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| 04.21.2007 |
| स्वगत श्यामल सुमन |
कोई अर्श पे कोई फर्श पे ये तुम्हारी दुनियाँ अजीब है। कहते इसे कोई कर्मफल कोई कह रहा कि नसीब है।। यदि है नसीब तो इस कदर तूने क्यों लिखा ऐ मेरे ख़ुदा। समदर्शिता छूटी कहाँ क्यों अमीर कोई गरीब है।। कहते कि जग का पिता भी तू सारे कर्म तेरे अधीन हैं। नफ़रत की फिर दीवारें क्यों अपना भी लगता रकीब है।। कण कण में बसते हो सुना आधार हो हर ज्ञान का। कोई फिर भला कोई क्यों बुरा तू ही जबकि सबके करीब है।। जीने का हक सबको मिले खुद भी जीये जीने भी दे। काँटों से न कोई दुश्मनी मिले सुमन सबको हबीब है।। |
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