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मानसरोवर यात्रा
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पवित्र मानसरोवर झीलः आज यहाँ मानस के किनारे डेरा डाले हैं। शिविर में बिजली नहीं है। जेनरेटर खराब है अतः मोमबत्तियाँ जला लेते हैं। मोमबत्ती की रोशनी में ही लेखन कार्य सम्पन्न होता है। यहाँ पर फोन आदि की कोई सुविधा नहीं है। मानस के चारों ओर समतल या कम ऊँचे पठार तथा पहाड़ियाँ हैं जो वनस्पतिविहीन हैं। कई पहाड़ियों की चोटियों पर बर्फ जमी है तथा कई ग्लेशियर दिखलाई पड़ रहे ह। कई पर्वतों की ढलानों से बहकर आता हुआ पानी मानस के जल में अभिवृद्ध कर रहा है। ऐसे कई जल-स्रोत हमारे आज के मार्ग में भी आए थे जो काफी जलराशि मानसरोवर को प्रदान कर रहे थे। बाबा नागार्जुन याद आते हैं और याद आती है उनकी कविता “बादल को घिरते देखा है”। अमल धवल गिरि के शिखरों पर यहाँ मानस में उगने वाले स्वर्ण कमल तथा दूसरे कमलों को ढूँढ रहा हूँ मैं। साथ ही ढूँढ रहा हूँ मानस के राजहंसों को तथा यहाँ के किन्नर-किन्नरियों के कानों में लटकते कुवलयों को जो मुझे कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होते। लेकिन मायूस नहीं हूँ क्योंकि यात्रा अभी शेष है। यात्रा का कभी अंत नहीं होता। उम्मीद का भी अंत नहीं होना चाहिये। कोई न कोई समाधान मिल ही जाएगा। मानस परिक्रमा अभी शेष है। यहाँ मानस में कुछ जल पक्षी हैं लेकिन कम संख्या में। कुछ पक्षी उड़ते नज़र आते हैं लेकिन बाबा के कस्तूरी मृग का कहीं अता-पता नहीं है। मानस के पास की बंजर भूमि में यह संभव भी नहीं लगता। दस-बारह ह्ज़ार फुट की ऊँचाई तक जहाँ तक जंगल हैं वहाँ तक ही इन कस्तूरी मृगों का अस्तित्व है इससे ऊपर नहीं। नागार्जुन कालिदास से मेघदूत के बारे में पूछते हैं और साथ ही कहते हैं “जाने दो वह कवि कल्पित था”, मैं भी परंपरा का निर्वाह कर यही कहता हूँ कि “जाने दो, यह कवि कल्पित है”। संभव है कवि ने जो कोलाज निर्मित किया है वह दो दृश्यों को जोड़कर बनाया हो। मानस के किनारे पर स्थित ठूगू शिविर तथा ठूगू शिविर से मानस के उस पार दूर स्थित कैलाश पर्वत के विविध रूप दोपहर से ही देखने को मिल रहे हैं कभी बर्फ सा चमकता उज्ज्वल रूप, कभी बादलों की परछाई से युक्त राख जैसा नीला-स्लेटी रूप तो कभी पूर्ण रूप से मेघाच्छादित। शिविर के नीचे सामने दूर तक फैला विस्तृत मानसरोवर और मानसरोवर के पार दृष्यमान हमारी चिर प्रतीक्षित आकांक्षाओं का प्रतीक कैलाश शिखर। कभी योगी-सा भस्माच्छादित तो कभी विरही-सा मेघाच्छादित और कभी युवक-सा तेजोमय स्वर्णाभ। हर क्षण नया रूप। तरल-तरंगित-सा हमारे शरीर की यात्रा की तरह जो लगता तो ठोस है लेकिन है तरंग रूप। ध्यान से देखिए तो