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जीवन में
कभी ऐसा नहीं हुआ जब सुनील बाबू कभी किसी के घर खाली हाथ गए हों।
शादी-ब्याह में क्या मजाल जो कोई भी मेहतान बिना मिठाई के चला जाए। खुद
मुख्य द्वार पर उपस्थित रहेंगे और सभी मेहमानों को आदर-मान के साथ विदा
करेंगे। सुनील बाबू के इकलौते बेटे की शादी का रिसेप्शन था। भव्य समारोह
आयोजित किया गया था। मेहमान खाने-पीने और नाचने-गाने में मशगूल थे। पर
सुनील बाबू हस्बे-मामूल मुख्य द्वार पर डटे हुए थे। कुछ देर पहले आगंतुकों
का स्वागत कर रहे थे और अब उन्हीं को विदाई दे रहे थे। उनके वफरीब ही
मिठाइयों के छोटे-बड़े विविध प्रकार के डिब्बों का पहाड़-सा खड़ा था। जैसे ही
कोई मेहमान जाने के लिए इजाज़त माँगता सुनील बाबू नौकर की ओर इशारा करते।
उनका पुराना ख़िदमतगार राम बहादुर फ़ौरन एक डिब्बा उठाता और सुनील बाबू को
थमा देता। सुनील बाबू उसे मेहमान को सौंपते हुए उसके आने का ध्न्यवाद करते
और झुक कर प्रणाम करते। ज्यों-ज्यों समय सरकता गया मेहमानों की वापसी में
भी तेज़ी आने लगी। विदा लेने वाले मेहमानों की लाइन-सी लग गई। इसी लाइन में
सबसे अंत में खड़े थे जय प्रकाश जी। सुनील बाबू के खास परिचितों में रहे हैं
जयप्रकाश जी और साथ ही रिश्तेदार भी। उन्होंने भी इजाज़त माँगी। नौकर ने
जैसे ही मिठाई का एक डिब्बा जय प्रकाश जी को देने के लिए सुनील बाबू के हाथ
में थमाया सुनील बाबू ने डिब्बे को वापस नौकर को देते हुए अत्यंत धीमी
लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कहा कि लोगों की हैसियत तो देख लिया कर और एक छोटा
सा डिब्बा उठाकर जय प्रकाश जी को थमाते हुए आने के लिए उनका धन्यवाद किया
और कहा कि भाभीजी और बच्चों को भी साथ लाते तो मुझे कितना अच्छा लगता! जय
प्रकाश जी को बाद में कही गई बात तो नहीं सुनाई पड़ी लेकिन जो बात वो सुन
चुके थे वो सब सुनने के बाद भी उन्होंने ऐसा प्रकट किया जैसे कुछ सुना ही न
हो। लेकिन पकड़ा हुआ मिठाई का डिब्बा उन्हें इतना भारी लग रहा था कि उन्हें
अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उन्हें लगा कि नौकर ने छोटा डिब्बा
दिया होगा इसी से उसे डाँट रहे थे और खुद बड़ा डिब्बा उठाकर मुझे दिया। घर
पहुँचने तक सारे रास्ते जयप्रकाश जी डिब्बे के भार और आकार में संतुलन
बिठाने का प्रयास करते रहे।
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