एक नदी बाहर बहती है रिश्तों की
एक नदी भीतर बहती है अहसासों की। नदी के भीतर कुछ द्वीप हैं बन्धनों के नदी में प्राण हैं साँसों के। नदी उफनती भी है, नदी सूखती भी है।
कुछ बन्धन हैँ काँटों के
कुछ रिश्ते हैं फूलों के
मैंने जीवन में जो बोयाहै उसको ही काटा है;
दु:ख झेला और कतरा-कतरा सुख बाँटा है।
अपनों का दिया विष पी-पीकर
अमृत के लिए मन तरसा है;
कितनी नदियाँ झेली हैं बाहर
कितनी नदियाँ झेली हैं भीतर एकान्त कोने में मन हरदम बरसा है ।