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ISSN 2292-9754

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10.25.2014


अंध विश्वास

सुख और दुख मानव जीवन कॆ अभिन्न अंग हैं। लेकिन हम सब दुख से बचना चाहते हैं और सुख के उपाय करते हैं। इसलिए अमंगल की आशंका और अशुभ के निवारण के लिए मानव समाज में कुछ धारणाएँ और मान्यताएँ घर करती चली गईं। जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही हैं।

विश्व में सक्रिय सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावशाली, कुछ शाक्तियों के अस्तित्व में विश्वास ही अन्ध-विश्वास है। यह लौकिक चीज़ों को धार्मिक सम्मान और श्रद्धा से जोड़ने वाला विश्वास है। अन्ध-विश्वास विश्व में प्राचीन काल से प्रचलित हैं। सृष्टि के आरम्भ में प्रकृति के रहस्य मानव के लिए अबूझ थे। अज्ञात के डर से मनुष्य असुरक्षित महसूस करता था। इसी असुरक्षा की भावना को दूर और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए मानव ने अन्धविश्वास का कवच पहन लिया। इनका मूल अज्ञान है। ये तर्क से परे हैं।

कुछ लोगों में भूतों को लेकर बहस हो रही थी। एक ने कहा, "मैं नहीं मानता कि भूत होते हैं।" दूसरे ने कहा, "ठीक है, अगर ऐसा है तो जाओ, रात के अन्धेरे में श्मशान मे एक कील गाड़ आओ।" व्यक्ति वहाँ पहुँच गया। कील गाड़ते हुए अनजाने में उसकी धोती का किनारा भी कील में अटक गया जैसे ही उठने लगा,उसे लगा कोई चीज़ उसे खींच रही है। तभी उसके मन में विचार कौंधा, हो न हो, यह भूत ही है। जैस-तैसे स्वयं को छुड़ाकर वहाँ से भाग लिया। बिना जाँच पड़ताल किए कि वह वहाँ से क्यों नहीं उठ पा रहा था। उसने मान लिया कि भूत होते हैं।

आज हम चाँद और मंगल पर बस्तियाँ बसाने की तैयारी में हैं। परन्तु कुछ अस्पष्ट तथ्यों, घटनाओं और परिस्थितियों को सुलझाना आज भी सम्भव नहीं हो पाया है। वैज्ञानिक तथ्यों और प्रकृति के इन्हीं अनबूझे रहस्यों के अन्तराल को अन्धविश्वासों ने भरा है। ये अन्धविश्वास भगवान और इन्सान के बीच की एक कड़ी, एक सेतु का काम करते आए हैं।

लोग परिस्थितियों पर नियन्त्रण अथवा निश्चितता के लिए अन्धविश्वास का सहारा लेते हैं। वे उनमेँ कुछ नियम अथवा नमूने ढूँढ लेते हैं, जिनसे यह तय कर सकें कि चीज़ें और घटनाएँ इस तरह से क्यों होती या घटती हैं। अन्धविश्वास द्वारा प्राप्त यह मिथ्या निश्चितता कि ऐसा करना हमारे लिए शुभ होगा, अनिश्चितता से बेहतर है, इससे उन्हें अपने डर पर काबू पाने में सफलता मिलती है।

ऐसा माना जाता है कि अमूर्त शक्तियाँ हमारे सौभाग्य और दुर्भाग्य का कारण हैं। अन्धविश्वासों द्वारा हमने उन्हें अनुकूल साधने के तरीके ढूँढ लिए हैं। हमारी चयनक्षमता हमें इनकी ओर धकेल देती हैं। जिनके वश हो हम कुछ चीज़ों को शुभ और कुछ को अशुभ मान लेते हैं।

शीशे का टूटना, बिल्ली के रास्ता काट जाने आदि को अशुभ माना जाता है। बिल्ली को लेकर मुझे एक प्रसंग याद है। मेरे पति के एक मित्र की पोस्टिंग पेरिस हो गई थी। वहाँ पहुँच कर पहले ही दिन वे काम पर जाने के लिए जैसे ही बाहर निकले उन्हें एक बिल्ली के दर्शन हो गए। उनका माथा ठनका। वापिस घर चले गए। थोड़ी देर बाद पुनः निकले तो एक महिला की गोद में बिल्ली दिख गई। फिर लौट गए। बेचारे सोच सें पड़ गए। किसी तरह हिम्मत जुटाकर जैसे तैसे कार्यालय पहुँचे। हफ़्ता भर इसी तरह चलता रहा। उन्होंने देखा कि यहाँ तो लोगों ने बिल्लियाँ पाल रखी हैं...। तब उन्होंने स्वयं को समझाया कि अगर बिल्लियाँ इनके लिए शुभ हैं तो मेरे लिए अशुभ क्योंकर होंगी?

