़ुटपाथ का हो
दु:ख-दर्द जिसमें साथ हो बस वही कविता होती है ।