सही। सहस्त्र से षडचक्रों की यात्रा करते हुए पैरों की उंगलियों के पोरों तक तरंगें ही तरंगें हैं। कुछ भी ठोस नहीं है, न अस्थियों का ठोसपन न मांस-रक्त का भार। ऊपर से नीचे तक तरंगें ही तरंगें। तरंग रूप शरीर को इसके मूल रूप में जानना, मूल रूप को अनुभव करना ही तो मानस-यात्रा है, कैलाश यात्रा है। इसके अभाव में यात्रा का क्या प्रयोजन हो सकता है? सिर्फ शरीर के बाह्य आवरण को इसकी जड़ता को देखा तो क्या देखा, क्या यात्रा की? सब कुछ पिघलाकर नये साँचे में ढालना, नये रूप में आना अर्थात् रूपांतरण ही वास्तविक यात्रा है। अद्धर्रात्रि के आसपास का समय है। पाँच सितंबर ही है या छः सितंबर शुरू हो गया पता नहीं क्योंकि घड़ी पास नहीं है। खोजता भी नहीं हूँ। घड़ी पास नहीं है तो अच्छा ही है। घड़ी तो हमें बाँधती है। घड़ी से चाहे मुक्त न हों समय से मुक्त हो सकें तो ये एक बड़ी यात्रा होगी। समयातीत होना भी यात्रा का उद्देश्य होना चाहिये। पाँच सितंबर यानी ’शिक्षक दिवस‘। मैं यह दिन कैसे भूल सकता हूँ। न जाने कितने शिक्षकों का मैं ऋणी हूँ। जीवन के इस पड़ाव तक पहुँचाने में जिन-जिन शिक्षकों का ोगदान रहा है मैं उन सभी के प्रति कृतज्ञता तथा हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ। मैं जिनके साथ शिक्षक के रूप में जुडा हूँ उन सबके उज्ज्वल भविष्य के लिए मंगल कामनाएँ करता हूँ। पाँच सितंबर को ही मेरे अनुज प्रेम नारायण का जन्मदिन है। मैं उसके परिवार की वर्तमान दशा को लेकर अत्यंत दुखी हूँ। मैं उसे तथा पूरे परिवार को हर प्रकार से सुखी देखना चाहता हूँ। मैं अपनी स्वयं की तथा अपने परिवार की सुख-समृद्ध व स्वास्थ्य के लिए ईश्वर का धन्यवाद करता हूँ। मुझे अपने लिए और कुछ नहीं चाहिये सिर्फ मेहनत और ईमानदारी से जीवनयापन के अतिरिक्त लेकिन यदि इस यात्रा का कोई प्रतिफल, कोई पुण्य मुझे मिलना है तो वह मेरे भाई प्रेम तथा उसके बच्चों को मिल जाए। यही मेरी कामना है यही ईश्वर से बार-बार प्रार्थना है। मैं दैवी शक्तियों से तर्क-वितर्क करना नहीं चाहता। मैंने अच्छी इच्छा व्यक्त कर दी है और अब और ज़्यादा नहीं लिख पा रहा हूँ। मोमबत्ती भी समाप्त होने को है। सब यात्री गहरी नींद में सोए पड़े हैं। अब मुझे भी सोना चाहिए। छः सितंबर को सुबह जल्दी उठने का कार्यक्रम नहीं था क्योंकि आज पूरे दिन यहीं रहना है। प्रातः उठने पर खिड़की के उस पार नज़र जाती है। सामने पहाड़ियों पर घने बादल हैं। कल जहाँ तक बर्फ की तह जमी थी उससे और नीचे तक बर्फ दिखलाई पड़ रही है। बाहर आकर मानसरोवर का दृष्य देखता हूँ। पल-पल परिवर्तनशील है मानसरोवर व्यक्ति के मानस की तरह। मानसरोवर के पार पहाड़ियाँ घने बादलों से आच्छादित हैं। मानसरोवर विशाल जलध के सदृश