| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 11.15.2008 |
| प्रेम-दीप श्यामल सुमन |
|
अगर तू बूँद स्वाती की, तो मैं इक सीप बन जाऊँ। कहीं बन जाओ तुम बाती, तो मैं इक दीप बन जाऊँ। अँधेरे और नफ़रत को मिटाता प्रेम का दीपक, बनो तुम प्रेम की पाँती, तो मैं इक गीत बन जाऊँ।। तेरी आँखों में गर कोई, मेरी तस्वीर बन जाये। मेरी कविता भी जीने की, नयी तदबीर बन जाये। बड़ी मुश्किल से पाता है कोई दुनियाँ में अपनापन, बना लो तुम अगर अपना, मेरी तक़दीर बन जाये।। भला बेचैन क्यों होता, जो तेरे पास आता हूँ। कभी डरता हूँ मन ही मन, कभी विश्वास पाता हूँ। नहीं है होंठ के वश में जो भाषा नैन की बोले, नैन बोले जो नैना से, तरन्नुम ख़ास गाता हूँ।। कई लोगों को देखा है, जो छुपकर के ग़ज़ल गाते। बहुत हैं लोग दुनियाँ में, जो गिरकर के संभल जाते। इसी सावन में अपना घर जला है क्या कहूँ यारो, नहीं रोता हूँ फिर भी आँख से, आँसू निकल आते।। है प्रेमी का मिलन मुश्किल, भला कैसी रवायत है। मुझे बस याद रख लेना, यही क्या कम इनायत है। भ्रमर को कौन रोकेगा सुमन के पास जाने से, नजर से देख भर लूँ फिर, नहीं कोई शिक़ायत है।। |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|