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ISSN 2292-9754

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04.20.2018


तेरे लिए...

मुझे ख़ुद को उठाना ही होगा।
कबसे पड़ी हूँ गीली साड़ी की तरह
मन के सीले कोने पर।
मुझे ख़ुद को उठाना होगा
और फैलाना होगा
धूप और हवा के बीच
जीवन की ख़ुशनुमा डोर पर।
कि शाम होने से पहले
उदासी की किरचें हटा कर
बिछा सकूँ मलमल
तेरे रास्ते पे मैं।


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