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ISSN 2292-9754

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01.02.2015


उलटे रिश्ते

चालीस वर्ष के लंबे प्रवास के बाद 66 वर्षीय जगदीश भट्ट अमेरिका से भारत आये तो सर्वप्रथम वे देहरादून गए । यही कोई अस्सी वर्ष पहले उत्तराखंड के एक गाँव से उनके पिता जी देहरादून आकर बस गए थे। रूड़की से इंजीनियरिंग और मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, अमेरिका से एम.टेक. करने के बाद वे अमेरिका की एक प्रतिष्ठित कंपनी में कार्य करने लगे। संयोग कुछ ऐसा बना कि वह इस बीच सिर्फ एक बार भारत आ पाया और वह भी तब जब उसके माता-पिता एक सड़क दुर्घटना में अचानक चल बसे। उसे तब अमेरिका आये सिर्फ दो वर्ष हुए थे। उसके बाद परिस्थितियों ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि चाहते हुए भी वह स्वदेश न आ पाया। उसका विवाह अमेरिका में पैदा हुई सरोज जोशी नामक जिस लड़की से हुआ, उसका पूरा परिवार अमेरिका में रहता है। बहरहाल, देहरादून में उसके तीन चचेरे भाई सोहन, प्रदीप और नरेंद्र रहते हैं। उनसे कुछ वर्ष पहले फेस बुक की कृपा से जब उसका संपर्क हुआ तो उसका मन उसे उन्हें मिलने के लिए उकसाने लगा। उनमें से एक डोभालवाला में रहता है और दो पटेल नगर में आजू-बाजू में रहते हैं।

बहरहाल, जब वह देहरादून पहुँचा तो पहले वह सीधे डोभालवाला गया। वहाँ जिस युवती ने दरवाज़ा खोला, उसने उन्हें ताऊ जी कहकर प्रणाम किया। जब उसने पूछा कि सोहन कहाँ है तो उस युवती ने बताया कि पिता जी अभी-अभी बाज़ार गए हैं; पाँच-सात मिनट में आ जायेंगे और माँ जी किचन में हैं। उसे सोहन की बेटी और अपनी भतीजी समझ कर उन्होंने अपने सीने से लगा लिया। ख़ैर, कुछ ही देर में सोहन आया तो तब मालूम हुआ कि वह तो सोहन के बेटे रोहित की बहू है। बाद में जब वह प्रदीप और नरेंद्र के घर गया तो वहाँ उसे यह देख ताज्जुब हुआ कि उनके बेटों की बहुएँ भी अपने ससुर को पिता जी, सासू को माँ और जेठ और देवरों को भाई साहब कहती हैं। आधुनिकता के प्रतीक अमेरिका में रहने वाले जगदीश को लगा कि आधुनिक दिखने की लालसा ने देवभूमि में रिश्तों को इस कदर बदल दिया है कि पति-पत्नी के संबोधनों को सुनकर ऐसा लगता है जैसे वे सगे भाई-बहन हों।


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