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ISSN 2292-9754

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04.20.2018


ख़त

यह सारे शब्द मेरे रातों के हैं।
जहाँ हम तुमको जलाया बुझाया
करते हैं।
और उस धुएँ से निकल के
मैं उड़ जाती हूँ. . .
वक़्त की तरह बेवजह॥

यह शब्द मेरे रातों के हैं।
जहाँ तुम्हारी यादों से सीली हो जाती हैं।
मेरी तन्हाईयाँ
और उस ख़ुशबू से निकलके
मैं उड़ जाती हूँ. . .
वक़्त की तरह बेचैन॥

यह शब्द मेरे रातों के हैं
जिसके उस छोर पे तुम जगे हो कहीं।
और तमाम फ़ासलों से निकल के मैं
उड़ जाती हूँ यूँ ही. . .
वक़्त की तरह बेबस॥

यह सारे शब्द मेरे रातों के हैं।
जिसकी मुँडेर से नहीं दिखती हैं
अतीत और भविष्य की दिशाएँ।
और इस कोहरे में बैठ कर
मैंने सिर्फ़ एक वर्तमान लिखा है।

तुम्हारी रातों तक।


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