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मानसरोवर यात्रा
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पवित्र मानसरोवर झीलः 'मानसरोवर' हिमालय के उत्तर में ४५०० मीटर की ऊँचाई पर स्थित एक विश्वप्रसिद्ध झील है। वर्तमान में यह झील चीन राष्ट्र के तिब्बत क्षेत्र में अवस्थित है। तिब्बती भाषा में इसे त्सो माफ़ाम या त्सो मावांग कहा जाता है। मानसरोवर झील की परिधि लगभग अट्ठासी किलोमीटर तथा इसका क्षेत्रफल तीन सौ पचास वर्ग किलोमीटर के लगभग है। इसकी अधिकतम गहराई तीन सौ फुट तक है। मानसरोवर झील की उत्पत्ति के विषय में प्रसिद्ध है कि ब्रह्माजी ने अपनी इच्छा मात्र से इसका निर्माण किया था। ब्रह्माजी के मानस (मन) की शक्ति द्वारा अस्तित्व म आने के कारण ही इसका नाम ’मानस-सरोवर' पड़ा जो बाद में मानसरोवर हो गया। मानसरोवर झील का संबंध ब्रह्माजी से जुड़ने के कारण ही इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। मानसरोवर के इसी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व के कारण ही प्रत्येक हिंदू की ये इच्छा होती है कि वह कैलाश पर्वत तथा मानसरोवर झील की परिक्रमा कर एक बार इस पवित्र सरोवर में डुबकी अवश्य लगाए। कुछ लेागों का अनुमान है कि यहाँ पर अन्य तीर्थ स्थानों की तरह घाट और मंदिर तथा पूजा-पाठ और अन्य अनुष्ठान करवाने के लिए पंडे-पुजारी भी अवश्य होंगे लेकिन इस पूरे क्षेत्र में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। न ही स्नानादि के लिए कोई घाट आदि है और न ही किसी मंदिर या हिंदू पूजास्थल का अस्तित्व है। यह पूरा क्षेत्र सिद्ध क्षेत्र माना जाता है अतः यहाँ की यात्रा या परिक्रमा ही महत्वपूर्ण है। साथ ही इस क्षेत्र की विशेषता है कि आप यहाँ जो भी सोचते हैं अथवा इच्छा करते हैं वह पूरी हो जाती है फिर भी यात्री अपने-अपने तरीके से पूजा-पाठ अवश्य करते हैं। मन के मानने की बात है। वस्तुतः मानस-यात्रा मानसरोवर यात्रा के रूप में व्यक्ति के मन की यात्रा है। यदि व्यक्ति अपने मन की यात्रा द्वारा अपने मन की शक्ति का उपयोग करना सीख ले तो ब्रह्माजी के मानस की शक्ति की तरह अपने मानस की शक्ति या इच्छा मात्र से भौतिक जगत की किसी भी वस्तु का सृजन कर सकता है। मानस-यात्रा प्रतीक है आध्यात्मिक उन्नति द्वारा भौतिक उपलब्ध का। तिब्बत के लोग भी मानसरोवर की परिक्रमा करते हैं। भारतीय यात्री तो केवल अनुकूल मौसम में ही परिक्रमा के लिए जाते हैं लेकिन तिब्बती तो अत्यंत शीत ऋतु में भी मानस परिक्रमा करते हैं जब यह झील जमकर बर्फ बन जाती है। भारतीय तो मानस में स्नान करना अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं लेकिन तिब्बती लोग इसमें स्नान नहीं करते क्योंकि उनका मानना है कि यह झील मात्र देवताओं के स्नान के लिए है। वे इसका पानी अवश्य पीते हैं। वहाँ यह भी मान्यता है कि देवताओं ने रानी मायादेवी को यहाँ के पवित्र जल में स्नान करवाया था ताकि वे भगवान बुद्ध को जन्म दे सकें। मानसरोवर से जुड़ी हर गाथा विश्वास और दिव्यता से