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ISSN 2292-9754

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04.22.2017


जेनरेशन गैप इन कुत्तापालन

 गैप तो हर जगह है! सरकार व जनता के बीच भी रहता है, पक्ष व विपक्ष के बीच रहता है, गुरू व चेले के बीच भी हो जाता है, पति पत्नी के बीच स्वर्गीय होने तक रहता है, क़ानून व उसके पालन में भी रहता है, कोर्ट के निर्णय व उसके क्रियान्वयन में भी रहता है, कथनी व करनी में तो हमेशा से रहता ही आया है! इस तरह गैप सर्वव्यापी है। एक पीढ़ी का दूसरी पीढ़ी से भी हमेशा से रहते आया है। हाँ, यह जब ज़्यादा हो जाये तो दुखदायी होता है। सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि कोई ऐसा ऐप बन जाये जो कि इसे सुखदायी महसूस करने वाला बना दे!

कलयुग में कुत्तापन बढ़ गया है! अतः कुत्तापन में भी गैप होता है कई शख़्स कम कुत्तापन रखते हैं तो कई कम कुत्तापन वाले होते हैं! "गैप", आपको आश्चर्य होगा सुनकर कि "कुत्ता पालन" जैसी चीज़ में भी होता है। हम इसके भुक्त-भोगी हैं। वैसे हमने कॉलेज के समय ही "कुत्तापन" नहीं माफ़ करे "कुत्ता पालन" का शौक़ पाल लिया था। तो पहली बार हम भोला "कुत्ते वाले" से, जिसकी चश्मे के अंदर से झाँकती आँखें व बड़े-बड़े कान किसी कुत्ते जैसे ही लगते थे, एक अलशेसियन पिल्ला ले आये थे। उसे पालने में हमें दिन में ही आसमान के तारे नज़र आने लगे थे। यों तो हमारे माँ-बापू कहते हैं कि हमें भी पालने में रखने से चलने लायक़ होने तक में उनको दिन में तारे नज़र आते थे। यानी कि हम इत्ती धमाचौकड़ी मचाते रहते थे। अपन कुछ भाग्यशाली थे कि कॉलेजी शिक्षा पूरी करने के बाद बेरोज़गारी ज़्यादा दिन नहीं झेलनी पड़ी। नौकरी मिल गयी तो बाहर जाना पड़ा और इसके चक्कर में अपने पाले कुत्ते को छोड़ के जाना पड़ा। जैसे पहले शहीद होने वाले वतन को बाद की पीढ़ी के हवाले करके जाते थे वैसे ही हम अपने कुत्ते को अपने घरवालों के हवाले करके घर से बाहर गये थे। लेकिन यह हवाले हवाला बन गया और हमारा प्रिय डॉगी हमारे घर से रूख़्सत होने के तीन माह के अंदर ही ग़म में गुम गया तो फिर कभी नहीं मिला! हमने विलम्ब से गुमने के समाचार मिलने पर चंद आँसू बहाये और प्रण किया कि अब कभी कुत्तापालन जैसा काम नहीं करेंगे! हमें कुत्तापालन में चंद लोगों के कुत्तापन पर बहुत ग़ुस्सा आया। लेकिन इस देश के अन्य युवाओं की तरह हम केवल ग़ुस्सा कर सकते थे उसके आगे कुछ नहीं!