प्रतीत होता है लेकिन कहाँ जलध की उत्ताल तरंगें मनुष्य-मन को भीतर तक उद्वेलित करतीं-सी और कहाँ मानसरोवर की मंद-मंद मृदु लहरें मानव-मन को शांत-स्थिर कर सहलातीं-सी, इसे दैवी ऊर्जा से परिपूरित करतीं-सी। सूर्य की किरणें मानसरोवर की विशाल जलराशि को इंद्रधनुषी आभा प्रदान कर रही हैं। दूसरे छोर पर क्षितिज की ओर इंद्रधनुषी वर्ण के स्तंभ मानस के किनारों से ऊपर की ओर उठ कर अलौकिक आभा बिखेर रहे हैं। धूप खिलने के साथ-साथ मानस के चारों ओर की पहाड़ियाँ और इन पर मँडराते घने बादल स्पष्ट रूप से दिखलाई पड़ रहे हैं। कल तक सामने की जो पहाड़ियाँ बर्फ से विहीन थीं आज हिमाच्छादित हो चुकी हैं। कैलाश शिखर भी घने बादल के कारण नज़रों से ओझल है। सिर्फ़ नज़रों से ओझल मन से नहीं। छुपना, प्रकट होना, फिर छुपना, फिर प्रकट होना यही तो उसकी माया है। इसी माया को समझना हमारी यात्रा है। जो है भी और नहीं भी है उसी को खोजना या उसके वास्तविक स्वरूप को समझना यही तो मानस-यात्रा है। मानस-यात्रा नहीं की तो झील के चारों ओर चक्कर लगाने का कोई औचित्य नहीं। आज ठूगू शिविर के पास से स्थानीय यात्रियों के कई झुंड गुज़रे हैं। सभी यहाँ स्थित मोनेस्ट्री में भी गए। पूरे लाव-लश्कर के साथ अर्थात् अपने पूरे परिवार, घोड़ों, याक और कुत्तों के साथ गुज़रने वाले ये काफ़िले कैलाश और मानसरोवर परिक्रमा के लिए आसपास के क्षेत्रों से ही आए हैं। यहाँ के कुत्ते मैदानी भागों के कुत्तों जैसे ही हैं लेकिन इनके पूरे शरीर और टाँगों पर घने बाल हैं। ये कुछ सुस्त-से प्रतीत होते हैं। भौंकते भी कम हैं। रात को जब ये एक साथ मिलकर भौंकते हैं तो जंगली कुत्तों के भौंकने का सा आभास होता है। यहाँ के स्थानीय लोग काफी रंग-बिरंगे तथा विचित्र वस्त्राभूषण धारण किये हुए हैं। पुरुषों तथा स्त्रियों दोनों के गलों में मोटे-मोटे मणियों की मालाएँ हैं जिन्हें बाबा नागार्जुन ने अपनी कविता में इंद्रनील कहा है : इन्द्रनील की माला डाले, मोतियों की मालाएँ भी पहन रखी हैं। पुरुष भी महिलाओं जैसे लंबे बाल रखते हैं तथा आकर्षक वेणी गूँथते हैं। उसमें कई बार तो गज भर से भी लंबी चोटी बाँधते हैं और उसे सलीके से लपेट लेते हैं। लेकिन किसी भी वेणी में शतदल लाल कमल दिखलाई नहीं पड़ा। मानस के जल में न तो स्वर्ण कमल दिखलाई पड़े और न ही शतदल लाल कमल। इतनी ऊँचाई पर और इतनी विषम जलवायु में जहाँ साल के कई महीनों तक सरोवर जमकर बर्फ़ में परिवर्तित हो जाता है कमल पुष्प का उगना संभव नहीं लगता। एक टीवी चैनल पर मानसरोवर विषयक डॉक्यूमेंटरी फिल्म चल रही थी। उद्घोषक ने बतलाया कि यहाँ मानस मे ब्रह्मकमल खिलते हैं। कितनी भ्रांति है लोगों को। ब्रह्मकमल जल में नहीं अपितु थल पर खिलते हैं। उत्तरांचल के पर्वतीय क्षेत्रों में एक विशेष ऊँचाई वाले क्षेत्र में ही खिलते हैं ब्रह्मकमल। यहाँ के लोगों का चलने का ढंग भी विचित्र है। ऐसे झटका खाकर चलते हैं मानो भारी बोझ से लदे हों और संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे हों अथवा पैर में चोट के कारण लँगड़ा कर चल रहे हों। खाली हाथ भी ऐसे ही चलते हैं। जैसे हमारे यहाँ मंडियों में या नया बाजार (दिल्ली) में कुछ सेठ लोग एक हाथ में अपनी धोती का एक छोर पकड़ कर झटका खाकर झूमते हुए से चलते हैं। लगता है जीवन रूपी कठिनाई या विषम परिस्थितियों का मानसिक बोझ भौतिक शरीर पर वहन करने का प्रयास कर रहे हो। फोटो इत्यादि खिंचवाने का शौक नहीं लगता क्योंकि कैमरे का मुँह इनकी ओर करने पर भाग खड़े होते हैं। किसी बुज़ुर्ग के समझाने पर महिलाएँ और बच्चे रूक कर फोटो खींच लेने देते हैं और काम पूरा होने पर फ़ौरन भाग जाते हैं। शर्मीले और किंचित शंकालु स्वभाव के लगते हैं। बादल की लुका-छिपी का खेल बदस्तूर जारी है। कहीं धूप है तो कहीं छाया। मानस के जल पर, मानस की निकटवर्ती पर्वत- शृंखलाओं पर! यहाँ शिविर में और शिविर के ऊपर की पहाड़ी और पूरे पठारी प्रदेश में बादलों की परछाई से निर्मित छाया और धूप का खेल पूरे दिन चलता रहता है। एक व्यक्ति के हाथ में प्रार्थना-चक्र है। बुज़ुर्ग-सा व्यक्ति है। प्रार्थना-चक्र का वही प्रयोजन है जो हमारे यहाँ १०८ मनकों की माला का। हमारे यहाँ भी प्रायः बुज़ुर्ग व्यक्ति पूजा-पाठ या नाम-जाप के समय प्रायः माला फेरते हैं। प्रर्थना-चक्र झुनझुने की आकृति का बेलनाकार यंत्र होता है जो हाथ में पकड़ी हुई डंडी के ऊपरी हिस्से पर जुड़ी धुरी के चारों ओर घूम सकता है। इसके अंदर कागज़ की पूरी लंबाई पर एक मंत्र को कई बार लिखकर डाल देते हैं। इसको एक बार घुमाने का अर्थ है जितनी बार मंत्र काग्ज़ पर लिखा है उतनी ही बार मंत्र दोहरा दिया गया है। मैं प्रार्थना-चक्र उस व्यक्ति के हाथ से अपने हाथ में लेकर घुमाता हूँ और साथ ही मंत्र “ओम् मणि पद्मे हुम” भी दोहराता हूँ। वह व्यक्ति कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता सिर्फ मेरे द्वारा प्रार्थना-चक्र घुमाए जाने की प्रक्रिया को देखता है। ’ओम् मणि पद्मे हुम‘ यह अवलोकितेश्वर मंत्र कहलाता है जो संस्कृत में है। इसका तिब्बती रूप चेंरेज़िग मंत्र कहलाता है जिसका उच्चारण है “ओम् माने पेमे हुंग”। मैं मंत्र का तिब्बती रूप दोहराता हूँ तो भी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। एक बौद्ध प्रार्थना या मंत्र है “नम म्योहो रेंगे क्यो”। मैं चक्र घुमाता हूँ और यह प्रार्थना कई बार दोहराता हूँ लेकिन इस बार भी उस पर कोई असर नहीं होता। मैं उसका प्रार्थना-चक्र लौटाता हूँ और