अनुप्राणित है। तकलाकोट से चिहु तक का सफरः चार सितंबर (वर्ष २००३) को प्रातःकाल बस द्वारा पवित्र मानसरोवर झील के लिए प्रस्थान किया। तकलाकोट से मानसरोवर या कैलाश पर्वत तक पहुँचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। ऊँचे-नीचे पठारों में बस रास्ते बने हुए हैं। बस ठसाठस भरी हुई थी क्योंकि उसमें कैलाश-मानसरोवर यात्रियों के अलावा उनके पोर्टर, कुक, दो गाइड तथा स्थानीय मजदूर भी सफ़र कर रहे थे। स्थानीय यात्री लगभग एक घंटे की यात्रा के पश्चात उतर गए और बस आगे बढ़ी। थोड़ा आगे चलने पर सामने नीलवर्णी विशाल जलराशि दिखलाई पड़ रही थी। दूरी कुछ कम हुई और बस इसके किनारे-किनारे चलने लगी। हमारे बाएँ हाथ की तरफ ये विशाल जलराशि मानसरोवर नहीं अपितु राक्षस ताल है।
राक्षस तालः यह वही ताल है जिसके किनारे पर कभी रावण ने घोर तपस्या की थी और शिव को प्रसन्न कर अनेक वरदान प्राप्त किये थे। नैनीताल के नौकुचिया ताल की तरह कई दिशाओं में इसका विस्तार दृष्टिगोचर होता है लेकिन हमारे सामने विपरीत छोर पर यह कहाँ समाप्त होता है इसका आभास नहीं होता। कोई जानना भी नहीं चाहता राक्षस ताल के विस्तार के बारे में। न कोई जल को छूता है। वैसे भी इसमें स्नानादि की मनाही है तथा यहाँ पूजा-पाठ का भी कोई विधान नहीं है। जहाँ तक इसके जल का प्रश्न है मानसरोवर झील से बहकर आता हुआ जल भी इसमें लगातार मिलता रहता है तथा साथ ही उत्तर दिशा में स्थित कैलाश पर्वत से निकलने वाले असंख्य जल-स्रोतों का जल भी बहता हुआ अंततः राक्षस ताल के जल से जा मिलता है। हमारे ठीक सामने राक्षस ताल की पश्चिमी सीमा से सटे हैं खूबसूरत स्लेटी-भूरे रंग के ऊँचे-नीचे मेघाच्छादित पर्वत। ताल के मध्य भाग में कहीं एक पर्वत द्वीपनुमा स्थिति में अवस्थित है। सामने से तो ऐसा ही लगता है। हो सकता है पर्वत का एक भाग ताल में घुस आया हो अथवा ये भी संभव है कि इस द्वीपनुमा पर्वतीय भूभाग को राक्षस ताल का जल चारों ओर से घेरे हो। एक जगह ये भी पढ़ा था कि इसमें दो द्वीप स्थित हैं जो वनस्पतिविहीन चट्टानों द्वारा निर्मित हैं। यहाँ स्नान का निषेध है फोटोग्राफी का नहीं। सभी लोग फोटोगाफी में जुटे हैं। कई यात्री वीडियोग्राफी भी कर रहे हैं विशेष रूप से हमारे बैच के लायजन आफिसर (संपर्क-अधिकारी) उदयन अरुमुगम। उदयन अरुमुगम इस्टर्न फोरेस्ट रेंजर्स कॉलिज में प्रिंसिपल हैं। हमारे बाईं तरफ राक्षस ताल है तो दाईं तरफ स्थित हैं रूपहली पर्वतश्रेणियाँ जो बर्फ से आच्छादित है। लगता है अभी-अभी चाँदी को पिघला कर बनाई गई हैं ये गीली-गीली सी पर्वत श्रेणियाँ। चार ओर निर्जनता ही निर्जनता। न कोई व्यक्ति, न पशु-पक्षी और न वनस्पतियाँ ही। न कोई हमें पार कर आगे निकलने की कोशिश कर रहा है और न ही कोई विपरीत दिशा से ही आ रहा है। निर्जनता के साथ-साथ नीरवता का साम्राज्य पसरा पड़ा है चारों ओर। सब कुछ शांत स्थिर-सा। एक बार टीवी पर मुरारी बापू रामकथा पर बोल रहे थे और कैप्शन चल रहा था “राक्षस ताल से रामकथा का प्रसारण”। मुझे हैरानी है कि कई दिनों तक चलने