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ISSN 2292-9754

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05.07.2015


अच्छे बेटे का फर्ज

रागिनी और शेखर के घर आमने-सामने थे। बचपन में उस मोहल्ले की गलियों में वे साथ-साथ रेत के घरौंदे बनाते रहे। किशोरावस्था में वे एक ही सरकारी स्कूल में पढ़ते रहे। यौवन की दहलीज़ पर कदम पड़े तो न जाने उन्हें यह अहसास कब हुआ कि अब उन्हें दूसरों से नज़रें बचाकर मिलना चाहिए। मोबाइल पर देर रात तक बातें करना उनकी दिनचर्या में शामिल था। ख़ैर, फिर वह दिन भी आया जब रागिनी को उसकी माँ ने शेखर से दूर रहने का आदेश दिया। उधर शेखर के बाप ने भी उसे डाँटते हुए कहा, "तुम्हारा रिश्ता तो मैंने वर्षों पहले अपने एक अभिन्न मित्र की बेटी से तय कर लिया था। तुम्हें ख़ुद को एक अच्छा बेटा साबित करना होगा।"

बहरहाल, उस दिन जब उस मोहल्ले में रागिनी की बारात आई तो एक अच्छे बेटे का फ़र्ज़ निभाते हुए शेखर अपने माता-पिता के साथ पास के दूसरे कसबे में बाप के अभिन्न मित्र के घर अपनी सगाई की दावत जीम रहा था।


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