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ISSN 2292-9754

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10.24.2014


नव वर्ष और संकल्प

सुस्वागतम्‌!

एक बार फिर नए वर्ष का शुभ आगमन एक नई शुरूआत लेकर हमारे द्वार पर दस्तक देने आ पहुँचा है। यह समय है स्वयं से वार्त्तालाप करने का। देखते ही देखते वर्ष 2003 बीत गया। दिसम्बर आते न आते हम उत्सुकता से नए वर्ष की बाट जोहने लगते हैं। नए वर्ष की नई सुबह से आरम्भ होता है, पूर्व संध्या पर किए गए संकल्प का क्रियान्यवन! हर व्यक्ति के जीवन में दो अवसर आते हैं जब वह बीते समय का लेखा-जोखा करने के साथ-साथ आने वाले समय का बेसब्री से स्वागत करता है। वे दो अवसर हैं; नव वर्ष का आगमन और व्यक्ति का अपना जन्म-दिवस। इन दोनों अवसरों पर हम बैठकर ‘क्या खोया, क्या पाया’ का आँकलन करते हैं। विगत में जो कमियाँ रह गईं , उन्हें दूर करने का तथा भविष्थ मे आगे बढ़ने के लिए सुव्यवस्थित जीवन जीने का निश्चय लेते हैं। व्यक्ति इसी अवसर पर अपने जीवन के एक नए अध्याय का आरम्भ करता है। अतीत का मोह कुछ सोचने को मजबूर करता है तो अनजान भविष्य अपनी ओर खींचता है। गत वर्ष के अनुभव अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं। उपलब्धियाँ व्यक्ति को सिर उठाकर चलने योग्य बनाती हैं। कुछ निश्चय अधूरे भी रह जाते हैं। कुछ मीत बिछुड़ जाते हैं, जो एक कसक छोड़ जाते हैं। परन्तु नव वर्ष सुनहरा भविष्य संजोए हमें थपथपाता है, आश्वस्त करता है कि “चलो तो सही। मंज़िल स्वयं तुम्हारे पाँव चूमने के लिए बेताब है।”

नव वर्ष मनाने की प्रथा लगभग 4000 साल पुरानी है। इससे पहले बेबीलोनिया में 2000 ई.पू. के वर्षों में नया वर्ष वसन्तकालीन अमावस्या के दिन मनाया जाता था। वसन्त का आरम्भ नव वर्ष के आगमन का उपयुक्त समय भी था। इसी ऋतु में ही तो नई फसल बोयी जाती है। यह उत्सव ग्यारह दिन तक चलता था। रोम में भी नव वर्ष का आरम्भ मार्च के उत्तरार्द्ध में होता था। परन्तु धीरे-धीरे सूर्य की उनके कैलेन्डर के साथ समकालिकता बिगड़ गई।

कैलेन्डर को सही करने के लिए रोम की सेनेट ने 153 ई.पू. में एक जनवरी को नव वर्ष का शुभारम्भ घोषित कर दिया। यह फेर-बदल चलता रहा। 46 ई.पू. में जूलियस सीज़र ने जूलियन कैलेन्डर की स्थापना की। जिसके अनुसार एक बार फिर से एक जनवरी को नव वर्ष की मान्यता दी गई। परन्तु सूर्य से कैलेन्डर की समकालिकता के लिए सीज़र को पूर्व वर्ष को 445 दिन तक बढ़ाना पड़ा था। 1582ई. में पोप ग्रेगरी 13वें ने जूलियन कैलेन्डर का नया संस्करण निकला, जो आज तक प्रचलित है। ‘जनवरी’ मास का नाम रोम के देवता ‘जेनस’ के नाम पर रखा गया, जिसके दो मुँह हैं। एक चेहरा विगत की ओर देख रहा है तो दूसरा आगत में झाँक रहा है।

नव वर्ष के आगमन को लेकर कई परम्पराएँ प्रचलित हैं। एक परम्परा चली आ रही ह, संकल्प करने की। बेबीलोनिया के कृषिप्रधान समाज में सबसे लोकप्रिय संकल्प था; खेती के लिए उधार माँगे गए औज़ारों को लौटाना! आज के समय में कुछ लोकप्रिय संकल्प हैं: वज़न घटाना, सिगरेट और शराब छोड़ना, परिवार और बच्चों के साथ समय बिताना, योगाभ्यास तथा समय और पैसे का सदुपयोग आदि। ये किए गए संकल्प कितने पूरे होते हैं, यह दूसरी बात है।
ऐसा माना जाता है कि नव वर्ष के दिन जो कुछ किया जाए, उसका असर पूरे साल पर पड़ता है। इसीलिए सभी नव वर्ष के आगमन के क्षण अपने आत्मीय और प्रियजनों के साथ मनाना पसन्द करते हैं। हर व्यक्ति भरसक प्रयत्न करता है कि नव वर्ष का प्रथम दिन वह आदर्श ढंग से बिताए, जिससे वर्ष भर वह उसी ढंग से चल सके।

उत्सव की बात है और खाने की चर्चा न हो, कुछ जंचता नहीं। नव वर्ष के समय किसी भी तरह का खाद्य पदार्थ जो वृत्त अथवा चक्र के आकार का हो, शुभ माना जाता है। चक्र प्रतीक है पूर्णता का, समय का एक चक्र पूरा हो गया। शायद इसीलिए डच लोग इस दिन डोनट खाना शुभ मानते हैं। बन्द गोभी खाना भी शुभ माना जाता है। बन्द गोभी के पत्ते समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं। इसे कागज़ी मुद्रा का प्रतीक माना जाता है।

यह तो था नव वर्ष का इतिहास। नव वर्ष के आगमन पर अभी तक आपने कोई शुभ संकल्प नहीं लिया तो उठाइए कागज़-कलम और अपनी प्राथमिकता के अनुसार अपना संकल्प लिखिए। मसलन आप अपने जीवन में कोई परिवर्तन लाना चाहते हैं; किसी क्षमता का विकास करना चाहते हैं अथवा किसी बुरी आदत से छुटकारा पाना चाहते हैं। ध्यान रहे संकल्प लेने के बाद उसे व्यवहार में कैसे लाना है, इसकी योजना बनाइए और जुट जाइए। एक बार में एक ही संकल्प लें तो उसे पूरा करने में सुविधा रहेगी। अपने व्यक्तित्व में बदलाव लाना परिपक्वता का लक्षण है। परिवर्तन का दूसरा नाम प्रगति है।
अभी तो नव वर्ष का उत्साह और जोश हवा में है। हर दिन नई शुरूआत लेकर आता है। लिखते-लिखते मैंने भी संकल्प लिया है - अपनी लेखन क्षमता बढ़ाने का। अगले वर्ष अवसर मिला तो अपना अनुभव आपसे अवश्य साँझा करूँगी। तब तक शुभकामनाओं के साथ---


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