झुककर उसके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना चाहता हूँ लेकिन सब निरर्थक। एक साझी भाषा के अभाव में किसी भी प्रकार का संवाद स्थापित नहीं हो पाता। लगता है तिब्बती के भी अनेक रूप, अनेक बोलियाँ और उपबोलियाँ प्रचलित हैं। शिक्षा के अभाव में एक दूसरे की बोली, भाषा, धर्म और संस्कृति से पूर्ण रूप से अपरिचित हैं। प्रार्थना अथवा मंत्रादि के उच्चारण में भी काफी विभिन्नता होगी। यहाँ की मोनेस्ट्रीज़ में भी गलियारों में ऐसे ही बड़े-बड़े प्रार्थना चक्र लगे होते हैं जिनको आने-जाने वाले श्रद्धालु घुमाते हुए निकलते हैं। यहाँ कमरों में पारदर्शी काँच की खिड़कियाँ लगी हैं। ये खिड़कियाँ दीवार के अंदर और बाहर दोनों तरफ लगी हुई हैं। अंदर वाली खिड़की अंदर की तरफ तथा बाहर वाली खिड़की बाहर की तरफ खुलती है। बीच में खाली स्थान है जिसमें भरी हवा सर्दी में बाहर की तेज़ सर्दी को अंदर आने से रोक देती है। ये खिड़कियाँ कम ही खुलती हैं लेकिन बाहर से रोशनी अंदर आने देती हैं और साथ ही इंसुलेशन का काम भी करती हैं। दीवारें संभवतः ईंटों या पत्थरों की बनी हैं छत लकड़ी और टहनियों की। पता नहीं यहाँ बर्फ गिरती है या नहीं क्योंकि छतें ढलवाँ नहीं हैं। यहाँ ठूगू में दो रात का पड़ाव है। यहाँ आसपास कुछ नहीं है सिवाय एक मोनेस्ट्री और इस होटलनुमा शिविर के। सुबह से शाम तक कोई काम नहीं। नहाने-धोने की कोई व्यवस्था नहीं। न कहीं कोई नल लगा है न कोई पानी की टंकी आदि। वाशबेसिन का तो प्रश्न ही नहीं उठता। कुछ खाने-पीने को ही नहीं है तो नहाने-धोने की बात तो बेमानी ही है। हर आवश्यकता की पूर्ति के लिए सामने मानस है अथवा पहाड़ से मानस की ओर आती हुई जल-वाहिकाएँ। यहाँ के लोग तो संभवतः नहाते ही नहीं है और मानस यात्रियों के लिए सामने मानसरोवर है न। मानस को पवित्र बनाए रखने का प्रयास यहाँ के लोग नहीं करते। यात्री भी स्नान तथा पूजा-पाठ एवं हवन के बाद काफी गंदगी मानस के किनारे छोड़ आते हैं। मानस के किनारे जहाँ भी मोनेस्ट्री अथवा शिविर हैं वहीं किनारों पर प्लास्टिक की थैलियाँ, रैपर, प्लास्टिक की बोतलें तथा काँच की बोतलें बिखरी पडी हैं। पशुओं की हड्डियाँ और सींग भी खूब फैले हैं। किसी भी प्रकार की सपफाई का तो प्रश्न ही नहीं उठता। कूडा-कचरा बढ़ते-बढ़ते कितना हो सकता है इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं क्योंकि यात्रियों की संख्या में निरंतर वृद्ध ही हो रही है। यहाँ की मानेस्ट्रीज़ पर प्रायः चीन सरकार का नियंत्रण है। धार्मिक दृष्टि से लामाओं को शाकाहारी भोजन ही लेना होता है लेकिन विषय परिस्थितियों के कारण उन्हें अल्प मात्र म मांसाहार की भी छूट है। कुछ विशेष दिन और अवसर ऐसे भी हैं जब वे