लेकिन जल्दी ही हमारा यह प्रण किसी राजनैतिक पार्टी के चुनावी वायदे की तरह टाँय-टाँय फिस्स हो गया। हमें अपनी एक पोस्टिंग में एक अधिकारी के यहाँ ऊँटवालों के साथ आये एक परदेशी पहाड़ी कुत्ते व एक अलसेशियन कुतिया के प्रणय प्रसंग से जन्मे चार पिल्लों में से एक बिना चिल्ल पों के मुफ़्त में मिल गया। अब मुफ़्त की चीज़ जब मिलती है तो फिर सारे क़ायदे क़ानून, नैतिकता, सिद्धांत अपने आप ख़त्म हो जाते हैं! ओैर हमने यह दूसरा कुत्तापालन किया उस ज़माने में। कुत्तापालन हमने ख़ालिस देशी तरीक़े से किया था। कुत्ते को दाल-रोटी देना, कभी-कभार दूध दे देना, दो-चार माह में दो-एक बार मीट-शीट दे देना। बस न कोई डॉग बिस्क्टि, न कोई वूलन कपड़े, न पेडीग्री या ड्रूल इसे तो सुना भी नहीं था! न कोई दवा न दारू, बस कभी नर्म-गर्म तबियत हुयी तो सरकारी पशु चिकित्सालय में दिखा दिया। नाम मात्र का खर्चा या पड़ोस में रहने वाले वेटनरी असिस्टेंट जो अपने आप को डॉक्टर कहता व समझता था और हम भी उसे डाक्टर ही मानते व समझते थे से यदि ज़रूरत आन पड़ी तो मुँह में रस्सी का फंदा लगाकर दस रुपये प्रति इंजेक्शन की दर से एक दो ठन इंजेक्शन ठुकवा देना। फिर एक दिन यह दूसरा कुतरा भी दुनिया छोड़ के चला गया अपन ने ग़म में फिर चंद आँसू बहाये और फिर राजनैतिक पार्टी की तरह पुनः प्रण किया कि अब कभी "कुत्ता पालन" नहीं करेंगे!

लेकिन अपने मन मस्तिष्क पर भी हर पाँच साल में होने वाले चुनावों के चुनावी वायदों के पार्टियों द्वारा सत्ता में आने पर भूल जाने का स्थायी असर पड़ रहा लगता था।

हमारी बिटिया उम्र में छोटी परंतु अक़्ल में बड़ी हो रही, आजकल की अन्य लड़कियों की तरह ही थी, ने उस समय धोनी के नारे "ज़िद करो दुनिया बदलो" से यह ज़िद पकड़ ली कि उसे तो कुछ भी हो जाये सात दिन में "पप्पी" चाहिये ही, वह अब बहुत हो गया पाल कर ही रहेगी। हमने अपने प्रण के बारे में बताया तो उसने तपाक से कहा कि यह तो आपका प्रण है उसका नहीं! आपने "पिल्ला" पाला था मैं "पप्पी" की बात कर रही हूँ प्यारे पप्पा!! वह तो पाल कर ही रहेगी और उसकी मम्मी भी उसके साथ हो ली जो अभी तक कुत्तों की नापाक हरकतों से नफ़रत करती थी, तो हमे "प्राण जाये पर वचन न जाये" को तिलांजली देते हुये फिर "कुत्तापालन" करना पड़ा। यह हमारा "तृतीय कुत्ता" पालन था!

अब जब नये स्मार्ट व मोबाईल युग की किशोरी ने कुत्ता पालन किया तो हमे रोज़-रोज़ नये-नये जो निर्देश मिलने लगे; इतने निर्देश तो मेरे बॉस ने भी किसी बात पर नहीं दिये होंगे, और इन निर्देशों के पालन में बार-बार अपनी जेब ढीली करनी पड़ी तो हमें "जेनरेशन गैप इन कुत्तापालन" समझ में आया। हमें तो लगने लगा कि अब हमें इसके लिये ओवरटाईम काम करना पड़ेगा तब इस पप्पी को हम पाल पायेंगे!

पप्पी बहुत सेंसीटिव होते हैं उनके लिये फ़ैमिली डॉक्टर ज़रूरी होगा यह अस्पताल नहीं जायेगा वहाँ संक्रमण हो जाता है! वहाँ सड़क छाप कुत्ते ही आते हैं पहला निर्देश यह था बेटी की ओर से! हमने सोचा कि अपने बाप तक ने तो कभी "फ़ैमिली डाक्टर" नहीं रखा। अपना डाक्टर वो था जो पाँच रुपये में काग़ज़ से खुराक दर्शाने वाली रंगीन शीशी में रंगीन मीठा मिक्स्चर देता था और उससे बुखार एक दिन में ही छू-मंतर हो जाता था! जबकि आजकल के फ़ैमिली डाक्टर के हैवी कड़वे डोज़ के बाद भी दो हफ़्ते से पहले उतरता नहीं है।