अन्धविश्वास की कोई लिखित संहिता नहीं है। यह तो पारम्परिक लोकमत हैं जो हमें अपने समाज,समुदाय, परिवार, परिचितों और मित्रवर्ग से मिलते हैं। हमने अपने माता-पिता से ग्रहण किए, बच्चों ने हमारे मे सीख लिए। हमारी दादी तीन लोगों को घर से कभी इकट्ठे नहीं निकलने देती थीं। क्यों, अशुभ होता है। कोई भी संस्कृति इनसे उबर नहीं पाई। ये हमारी सांस्कृतिक संरचना और प्रगति को परिभाषित करते हैं... हमारी पहचान हैं।

अन्धविश्वास कई प्रकार के हैं।

कर्मकांड अथवा धार्मिक अनुष्ठान:

 जिसका एक उदाहरण प्रेमचन्द की कहानी में मिलता है। जिसमें घर की बहू से बिल्ली की हत्या हो जाती है। बिल्ली का मरना तो अशुभ होता है। अब क्या किया जाए। पण्डित जी से सलाह ली जाती है। पण्डितजी सलाह देते हैं कि बिल्ली के भार की सोने की बिल्ली बनाकर दान दी जाए, तभी इसके दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है। अनुष्ठानों के द्वारा व्यक्ति विराट से, अपनी इच्छाएँ व्यक्त करता है,जिसके हाथों में जीवन की बागडोर है।

निरर्थक वर्जनाओं का अनुपालनः

सोच-समझ कर निर्णय लेने के स्थान पर अपने पालन-पोषण का दौरान आत्मसात की गई प्रथाओं का पालन किया जाता है, जिनसे हम परिचित होते हैं। क्योंकि माँ-बाप ऐसा करते हैं और दादा-दादी भी वैसा ही करते थे। अभ्यस्त कार्यों को करना ही अन्धविश्वास है। शिशु सबको बहुत प्यारा और सुन्दर लगता है। पर घर वालों का मन आशंकित रहता है कि उसे किसी की नज़र न लग जाए। नज़र लगना भी अपने आप में एक अन्धविश्वास है। जिसके लिए शिशु को काला टीका लगा दिया जाता है। काला टीका लगाकर सब निश्चिन्त हो जाते हैं। बुरी नज़र से बचने के लिए हरी मिर्च और नींबू को पिरोकर लटका देने के अन्धविश्वास से कौन परिचित नहीं। लड़की अपनी बारात न देखे आदि आदि। कई अन्य वर्जनाएँ और निषेध हमारे समाज में प्रचलित हैं। इसी तरह प्रतीकों की भी एक लम्बी श्रृंखला है जो किसी महत्वपूर्ण घटना की पूर्वसूचना देने वाले माने जाते हैं। रोटी बनाते समय हाथ से पेड़ा गिर जाए तो माना जाता है कि घर में अतिथि आने वाला है।

अनुकूल शक्तियों में विश्वास:

ऐसा मानना कि प्रकृति के पदार्थों अथवा तत्वों में एक विशेष प्रकार की शक्ति होती है। अगर व्यक्ति किसी विशेष समय़ उस पदार्थ का प्रय़ोग करे तो उस में विद्य़मान शक्ति का लाभ उठा सकता है।

सम्भावना का नियमः

दैवयोग या संयोगवश इच्छित फल की प्राप्ति होने पर लोग अपने अन्धविश्वास के औचित्य पर बल देते हैं। दुर्भाग्य से बचने का लिए शनि ग्रह को शान्त करने हेतु लोग तेल में सिक्का डालकर सुरक्षात्मक उपाय कर कर लेते हैं। जबकि अधिकांशतः कुछ बुरा घटता नहीं लेकिन श्रेय हम अपने उपाय को देते हैं।

भगवान की अनुचित पूजा भी अन्धविश्वास का एक रूप है। पुराने समय में भगवान को खुश
करने के लिए पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी। प्रतिकूल ग्रहों की शान्ति के लिए तथाकथित मांगलिक लड़की की पहले पीपल के पेड़ से शादी करा दी जाती है। ये अन्धविश्वास हमारे जीवन में बिन बुलाए अतिथि की तरह चले आते हैं।

एक दिन मेरा बेटा पलंग पर बैठा पाँव लटकाए टाँगें हिला रहा था। उसे टाँगें हिलाते देख मेरी बेटी ने कहा, ऐसा मत करो। मम्मी-पापा की लड़ाई हो जाएगी। यह सुनकर मैं सकपका गई।

मुझे हैरानी भी हुई और हँसी भी आई। मैंने बेटी से पूछा, उसने ऐसा कैसे मान लिया। तो उसने बताया कि पिछली बार जब मैं ऐसे ही टाँगें हिला रही थी तो आप दोनों लड़ रहे थे। उस प्रसंग को याद कर मैं सोचने लगी कि कैसे मेरी बच्ची की बाल बुद्धि ने निष्कर्ष निकाला था। जिसने हमारे लड़ने (जो वास्तव में लड़ाई थी भी नहीं) और टाँगें हिलाने के बीच कार्य कारण सम्बन्ध जोड़ लिया था। जो कहीं से भी परस्पर सम्बद्ध नहीं थे। ऐसे बनते हैं अन्धविश्वास।