मांसाहार बिल्कुल नहीं कर सकते। बाकी लोग पूरी तरह मांसाहारी हैं। सब्ज़ियाँ तो कहीं-कहीं दिख जाती हैं शायद और कहीं से आती हों लेकिन फल बिल्कुल दिखलाई नहीं पड़ते। जब से चीन के इस तिब्बत क्षेत्र में घुसे हैं पेड़ नाम की कोई चीज़ नहीं देखी। जिधर देखो नंगे पठार और बर्फ़ीले पहाड़। तिब्बत में दूर-दूर से तीर्थ यात्री कैलाश ओर मानसरोवर की परिक्रमा के लिए आते हैं जो पूरे दल-बल के साथ टैंटों में पड़ाव डालते हैं। विदेशी यात्री प्रायः नेपाल के रास्ते आते हैं और पड़ाव के स्थान पर टैंट ही लगाते हैं। ये छोटे-छोटे ग्रुपों में होते हैं। तीन-चार यात्री और तीन चार व्यक्ति टूअर ऑपरेटर के होते हैं जो सारी व्यवस्था करते चलते हैं। नेपाल के रास्ते आने वाले ये यात्री लैंडरोवर गाड़ियों में आते हैं और इससे सारा ज़रूरी सामान साथ ला पाना भी संभव होता है। कल पाँच सितंबर को सभी यात्रियों ने यहाँ मानस में
स्नान किया और पूजा-पाठ की। दिल्ली से चलते समय कुछ लोगों ने कहा था कि
मानस में खूब डुबकी लगाना। पानी बेशक ठंडा है लेकिन कुछ नहीं होगा।
परिवार के सभी सदस्यों के नाम की एक-एक डुबकी अवश्य लगाना। ये मौका
बार-बार नहीं मिलता अतः खूब डुबकी लगाना। मैंने भी कई डुबकियाँ लगाईं।
बर्फ सा ठंडा पानी। बाहर तेज़ ठंडी हवा। बाहर निकलने के बाद फटाफट शरीर
सुखाकर कपड़े पहने पर अत्यंत ठंडे पानी में स्नान करने के कारण सिर
भाँय-भाँय करने लगा। सिर पर टोपी, मफलर और चद्दर लपेट कर कई घंटे
बिस्तर पर रज़ाई ओढ़े पड़ा रहा तब जाकर थोड़ा आराम मिला। न चाय न पानी न
ढंग का भोजन। कच्ची पक्की खिचड़ी या एक-आध जली-भुनी रोटी। कभी किसी
बेज़ायका सब्जी से तो कभी अचार से। यहाँ भूख ही नहीं लगती नहीं तो क्या
हाल होता? ऐसी विषम परिस्थितियों में किसी भी प्रकार का दुस्साहस ठीक
नहीं। ठूगू में दो दिन का पड़ाव बहुत अखरता है। मानस परिक्रमा बस द्वारा सम्पन्न की जाती है। कुछ वर्ष पहले यह पैदल सम्पन्न की जाती थी। तीन दिन का समय पर्याप्त होता है। दो दिन और दो रात एक जगह जड़ होकर बैठने से तो अच्छा है लगातार पैदल चल कर यात्रा पूरी करें। यह बहुत मुश्किल भी नहीं है। चलते रहना ही तो जीवन है रुकना मृत्यु। अतः चलते रहो। थक जाओ तो विश्राम करो और पुनः आगे की यात्रा पर प्रस्थान यही सही जीवन-क्रम है। मानस परिक्रमा का अंतिम चरणः छः सितंबर की रात्रि ठूगू शिविर में व्यतीत करने के बाद अगले दिन प्रातःकाल चिहु के लिए प्रस्थान करते हैं। यह मानस परिक्रमा का अंतिम चरण है और बस द्वारा मुश्किल से आध-पौना घंटे की यात्रा। दूरी केवल दस-पन्द्रह किलोमीटर। थोड़ी दूर चलने के बाद बस रास्ते में एक मोनेस्ट्री के पास रुकती है। मोनेस्ट्री मानस के किनारे एक ऊँचे से टीले पर स्थित है। यहाँ मानस का किनारा कुछ पथरीला-सा है और किनारों पर ढेर छोटे-छोटे पत्थर भी बिखरे हैं। किनारे पर मिट्टी न होने के कारण पानी बिल्कुल साफ है। सभी यात्रियों ने अपने-अपने जलपात्रों में मानस का पवित्र जल भरा जो हमने तकलाकोट से खरीदे थे। यहाँ विभिन्न आकृतियों के पत्थर मिल जाते हैं। यात्री शिवलिंग के आकार के पत्थरों को ढूँढने में व्यस्त हो गये। साथ गए पोर्टर्स, कुक तथा बस के ड्राइवर ने भी पत्थर जमा करने में यात्रियों की मदद की। कई यात्रियों ने मानस की मिट्टी भी साथ ली। मानस का पवित्र जल और अन्य वस्तुएँ लेकर बस मैं बैठ गए। सबके जूते गीले हो चुके थे और मिट्टी लगी हुई थी। पूरी बस में कीचड़ ही कीचड़ हो गई लेकिन इस कीचड़ में गंदगी नहीं थी। मानस का पवित्र जल और मानस के किनारों की मिट्टी ही तो थी। मानस के जल से भरे हुए पात्र सहेज कर रख दिये गये और बस पुनः रवाना हुई। कुछ मिनटों के सफ़र के बाद हम पुनः चिहु में थे जहाँ से परिक्रमा का प्रारंभ हुआ था। परिक्रमा पूर्ण हो चुकी थी तथा मानस का जल भी मिल गया था लेकिन यात्रा कभी पूर्ण नहीं होती। एक लक्ष्य को पाने के बाद दूसरे लक्ष्य की प्राप्ति की ओर अग्रसर होने में ही मानव जीवन की सार्थकता है। चिहु पहुँचकर सबने अपने-अपने मानस जल के पात्र यहाँ एक कमरे में रख दिये क्योंकि कैलाश परिक्रमा के बाद पुनः चिहु होकर ही तो जाना है। वापसी पर अपने-अपने पात्र साथ ले लेंगे। सात सितंबर की रात पुनः चिहु में गुज़ारने के बाद आठ सितंबर को प्रातः दारचेन के लिए प्रस्थान किया। चिहु से दारचेन की दूरी लगभग चालीस किलोमीटर है। दारचेन कैलाश परिक्रमा का पहला पड़ाव है अर्थात् दारचेन से कैलाश परिक्रमा का प्रारंभ होता है। जब हम दारचेन पहुँचे वहाँ हमारे बैच का पहला ग्रुप जो कैलाश परिक्रमा कर चुका था मिला। अनुभव का आदान-प्रदान हुआ। उनके कैलाश परिक्रमा के अनुभव सुने तथा उन्हें मानस परिक्रमा की जानकारी दी। जिस बस में हम दारचेन आए हैं उसी बस से ये चिहु पहुँचकर अगले दिन मानस परिक्रमा प्रारंभ करेंगे। बिल्कुल हमारी तरह। हम कल सुबह कैलाश परिक्रमा प्रारंभ करेंगे। कैलाश परिक्रमा सम्पन्न करने के बाद हम फिर वापस चिहु पहुँचेंगे जहाँ से सभी साथ मिलकर तकलाकोट और तकलाकोट से स्वदेश वापसी की यात्रा प्रारंभ करेंगे। आप क्या समझते है कि इस स्वदेश वापसी के बाद यात्रा का अंत हो जाएगा। यात्रा का अंत नहीं होता। न मानस-परिक्रमा से यात्रा का अंत हुआ है न कैलाश-परिक्रमा के बाद यात्रा का अंत होगा और न ही स्वदेश वापसी के बाद घर पहुँचने पर यात्रा का अंत होगा। ये जीवन ही यात्रा है। जब तक यात्रा होती रहेगी जीवन भी चलता रहेगा। जीवन चलता रहे इसलिए कभी मत रुको। चलते रहो, चलते रहो। चरैवेति, चरैवेति। |