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ISSN 2292-9754

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10.27.2014


नाइन एलेवन

मुझे लगा था कि मैं हज़ारों लोगों से घिरा हुआ हूँ और वे मेरे से पूछ रहे थे कि मैं वहाँ क्यों आया हूँ? मैंने देखा वे सब वहाँ घूमने वाले प्रत्येक इंसान से वही सवाल पूछ रहे थे। लोगों को उनका सवाल शायद सुनाई नहीं दे रहा था अन्यथा वे "चीज़" बोलते हुए यूँ अपनी तस्वीरें न खिंचवा रहे होते। सवाल पूछने वालों में हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, बौद्ध, आस्तिक, नास्तिक सभी तो शामिल थे। वे दुनिया के लगभग सभी छोटे-बड़े देशों से थे। वहाँ कोने की तरफ शबीर अहमद, पीटर एल्डरमैन, राजेश खण्डेलवाल, तारिक़ अमानुल्लाह और मैंडी चांग नज़र आए तो ठीक मेरी बायीं तरफ पैट्रिक जे ब्राउन, नरेंद्र नाथ, मुहम्मद शाजहाँ, नज़म ए हाफ़िज, क्युंग ही चो और मनीष पटेल खड़े मुझे घूर रहे थे। मुझे उनका सवाल पीड़ा पहुँचाने लगा। सचमुच मैं वहाँ आखिर क्यों आया था? यह तो मैंने वहाँ जाने से पहले गहराई से सोचा ही न था। मैं उस भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ा तो मैं जिससे टकराया वह एक जीता-जागता इंसान था। सॉरी कहते हुए मैं अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर आ चुका था। मैंने अपने पीछे चल रही अपनी बेटी से कहा, "मैं 11 सितंबर 2001 के दिन वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर्स पर हुए उस हमले को पूरी दुनिया के प्रति किया गया एक जघन्य अपराध मानता हूँ। वे लोग जो जिनकी यादगार में ये "मेमोरियल्स" बनाए गए हैं, हम सभी को उनको श्रद्धांजलि देने यहाँ, इस मैनहटन, न्यूयॉर्क में बने "9 / 11 मेमोरियल एंड म्यूजियम" में जरूर आना चाहिए।

काश, उस हमले में मारे गए शबीर अहमद, पीटर एल्डरमैन, राजेश खण्डेलवाल, तारिक़ अमानुल्लाह और मैंडी चांग जैसे सभी तीन हज़ार निर्दोष लोग भी मेरी यह बात सुन पाते।


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