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| 03.23.2008 |
| फगुनाहट श्यामल सुमन |
| देखो फिर से वसंती हवा आ गयी । तान कोयल की कानों में यूँ छा गयी । कामिनी, मिल खोजें हम रंगीनियाँ ॥ इस कदर डूबी क्यों बाहरी रंग में । रंग भीतर का गहरा पिया संग में । हो छटा फागुनी और घटा जुल्फ की, अब मिलन की तड़प मेरे अंग अंग में । दामिनी, कुछ कर लें हम नादानियाँ ॥ कामिनी, मिल खोजें हम रंगीनियाँ ॥ बन गया हूँ मैं चातक तेरी चाह में । चुन लूँ काँटे पड़े जो तेरी राह में । दूर तन हो भले मन तेरे पास है, मन व्याकुल मेरा तेरी परवाह में । भामिनी, ना देंगे हम कुर्बानियाँ ॥ कामिनी, मिल खोजें हम रंगीनियाँ ॥ मैं भ्रमर बन सुमन पे मचलता रहा । तेरी बाँहों में गिर गिर सँभालता रहा । बिना प्रीतम के फागुन का क्या मोल है, मेरा मन भी प्रतिपल बदलता रहा ॥ मानिनी, फ़िर लिखें कुछ हम कहानियाँ ॥ कामिनी, मिल खोजें हम रंगीनियाँ ॥ |
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