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05.16.2007
 
कविता
सुदर्शन रत्नाकर

काग़ज़ पर शब्दों को लिख देने से ही
कविता नहीं हो जाती
कविता वह होती है,
जिसे दिल से जिया जाता है
अमृत
कलश नहीं होती
वह तो विषपान है,
जिसे घूँट-घूँट कर पिया जाता है
क़तरा-क़तरा उतर जाए
जो दिल में
रोम-रोम में समा आए
सूखे गालों पर बिखर जाए जो
रोटी बन भूखों की भूख मिटाए
ठिठुरते  हुओं को गरमाहट दे
सलीब पर चढ़ जाए
जिक्र जिसमें फ़ुटपाथ का हो
दु:ख-दर्द जिसमें साथ हो
 
बस वही कविता होती है ।


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