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05.03.2012
 
फगुनाहट
श्यामल सुमन

देखो फिर से वसंती हवा आ गयी ।
तान कोयल की कानों में यूँ छा गयी ।
कामिनी, मिल खोजें हम रंगीनियाँ ॥

इस कदर डूबी क्यों बाहरी रंग में ।
रंग भीतर का गहरा पिया संग में ।
हो छटा फागुनी और घटा जुल्फ की,
अब मिलन की तड़प मेरे अंग अंग में ।
दामिनी, कुछ कर लें हम नादानियाँ ॥
कामिनी, मिल खोजें हम रंगीनियाँ ॥

बन गया हूँ मैं चातक तेरी चाह में ।
चुन लूँ काँटे पड़े जो तेरी राह में ।
दूर तन हो भले मन तेरे पास है,
मन व्याकुल मेरा तेरी परवाह में ।
भामिनी, ना देंगे हम कुर्बानियाँ ॥
कामिनी, मिल खोजें हम रंगीनियाँ ॥

मैं भ्रमर बन सुमन पे मचलता रहा ।
तेरी बाँहों में गिर गिर सँभालता रहा ।
बिना प्रीतम के फागुन का क्या मोल है,
मेरा मन भी प्रतिपल बदलता रहा ॥
मानिनी, फ़िर लिखें कुछ हम कहानियाँ ॥
कामिनी, मिल खोजें हम रंगीनियाँ ॥
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