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05.17.2012


प्रवंचना

रात क़रीब ग्यारह बजे मनोज का फ़ोन आया। उसने कहा, "सॉरी टू डिस्टर्ब यू सो लेट आनंद जी। मैं जानना चाहता था कि क्या आपकी भतीजी की कहीं बात बनी?" मैंने ही मनोज को अपनी भतीजी के लिए कोई अच्छा-सा लड़का बताने के लिए कहा था। मनोज को याद था और उसने इसी बारे में जानने के लिए इतनी रात को फ़ोन किया था। मैंने उसे बताया कि मेरी भतीजी का रिश्ता अभी तक तै नहीं हुआ है। मनोज ने कहा कि उसकी नज़र में एक बहुत अच्छा लड़का है। उसने एक-दो दिन के अंदर-अंदर उस लड़के का बायोडाटा भिजवाने की बात कही।

फिर मनोज ने बताया कि इस बार "वैल्दी वर्ल्ड’ में वो मेरे दो लेख एक साथ प्रकाशित कर रहा है। अभी संपादकीय नहीं लिखा गया है वरना पत्रिका अभी तक आ चुकी होती। फिर मुझसे कहने लगा, "आपके पास समय हो तो आप लिख दो।" मैंने असमर्थता व्यक्त की और साथ ही कहा कि मैं भला दूसरे के लिए क्यों लिखूँ?

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं। कोई न कोई तो लिखता ही है। आप ज़रा अच्छा लिख देंगे इसलिए आपसे कह रहा हूँ", मनोज ने कहा।

"कल दोपहर तक लिख लो, मैं ख़ुद आकर ले जाऊँगा और आपको लड़के का बायोडाटा भी दे जाऊँगा," मनोज ने आगे कहा। "मैं निरूत्तर और मौन था। मेरे मौन का अर्थ समझकर मनोज ने कहा, "ठीक है आनंद जी! कल दोपहर को मिलते हैं। नमस्कार! शुभरात्रि!"

मैं सारी रात किताबें उलटता-पलटता रहा तब कहीं जाकर सुबह के साढ़े चार-पाँच बजे तक ’कुछ’ लिख पाया। सुबह देर से उठा। चाय पीने के लिए कप हाथ में उठाया ही था कि दरवाज़े की घंटी बजी। मनोज ही था। अंदर आकर मनोज मेरे लेखों की तारीफ़ के पुल बाँधने लगा। मैंने रात का लिखा हुआ उसके हवाले कर दिया और प्रश्नसूचक दृष्टि से मनोज की ओर देखा। "सॉरी आनंद जी! उस लड़के का रिश्ता तो पक्का हो चुका। कल ही हुआ है। एक और लड़का है मेरी नज़र में, उससे भी अच्छा है। उसका बायोडाटा भिजवाता हूँ।" ये कहकर मनोज खड़ा हो गया। मैंने कहा बैठो चाय तो पीओ मनोज। "थैंक्यू आनंद जी मैं नाश्ता करके ही घर से निकलता हूँ और संपादक जी बाहर गाड़ी में बैठे हैं। हम ज़रा जल्दी में हैं।" इतना कहकर मनोज मेरे उठने से पहले ही खट-खट करता हुआ दरवाज़े से बाहर हो गया।


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