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ISSN 2292-9754

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12.27.2014


बच्चियों का बड़प्पन
(लिटल गर्ल्ज़ वाईज़र दैन मैन्न) : लियो टॉलस्टाय
अनुवादक :सुभाषिणी खेतरपाल

ईस्टर जल्दी आया था। स्लेज का मौसम अभी ख़त्म ही हुआ था। अहाते में बर्फ़ अभी भी पड़ी थी और गाँव की गली में पानी की धाराएँ बह रही थीं। दो फ़ार्म-हाउसों के मध्य की गली में, जहाँ खेतों के बाड़े से बहकर गन्दा पानी आता था; बड़ा ताल बन गया था, अलग-अलग घरों की दो लड़कियाँ आ मिलीं। एक लड़की बहुत छोटी थी, दूसरी थोड़ी बड़ी थी। उनकी माँओं ने उन्हें नए-नए फ्रॉक पहना रखे थे। छोटी का नीला और दूसरी का पीला छींट था। दोनों के सिर पर लाल रूमाल थे। चर्च से निकलते ही दोनों की मुलाकात हुई थी। सबसे पहले दोनों ने एक दूसरे को अपने-अपने कपड़े और साज़ो-सामान दिखाया और फिर खेलने में लग गईं। तभी उन्हें पानी में कूदने की सूझी। छोटी वाली पानी के ताल में, जूतों समेत, कूदने ही वाली था कि बड़ी ने टोक दिया।

उसने कहा, "माल्शा, ऐसे मत जाओ। तुम्हारी माँ तुम्हें डाँटेगी। मैं अपने जूते व जुराबें उतारती हूँ और तुम भी अपने उतार लो।"

ऐसा करने के बाद अपनी अपनी स्कर्ट ऊपर कर वे ताल में चलते हुए एक दूसरे की ओर बढ़ने लगीं। पानी माल्शा के घुटनों तक आ गया।

माल्शा ने अकोल्या से कहा, "पानी गहरा है। मुझे डर लग रहा है।"

अकोल्या ने जवाब दिया, "आओ, डरो मत। पानी इससे गहरा नहीं होगा।" जब दोनों एक दूसरे के निकट आ गईं तब अकोल्या ने कहा, "माल्शा, ध्यान से! कूदना मत। सावधानी से चलो।"

अभी उसने यह कहा ही था कि माल्शा ने अपना पैर पानी में ऐसे धड़ाम से रखा कि पानी के छींटे सीधे अकोल्या के फ्रॉक पर जा गिरे। पानी के छींटे अकोल्या के फ्रॉक पर ही नहीं उसकी आँखों और नाक पर भी जा पड़े। जब उसने पानी के धब्बे अपनी फ्रॉक पर देखे तो गुस्से में आकर माल्शा को मारने के लिए उसके पीछे भागी। माल्शा डर गई। जैसे ही उसे एहसास हुआ कि वह मुसीबत में पड़ गई है, झट से पानी से बाहर निकलकर घर की ओर भागने लगी। तभी वहाँ से गुज़र रही अकोल्या की माँ की नज़र उसकी स्कर्ट पर पड़े छींटों और गन्दी बाहों पर पड़ी तो उसने पूछा,

"शरारती,बेवकूफ लड़की,तुम क्या कर रही थी?”

लड़की ने जवाब दिया, "माल्शा ने ये सब जान-बूझ कर किया है।"

इस पर अकोल्या की माँ ने माल्शा को कसकर पकड़ा और उसकी गर्दन के पीछे दे मारा। माल्शा चिल्लाने लग गई ताकि उसकी आवाज़ पूरी गली में सुनाई पड़ जाए। माल्शा की माँ बाहर दौड़ी आई और अपनी पड़ोसन को डाँटने लगी, "तुम मेरी बेटी को क्यों मार रही हो?" एक बात से दूसरी बात निकलती चली गई जो क्रोध भरी लड़ाई में बदल गई। आदमी बाहर निकल आए और गली में भीड़ लग गई। बिना सुने सभी चिल्लाने, झगड़ने लगे। एक ने दूसरे को धक्का दिया और झगड़ा लगभग आपे से बाहर होने लगा। तभी अकोल्या की बूढ़ी दादी ने उनके बीच जाकर, उन्हें शान्त करने का प्रयास किया।

"दोस्तो, आप क्या सोचते हो। क्या आज के दिन इस तरह का व्यवहार उचित है। यह समय तो मौज-मस्ती का है, इस तरह की नासमझी का नहीं।" अगर अकोल्या और माल्शा स्वयं वहाँ न होती तो भीड़ वृद्धा की अनसुनी कर उसे वहाँ से खदेड़ देती। वह भीड़ को शान्त न कर पाती। जब औरतें एक दूसरे को गालियाँ दे रहीं थीं, अकोल्या अपने फ्रॉक से कीचड़ पोंछ कर वापिस पानी में चली गई थी। वह एक पत्थर लेकर रुके हुए पानी के पास की ज़मीन को खुरचने लग गई ताकि पानी को गली में बहने की राह मिल जाए। माल्शा उसके साथ हो ली थी। उसने भी लकड़ी का एक टुकड़ा उठाया और ठहरे हुए पानी के लिए रास्ता बनाने में लग गई। राह मिल जाने से गली में जमा पानी उधर बह निकला जिधर लड़ रहे आदमियों को वृद्धा शान्त करने का प्रयास कर रही थी। दोनों लड़कियाँ उस बहते पानी के झरने के किनारे-किनारे दौड़ने लगी।

अकोल्या चिल्लाई, "पकड़ो माल्शा,पकड़ो।" माल्शा हँसे जा रही थी, बोल नहीं पाई। लकड़ी के टुकड़े को बहते पानी पर तैरते देख, खुशी से भरी लड़िकयाँ सीधे आदमियों के झुण्ड के बीच जा पहुँची। उन्हें देख वृद्धा ने आदमियों से कहा,

"क्या तुम्हें शर्म नहीं आती? जिन लड़कियों के लिए तुम लड़ रहे हो, वे खुद तो सब कुछ भूल चुकी हैं और मज़े से इकट्ठे खेल रही हैं। प्रिय साथियो, वे तुम्हारे से अधिक समझदार हैं।"

उन नन्हीं लड़कियों को देखकर लोग शर्मिन्दा हो गए और स्वयं पर हँसते हुए अपने-अपने घर लौट गए।


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