वाली इस रामकथा में यहाँ १४९०० फुट की ऊँचाई पर श्रोता कहाँ से आए? यदि वे कैलाश-मानसरोवर यात्री थे तो इतने दिनों तक यहाँ कहाँ और कैसे रुके? मेरी ये जिज्ञासा अभी भी बनी हुई है। राक्षस ताल के आसपास के दृश्यों का अवलोकन तथा फोटोग्राफी वगैरा पूरी करके सभी यात्री बस में आ बैठे। वैसे भी यहाँ की विषम जलवायु में अधिक देर तक प्रकृति का आनंद नहीं लिया जा सकता। बस आगे चलती है। झील समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। विशाल जलध के सदृश इस झील के किनारे-किनारे हम जा रहे हैं। कच्चे रास्ते पर बस तेज़ी से दौड़ रही है। सामने दृष्टिगोचर होता है पवित्र कैलाश- शृंग। धवल रजताभ, श्वेत हिममंडित, उज्ज्वल कैलाश पर्वत। हमारा पहला कार्यक्रम मानसरोवर परिक्रमा का है अतः सीधे कैलाश की ओर न जाकर दाएँ चिहु की ओर मुड़ जाते हैं। चिहु शिविर में : मानसरोवर परिक्रमा के लिए चिहु पहला पड़ाव है। यहाँ से अगले दिन सुबह मानसयात्रा या परिक्रमा शुरू करनी है। चिहु शिविर में डेरा डालते हैं। यहाँ कैलाश-मानसरोवर यात्रा के आठवें बैच के यात्रियों से मुलाकात होती है। हमारा बैच दसवाँ है। अनुभवों का आदान-प्रदान होता है। दोनों ही बैच के यात्रियों में गुजरात के यात्री अधिक हैं अतः गुजराती भाषा का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। परदेस में मातृभाषा के माध्यम से जुड़ जाते हैं। देश के अंदर भी हिंदी और भारतीय भाषाओं के माध्यम से जुड़े रहें तो हमारी अपनी संस्कृति भी अक्षुण्ण बनी रह सकती है। अंग्रेज़ी जहाँ बाह्य विकास के लिए ज़रूरी है वहीं हिन्दी और भारतीय भाषाएँ आंतरिक विकास के लिए अनिवार्य हैं। चिहु शिविर मानसरोवर के तट पर बना है। सभी कमरे पक्के और एक सीध में बने हैं। कमरे ठहरने लायक हैं। बिस्तर वगैरा भी ठीक हैं। हरेक कमरे में कुछ कुर्सियाँ भी रखी हैं। जिस प्रकार हमारे यहाँ छतों को नीचे कपड़े से ढाँपते हैं यहाँ भी छतों को ढाँप रखा है और उन पर मंडल निर्मित हैं। मंडल तिब्बती कला का एक नमूना है। इन सभी कमरों का निर्माण भारतीयों द्वारा करवाया गया है। कमरों के बाहर दीवारों पर बनवाने वालों के नाम के पत्थर लगे हैं। यहाँ भोजन की व्यवस्था स्वयं करनी है। खाना पकाने के लिए अपेक्षित सामग्री दिल्ली से ही साथ लेकर चले थे। आज पहली बार हमारे साथ आए हुए कुक खाना बनाएँगे। पता चला कि स्टोव नहीं जल रहा है। ये स्टोव चीनी अधिकारियों द्वारा तकलाकोट में उपलब्ध कराया गया था। वैसे भी इसकी लौ ऊपर की बजाय बराबर में एक तरफ सामने जा रही है। जैसे बर्नर हमारे यहाँ स्वर्णाभूषण बनाने वाले कारीगर रखते हैं वैसा ही कुछ बड़ा-सा बर्नर है। देखते हैं क्या होता है? वैसे यहाँ इतनी ऊँचाई पर और विषम जलवायु क्षेत्र में आकर भूख बहुत कम हो गई है। थोड़ा-बहुत जो साथ है उसी से काम चल रहा है। बिना पर्याप्त भोजन के भी सभी पूर्ण रूप से स्वस्थ हैं ये क्या कम है? मैं अपने कमरे में बैठा हूँ। सभी कमरों के दरवाज़ों के ठीक सामने कुछ दूरी पर फैली है पवित्र मानसरोवर की विशाल जलराशि। वैसे तो यहाँ पहुँचते ही बस से उतर कर सबसे पहले पवित्र सरोवर को प्रणाम कर उसकी विशाल जलराशि में से कुछ बूँदें लेकर अपने ऊपर छिड़क ली थीं। मानसरोवर जिसके दर्शन दुर्लभ हैं आज मेरे सामने उपस्थित है। नहीं, नहीं, मैं ये क्या कह रहा हूँ? मानसरोवर मेरे सामने उपस्थित नहीं है अपितु मैं मानसरोवर के सामने उपस्थित हूँ। नतमस्तक हूँ। इसके अपूर्व सौंदर्य को निहारने के लिए! इसकी अद्भुत जलराशि में एक बार निमग्न होने के लिए तथा इसके मानस स्वरूप से एकाकार होने के लिए उत्कंठित हूँ। पता नहीं अपने प्रयास में कहाँ तक सफल हो पाऊँगा? मैं मानसरोवर से विनती करता हूँ कि अपने सान्निध्य में, अपने साहचर्य में मुझे स्वयं को जानने का अवसर प्रदान करे। कहाँ है मेरी विनती सुनने वाला मानसरोवर? सामने अथाह जलराशि पुंज रूप या मेरे अंदर का प्रसुप्त अथवा अचेतन या अवचेतन मानस रूप? किसी भी माध्यम द्वारा स्वयं को विनती सुनने लायक बनाना ही मानस यात्रा है। मानसरोवर की कुछ तस्वीरें ली हैं लेकिन क्या तस्वीरों में मानस का आध्यात्मिक स्वरूप स्पष्ट हो पाएगा? तस्वीर या चित्र तो भौतिक स्वरूप, बाह्य रूपाकृति का परिचायक है वो भी एकतरफ़ा स्वरूप का। मुझे मानस का बाह्य भौगोलिक स्वरूप नहीं जानना अपितु मानस का अंतर देखना है! उसका आध्यात्मिक स्वरूप देखना है, जानना है तथा अनुभव करना है। उससे एकाकार होना है। मेरा प्रयोजन सरोवर की परिक्रमा नहीं अपितु मानस में डुबकी लगाना है। मानसरोवर का विस्तार कितना है यह दूर से देखने पर त नहीं चलता। मानस का घेरा ८८ किलोमीटर का है लेकिन बस द्वारा परिक्रमा करने में ११० किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है और इसके लिए मिलते हैं पूरे तीन दिन। पूरी परिक्रमा एक दिन में ही हो सकती है लेकिन कार्यक्रम ऐसा है कि बीच में दो दिन का पड़ाव ठूगू में होता है। तीसरे दिन घंटे भर से भी कम की यात्रा करके वापस चिहु आ जाते हैं। यहाँ अभी चिहु में ही तो हैं। कमरे में बिस्तर से भी झील का दृश्य अति मनोरम प्रतीत होता है। झील के तीनों ओर ऊँची-नीची पहाड़ियाँ और पहाड़ियों के ऊपर दूर-दूर तक बादल। दक्षिण की ओर की पहाड़ियाँ बर्फ से ढकी हैं और चाँदी-सी चमक रही हैं। झील और पहाड़ियाँ पल-पल रंग बदल रही हैं। बादलों की लुका-छिपी और उनकी परछाई के कारण पहाड़ियाँ कभी स्लेटी, भूरे और कत्थई रंग की नज़र आती हैं तो कभी कृष्णाभ स्लेटी-स्लेटी से रंग की। झील का पानी कभी चाँदी-सा चमकीला तो कभी नीला, कभी हरा! कभी हल्का तो कभी गहरा नज़र आता है। कहते हैं कि मानस के जल का आंतरिक स्वरूप भी क्षण-प्रति-क्षण परिवर्तित होता रहता है। कभी सामान्य शांत-शीतल तो कभी बर्फ से भी ठंडा। गरम होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। साल के कई महीनों में तो जमा ही रहता है मानस का जल। यहाँ चिहु में मानस के किनारे उथले हैं। दस-पन्द्रह फुट अंदर जाकर पाते हैं कि पानी दो-तीन फुट से ज़्यादा गहरा नहीं है। हो सकता है आगे एकदम गहरा हो अतः सावधानी ज़रूरी है। मैं भी पानी के अंदर जाता हूँ। मानस का तल साफ है और दिखलाई पड़ता है लेकिन जैसे ही अंदर जाते हैं हमारे पैरों से हिलने पर पानी गंदला हो जाता है। यहाँ उथले जल में डुबकी लगाना असंभव है पर और आगे जाने से डर लगता है अतः यहीं किसी-तरह डुबकी लगा लेते हैं। जल शीतल ही नहीं हड्डियों तक को कँपा देने वाला शीतल है। मानस के इसी शीतल जल में डुबकी लगाने की साध ही तो यहाँ तक खींच कर लाई है फिर डुबकी कैसे न लगे? मानस में डुबकी लगा लेने के बाद बाहर आते हैं। संयोग से मौसम ठीक है। धूप खिली हुई है लेकिन हवा बहुत तेज़ है। वह सदा ही तेज़ होती है। केवल दोपहर में ही मानस में डुबकी लगाएँ। सुबह या शाम के समय भूलकर भी नहीं। यहाँ मौसम बदलते देर नहीं लगती अतः फटाफट डुबकी लगाकर बाहर आएँ और बदन पौंछ कर पूरे कपड़े तथा मोजे-जूते पहन लें। जो कुछ करना है पर्याप्त कपड़े पहनने के बाद ही करें। कपड़े पहनकर किनारे पर ही बैठ जाते हैं तो सामने उत्तर-पश्चिम में दिखलाई पड़ता है उत्तुंग कैलाश शिखर। बर्फ से ढकी चोटी मानो किसी कलाकार द्वारा निर्मित है। कैलाश के इस मनोहारी रूप को निहारता हूँ। देखते-देखते इसका रजत-सा उज्ज्वल गुंबद नीले-स्लेटी रंग में परिवर्तित हो जाता है। इसके रंग को परिवर्तित किया है किसी बादल की परछाई ने। दिन भर ये खेल चलता रहता है। लगता है उस क्षेत्र से गुज़रने वाले हर बादल के मन में ये इच्छा है कि कम से कम एक बार तो कैलाश पर्वत का सान्निध्य पा ही ले। उसके ऊपर से गुज़रते हुए पवित्र कैलाश का मस्तकाभिषेक किसी न किसी रूप में अवश्य करे। चाहे अपने निर्मल जल की तरल बूँदों द्वारा शिखर का प्रक्षालन करके अथवा उसकी छवि को अपनी छाया द्वारा नित नया मौलिक रंग प्रदान करके। अटूट रिश्ता है बादल का कैलाश से और कैलाश का बादलों से। किसी भी कोण से देखें कैलाश की पृष्ठभूमि में सजग प्रहरी-से इर्द-गिर्द मँडराते कुछ बादल अवश्य ही नज़र आएँगे। यहाँ चारों और लगातार परिवर्तन देखने को मिल रहा है। कैलाश शिखर, मानसरोवर और आसपास की पर्वत शृंखलाओं पर ही नहीं मानस-यात्रियों में भी परिवर्तन दिख रहा है। एक परिवर्तन है उनके चेहरों और उनके शरीर की त्वचा में। यहाँ के प्रतिकूल मौसम तथा लगातार तेज़ ठंडी हवा के कारण सभी के चेहरे साँवले पड़ गए हैं। लेकिन इस यात्रा में एक और परिवर्तन भी दृष्टिगोचर होता है और वो परिवर्तन है कि यात्री अपने इस भौतिक परिवर्तन, इस बाह्य परिवर्तन से एकदम निरपेक्ष हैं। उन्हें किसी अन्य परिवर्तन की अपेक्षा है। किसी सकारात्मक स्थायी परिवर्तन की खोज में इतनी दूर चले आए हैं। बाह्य नहीं किसी आंतरिक परिवर्तन के लिए व्याकुलता झलकती है चेहरों से। कुछ किसी चमत्कार के घटित होने की प्रतीक्षा में भी दिखलाई पड़ते हैं तो कुछ अन्य किसी विश्वास से ओतप्रोत दिखलाई पड़ रहे हैं। विश्वास के अभाव में तो ये यात्रा संभव ही नहीं है। झुलसी-झुलसी सी त्वचा, बेतर्तीब बढ़ी हुई खिचड़ी दाढ़ी, उलझे-पुलझे सिर के बाल, अस्त-व्यस्त लेकिन कई-कई परतों में ढेर सारे कपड़े, मोटी-मोटी उफनी और सूती दोनों तरह की जुराबें और जूते, पूरी तरह उफनी कपड़ों से