हमने पहली बार सुना कि पिल्ले के लिये खिलौने भी आने लगे हैं, हमने कहा कि अपने कुत्ते को हमने मग, पुरानी चप्पल, आदि जैसे खिलौने दिये थे और उन्हें ही खेलकर वह बड़ा हुआ, पैरों पर खड़ा हुआ और अच्छे से जिया! बेटी बोली मैं सड़कछाप कुत्तों के खिलौने की बात नहीं कर रही हूँ! यह रजिस्टर्ड कुत्ता है इसको चिप लगी है इसके मूवमेंट पर "कैनल क्लब" की; कुत्ते के दाँतों से भी ज़्यादा पैनी नज़र ऑनलाईन है। यदि ज़रा सी ऊँच-नीच हुयी तो एट्रोसिटी में चले जाओगे अभी तक हमने "एट्रोसिटी एक्ट" इंसान वाला सुना था यह वाला सुनकर हम सहम गये। लेकिन हमें यह समझ में नहीं आया कि पिल्ले तो वोट देते नहीं फिर वोट की राजनीति यहाँ कैसे आ गयी। अब हमें पिल्ले के लिये तरह-तरह के खिलौने लाने पड़े और ये जनाब बल्कि नबाब कहें चार दिन में ही एक खिलौने से ऊब जायें तो दूसरे खिलौने का फ़रमान आ जाता! मैंने सोचा कि इतना तो इंसान का बच्चा भी फिजूल ख़र्ची नहीं करवाता; एक ही तरह के खिलौने बहुत दिन तक चलाता रहता है! भाई के खिलौने से छोटी बहन व बहन के खिलौने से छोटा भाई खेल लेता है! पिल्लों में भाई-चारा व बहिन चारा बिल्कुल भी नहीं है!

जितना हमने अपने बेटे को कार में नहीं घुमाया होगा इससे ज़्यादा इस पप्पी को घुमाना पड़ता। इंसान का बच्चा तो एक बार मान जाये लेकिन यह तो मचल जाता था! रोज़ शाम को कार में सैर करने का अपना अधिकार समझने लगा था।

अब इनके दाँत निकल रहे हैं तो तरह-तरह की बोन को मज़बूत बनाने वाली चीज़ें बाज़ार से लायी जा रही हैं, जिनसे इन्हे दाँत निकलने में तकलीफ़ न हो, साथ ही इनकी दाँत से काटने की हसरत अच्छे से पूरी हो जाये! डेंटास्टिक, च्यूस्टिक और न जाने क्या क्या लानी पड़ी। मुझे लगा कि जो कुतिया पालते हैं वे उसके बड़े होने पर लिपिस्टक भी लाते होंगे! इन्हें रोज़ सुबह उठने पर डेंटास्टिक ज़रूरी थी, बताया गया कि इससे इनके दाँतों का ब्रश एक तरह से हो जाता है!

एक दिन फ़रमान आ गया कि इनका "लॉकेट" लेकर आयें हम चौंके कि अपन अभी तक ढंग का लॉकेट नहीं पहन पाये इनके लिये ज़रूरी है! लॉकेट ले आये पप्पी जी के गले में लॉकेट लटका और अपनी जेब और ढीली होकर लटकने लगी।

रोज़ाना कभी डॉगी का टेल्कम पाऊडर आ रहा है, तो कभी टिक्स के लिये पावडर, तो कभी कोई अन्य लोशन या दवाई। हमने सोचा अपने पहले कुत्ते "शेरा" को अपना ही टेल्कम पावडर लगाकर बड़ा किया और उसने हमेशा इसे वेल्कम किया और ये नये ज़माने का कुत्ता अपने लिये अलग टेल्कम पावडर चाहता है। इनका स्पेशल दाँतों का ब्रश लाना पड़ा। इससे एक क़दम आगे इनकी साँसों में बदबू न आये तो हमें इनका एक एरो स्प्रे भी लाना पड़ा, जो समय-समय पर इनके मुँह में स्प्रे किया जाता! बात यहीं तक रहती तो ठीक था लेकिन एक फ़रमान आया कि इनका शैम्पू ले आये मैंने कहा घर में इतने पाऊच शैम्पू के रखे हैं उसमें से किसी से भी नहला दे या आज थोड़ा रुक जाये हमारे नहाने के बाद पाऊच में कुछ शैम्पू बचेगा इसके काम आ जायेगा। इस पर बेटी नाराज़ हो गयी हमें खा जाने वाली नज़रों से देखते हुये बोली "पापा, प्लीज़ कुछ तो समझा करो आप" मैं सड़क छाप कुत्ते के शैम्पू की बात नहीं कर रही हूँ! हमने मन में सोचा कि हम इतना तो कम से कम समझ गये हैं कि यह कुत्ता आज तक किसी से कर्ज़ नहीं लेने वाले को कर्ज़दार बना कर ही छोड़ेगा। हमें इसी समय बैंक वालों की नासमझी का भी ध्यान आया कि न जाने कौन-कौन से कर्ज़ की स्कीम्स बनाकर रखी हैं लेकिन इतने सारे लोग कुत्ता पालन करने पर कर्ज़ के लिये मजबूर हो जाते हैं तो कोई स्कीम नहीं है? एक डॉग परचेज़ लोन व दूसरा डॉग मेन्टेनेन्स लोन तो तुरंत ही शुरू कर सकते हैं।

