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ISSN 2292-9754

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08.17.2014


अधूरी कथा

सान फ्रांसिस्को एयरपोर्ट के गेट 52 से न्यू जर्सी के लिए वर्जिन अमेरिका की फ्लाइट संख्या वी एक्स 1178 के वायुयान में बैठते समय मैंने सपने में भी न सोचा था कि यहाँ भी एक लघुकथा मेरा इंतज़ार कर रही थी। पत्नी भी साथ थी, इसलिए उस अधूरी कथा के श्रवण का आनंद दुगना हो गया। हमारी सीट संख्या 16 ई और 16 एफ थी और जिन लोगों से मुझे इस कथा के लिए मसाला मिला, उनकी सीट संख्या 17 ई और 17 एफ थी। मुझे लगता है कि उन लोगों ने हमें नहीं देखा था अन्यथा वे ऐसी बातें कभी न करते। ख़ैर, अभी हमारी इस 5 घंटे 35 मिनट की उड़ान के सिर्फ 15 मिनट ही बीते थे कि पिछली सीटों पर होने वाली रोचक गुफ्तगू ने हम दोनों का ध्यान बरबस अपनी तरफ खींच लिया। पत्नी पति से कह रही थी, "आप मानो या न मानो; बहू ने तो न जाने क्या जादू किया है, राजू वही करता है जैसा वो कहती है।" जवाब में उस भद्र महिला के पति बोले - "अरे, तो इसमें बुरा क्या है? आखिर, राजू मेरा ही बेटा है। तुम ये बताओ कि पिछले चालीस वर्षों के दौरान क्या कभी कोई ऐसा मौका आया है जब मैंने तुम्हारा कहना न माना हो।"

अभी वह महिला इस रचनात्मक संवाद को आगे बढ़ाती कि तभी मैं रेस्ट रूम जाने के लिए अपनी सीट से उठा और उस महिला और उसके पति को अंदाज़ा हो गया कि उनसे अगली पंक्ति में उनके जैसा एक और हिन्दुस्तानी जोड़ा बैठा है। फलस्वरूप, उस महिला ने अपने सामान्य विवेक का परिचय देते हुए अपनी उस चर्चा पर वहीं विराम लगा दिया और हम इस निंदा पुराण का पूरा आनंद न ले पाए। अब सोच रहा हूँ कि मुझे शायद अपनी प्राकृतिक ज़रूरत को कुछ देर तक दबाए रखना चाहिए था। वैसे उस महिला ने बाद में अपने पति की इस उच्छृंकलता की ख़बर ज़रूर ली होगी; ऐसा मेरा अनुमान है।


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