लपेटा हुआ सिर और चेहरा बस किसी तरह भयंकर सर्दी और विषम जलवायु से बच जाएँ। खाने को जो भी मिल रहा है प्रसादवत ग्रहण कर संतुष्ट हैं। यह भी एक परिवर्तन है। परिवर्तन को स्वीकार कर आगे बढ़ते जाना ही तो वास्तविक यात्रा है। जहाँ परिवर्तन को अस्वीकार कर दिया वहीं यात्रा रुक गई समझो। परिवर्तन को स्वीकार कर आगे बढ़ना जीवन-यात्रा का उद्देश्य भी यही होना चाहिये। शाम को सब लोगों ने मानस के किनारे सामूहिक पूजा-अर्चना तथा हवन किया। अधिकांश यात्री पूजा-पाठ की पर्याप्त सामग्री लाए थे। सर्दी बहुत अधिक बढ़ती जा रही थी। बैठना मुश्किल हो रहा था फिर भी बड़े धैर्य के साथ सब पूजा में बैठे रहे। शाम को मानस के किनारे जब हवन कर रहे थे दूर उत्तर-पश्चिम में कैलाश की छवि मन मोह रही थी। कैलाश के पूर्व में अपूर्व लालिमा प्रकट हो रही थी जैसे कोई विशाल यज्ञ हो रहा हो। प्रचण्ड लपटों से उठने वाले प्रकाश के वर्ण की भाँति यह लालिमा धीरे-धीरे अंधकार में विलीन हो गई। पाँच सितंबर को प्रातः उठते ही चाय पीकर नित्य-कर्म से निवृत होने के लिए बाहर चले गए। यहाँ के शौचालय देखने का सौभाग्य नहीं मिल पाया क्योंकि यहाँ बाहर खुले में भी शौच जाने की सुविधा है। जगह-जगह बीयर की खाली बोतलें पड़ी है। बोतल उठा कर साफ करो और पानी भरकर दूर खुले में निपटने के लिए चले जाओ। मैंने देखा मानसरोवर के किनारे-किनारे भी कई जगह गंदगी थी। हमारा परम दायित्व है मानसरोवर की पवित्रता को अक्षुण्ण बनाए रखना और इसके लिए इसके परिवेश की स्वच्छता को बनाए रखना। विश्राम शिविर के ऊपर की तरफ मानस से ५००-६०० मीटर की दूरी पर कहीं भी जा सकते हैं शौचादि े लए। यहाँ के स्थानीय निवासी क्या करते हैं, क्या खाते-पीते हैं तथा कैसे रहते हैं इसका मूल्यांकन तथा स्वयं से उसकी तुलना करना हमारी यात्रा का अभीष्ट नहीं। कैलाश-मानसरोवर यात्रा हमारी अपनी मानस-यात्रा है इसे याद रखना चाहिये। आज मानस परिक्रमा का प्रारंभ है। सुबह दैनिक कर्म से निवृत होने के बाद मानस को देखने की इच्छा हुई। चारों तरफ पहाड़ियाँ और उनके ऊपर घने बादल! बीच में मानस एक कटोरे की तरह प्रतीत हो रही है। इसके किनारे-किनारे दूर निकल गया। हाथों में दस्ताने नहीं पहने थे इसलिए उंगलियाँ बुरी तरह ठिठुर गईं। कैलाश की ओर देखा पर कैलाश दृष्टिगोचर नहीं हुआ क्योंकि कैलाश घने बादलों से एकाकार हो गया था। यहाँ प्रकृति का स्वरूप बहुत परिवर्तनशील है। रंग-रूप, स्थिति सब कुछ पल-पल में परिवर्तनशील। यहाँ के समयानुसार दस बजे हैं। धूप निकल आई है। बादलों की उपस्थिति के कारण धूप-छाँव का खेल चालू हो गया। अगली यात्रा के लिए बस लग चुकी है। सामान रखा जा चुका है। बस चलने ही वाली है। मैं भी बस में बैठने जा रहा हूँ। चिहु से ठूगू के लिए प्रस्थानः चिहु से बस द्वारा मानसरोवर की परिक्रमा प्रारंभ होती है। सारा रास्ता पठारी और कच्चा है। कई स्थानों पर बस अत्यंत धीरे-धीरे चलती है। मानसरोवर झील क्योंकि कई ऊँची-नीची पर्वत- शृंखलाओं की गोद में अवस्थित है अतः इसकी परिक्रमा के दौरान कभी तो किसी पहाड़ या पठारी उच्च भाग के दूसरी ओर से गुज़रना पड़ता है तो कभी झील के बिल्कुल साथ-साथ पहाड़ की ढलान में से गुज़रते हुए आगे बढ़ते हैं। चिहु से ठूगू तक की यात्रा करनी है जिसकी दूरी है ८५ किलोमीटर। रास्ता ऊबड़-खाबड़ तथा ऊँचा-नीचा है। सड़क क्या है बस वाहनों के चलने से लीक-सी पड़ गई हैं। रास्ते में आबादी का नामो-निशान नहीं। कुल मिलाकर होरे नामक स्थान पर थोड़ी आबादी और कुछ दुकानें दिखलाई पड़ीं लेकिन ये सब दुकानें हमारे किसी काम की नहीं। बीच में मानस के किनारे एक मोनेस्ट्री पर भी हमारी बस रुकी। हर मोनेस्ट्री के पास पत्थरों के ढेर पर कुछ रंग-बिरंगी झंडियाँ बँधी हैं जिन पर तिब्बती भाषा में कुछ मंत्र लिखे हैं। इन्हीं के पास किसी जानवर के सिर सींग समेत पड़े हैं। यहाँ के घरों के दरवाज़ों पर भी सींग सहित पशु-मुख टंगे रहते है। पशुओं की अस्थियों और शृंगों के जगह-जगह ढेर लगे हैं। कैसा विरोधभास है कि पवित्र स्थलों पर भी अस्थियों, पशु-मुख तथा शृंगों के अंबार लगे हैं। मोनेस्ट्री के अंदर गये। फोटो खींचने के लिए प्रति स्नैप एक युआन देना पड़ा। सामूहिक दीपक जलाने के लिए भी तीस युआन दिये। कुछ यात्रियों की राय थी कि ये हमारे गाइड और मोनेस्ट्री वालों की साँठ-गाँठ थी। मोनेस्ट्री से बाहर आकर पुनः बस में बैठते हैं और जल्दी ही ठूगू पहुँच जाते हैं। यहाँ ठूगू में हमारा अगला पड़ाव है। यहाँ भी मानस के बिल्कुल किनारे पर एक मोनेस्ट्री है। पास ही यात्रियों के लिए होटलनुमा शिविर है। यहाँ भाषा सबसे बड़ी समस्या है। किसी से बात नहीं कर सकते। इशारों में भी अपनी बात नहीं समझा पाते। यहाँ की भाषा के नाम तक का हमें पता नहीं सिर्फ अनुमान है। यहाँ कोई बोर्ड या सूचना-पट्ट अंग्रेज़ी में नहीं मिलेगा। यहाँ स्कूल जैसी संस्था की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कुछ मूल निवासी जो खानाबदोशों जैसे लगते हैं यहाँ दिखलाई पड़े। यहाँ आसपास कुछ भी पैदा नहीं होता। खेत, कल-कारखाने कुछ भी नहीं। पता नहीं ये लोग कैसे गुज़ारा करते हैं। ये लोग जब पास से गुज़रते हैं तो अजीब-सी गंध आती है। लगता है नहाना-धोना इनके लिए विचित्र बात है। यहाँ मोनेस्ट्री में कई लोगों को घुसते और बाहर निकलते देखा। ये वो लोग हैं जो मानस की परिक्रमा के लिए निकले हैं। हम भी मोनेस्ट्री में गए। तीन लामा बैठे हुए पुस्तकों से किन्हीं मंत्रदि का जाप कर रहे थे। समझ में आने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। आवाज़ उनके गले में बहुत भीतर से तथा नाक से आ रही थी जिससे एक गूँज सी पैदा हो रही थी और साथ ही एक रहस्य की-सी सृष्टि भी। इन्हीं में से एक लामा की इसी परिसर में एक दुकान भी है जहाँ ये स्थानीय तीर्थयात्री खरीददारी भी कर रहे थे। ग्राहक लॉलीपॉप जैसी कोई चीज़ खरीद कर चूस रहे थे। लामा खुद भी चूस रहा था। इस दुकान में भी अजीब गंध थी। यहाँ की सभी दुकानों में एक अजीब-सी गंध व्याप्त रहती है क्योंकि दुकानों पर डिब्बा बंद चीजों के अतिरिक्त बीयर, मदिरा, मांस व सब्ज़ियाँ सब कुछ एक ही जगह बिकता है। |