शैम्पू हम लेकर आये ही थे कि "केज" की बात आ गयी कि यह "केज" में ही रहेगा, मेरे सारे दोस्तों के कुत्ते जी केज में ही रहते हैं। केज को कहीं भी रख सकते हैं। चीज़ों का इतना क्रेज़; नयी पीढ़ी कुत्तापालन में क्रेज़ी है! यदि पप्पी जी को कोई टीवी का कार्यक्रम देखना है तो ड्राईंग रूम में भी रख सकते हैं, आगे पीछे के आँगन में भी उनकी इच्छा के मुताबिक रख सकते हैं! उनके लिये मज़ल लाना पड़ा जो महीने भर में बदलना पड़ा क्योंकि पप्पी जी दिन भर खा-खाकर बड़े हो गये थे। पहले तो पप्पी ख़ुद ही मज़ल को एक पज़ल समझते रहे बार बार मुँह से निकाल देते थे!

अब कोई दिन ऐसा नहीं जाता है जब कि इस "कुतरे" के संबंध में कोई डिमांड न आती हो बल्कि एक भी सुबह और शाम यदि इनकी डिमांड के बिना कट जाये तो हमे आश्चर्य होता है! हमें अपना "शेरा" याद आता तो हम ग़मगीन हो जाते कि दाल-रोटी खाने वाला हमारे ख़ुद के शैम्पू से ही या लाईफ ब्वाय से ही नहाकर जीवंत व चकाचक हो जाने वाला, बीमार होने पर सरकारी वेटनरी अस्पताल में ठीक हो जाने वाला, रात को अच्छे से चौकीदारी करने वाला, फर्श पर जहाँ जगह मिले वहीं तानकर सो जाने वाला, मुफ़लिसी के दिनों में अपने मालिक की जेब का ध्यान रखकर रूखी-सूखी खाकर ही प्रसन्न रह लेना, और कहाँ यह नये ज़माने का कुत्ता, ज़रा सी ठंडी होने पर ज़ुकाम हो जाता है, महँगी स्वेटर चाहिये इसे, फ़ैमिली डाक्टर चाहिये इसे, पेडीग्री चाहिये इसे, डैंटास्टिक चाहिये इसे और न जाने क्या-क्या चाहिये इसे और इस सबके बावजूद काम एक कौड़ी का नहीं करता। घर के अंदर दिन भर घुसा रहना, खाना व दिन भर पोटी करना!

क्या करे "जेनरेशन गैप" वाला कुत्ता है; हो सकता है ज़माना आगे हो गया है और हमारी सोच पीछे हो गयी है? कम से कम कुत्ता पालन में तो कह ही सकते हैं क्योंकि हमारे किसी भी बात पर प्रतिकार करने पर हमें यही सुनने को मिलता है कि हम सड़क छाप आपके वाले पुराने कुत्ते की बात नहीं कर रहे हैं।

गंगू को तो शेरा, शेरू, कालू, लालू आदि तरह की नाम वाले सारे कुत्ते जो कहीं भी देखे रहे हों याद आ रहे हैं। बेचारे बिना किसी डिमांड के कितने कम में गुज़र-बसर कर लेते थे और उसके ऊपर डयूटी भी अच्छे से बजाते थे। कितना भी दुत्कारो स्वार्थलोलुप व अवसरवादी लोगो की तरह पूँछ हिलाना नहीं छोड़ते थे!


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