चार्ल्स प्लाट ने अपनी पुस्तक में चार्ल्स डारविन के एक रोचक संस्मरण का उल्लेख किया
है –

एक बार चार्ल्स डारविन अपने एक मित्र के साथ लन्दन के चिड़ियाघर गए हुए थे। बातों-बातों में विवेक (समझ, तर्क) और नैसर्गिक (स्वाभाविक) प्रवृति जैसे जटिल विषय पर चर्चा चल पड़ी। उनका मानना था कि स्वाभाविक व्यवहार पर विवेक का नियन्त्रण होता है। घूमते-घूमते वे साँप-घर जा पहुँचे। जहाँ ज़हरीले साँप पारदर्शी शीशे के दरवाज़े के अन्दर बन्द थे। डारविन ने उस पारदर्शी दरवाज़े पर अपना चेहरा टिका दिया। एक साँप ने उनके हस्तक्षेप पर आपत्ति जताने के लिए अपनी लपलपाती जीभ से उनके गाल पर वार किया। उन्होंने तुरन्त एक झटके से स्वयं को उस ख़तरे से, जो ख़तरा था भी नहीं, अलग कर लिया। वे अपने मित्र की ओर पलटे और स्वीकार कर लिया कि व्यवहार विवेक से ज़्यादा सक्षम होता है। यही बात अन्धिवश्वासों पर लागू होती है। वे हमारी मानसिकता का अंग बन गए हैं।

प्राचीन काल में धर्माधिकारी बाढ़, भूकम्प, सूखा, अकाल, टूटते तारे और बिजली गिरने को प्राकृतिक आपदा न बताकर दैवी प्रकोप का नाम देकर दान की महिमा गाते थे। जिससे मन्दिरों के भण्डार भरे रहें और उनकी साख बनी रहे।

अन्धविश्वास धर्म और विज्ञान के विकल्प के रूप मे हमारे सामने आते हैं।

ये ऐसे विश्वास हैं जिन्हें हम चाहें तो मान लेते हैं और न चाहें तो नकार देते हैं। जादू, टोना और चमत्कार में विश्वास भी लोगों को इनकी ओर खींचता है। अन्धविश्वास की पुष्टि करने वाले दार्शनिक तर्क देते हैं कि सोच के धरातल पर कुछ मान लिया जाए तो वह असम्भव नहीं रहता। ये लोगों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता को पूरा करने का आसान रास्ता हैं। सदियों से चले आ रहे अन्धविश्वास मिटते और बनते रहते हैं। ज्योतिषयों की सलाह पर हमारी कई प्रसिद्ध हस्तियों ने अधिक से अधिक सफलता पाने के लिए अपने नाम की वर्तनी के किसी एक अक्षर को दो बार जोड़ लिया है। एकता कपूर के सभी धारावाहिक "क" अक्षर से आरम्भ होते हैं। ज्योतिष की लोकप्रियता सब जानते हैं। आज हर समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं में ज्योतिषफल स्तम्भ देखने को मिलता है। ज्योतिष में विश्वास न रखने वाले भी अपना भविष्यफल देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाते।

जब तक भविष्य के प्रति डर और अनिश्चितता बनी रहेगी तब तक हमारे जीवन में अन्धविश्वासों का अस्तित्व रहेगा। यह सर्वमान्य़ है कि तर्क हमारे सभी प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकता। प्रकृति के कई रहस्य अभी भी विज्ञान की पहुँच से परे हैं, और फिर अन्धविश्वास में तो तर्क का स्थान होता कहाँ है?

स्वास्थ्य़, समृद्धि, सुख और सफलता पाने के लिए इन्सान सरल उपाय ढूँढता है। अन्धविश्वास ऐसा ही एक सरल उपाय है। इनका उपहास उड़ाने वाले भी काली बिल्ली के रास्ता काटने पर डर जाते हैं।

मानव एक विचित्र प्राणी है। वह कठोर यथार्थ से नफ़रत करता है। वह यथार्थ की सच्चाई समझना भी नहीं चाहता। उसे ऐसी वास्तविकता चाहिए जो सरल हो और उसे तनाव और अपेक्षामुक्त रखे। उसे मेहनत से अरुचि है। वह अपनी पसन्दानुसार, मौज और भावावेश में बहकर काम नहीं कर सकता, जिनके परिणाम न हों। उसे इस बात से नफ़रत है कि बिना कुछ किए उसे कुछ नहीं मिलने वाला। अन्धविश्वास उसके लिए जादू की छड़ी है। वह सच्चाई के स्थान पर अन्धविश्वास चुनता है। अन्धविश्वास एक ऐसा विकल्प है जो किसी को स्वतः ही विजेता बना देता है। इन्हें अपनाकर वे अपने चुनाव के परिणामों से बच सकते हैं। अन्धविश्वास यथार्थ को नकारने वाला ऐसा उड़न ग़लीचा (कालीन) है जो मालिक को सुख और सफलता की मुफ़्त सवारी कराता है।


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