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03.16.2014


परिवर्तन

लगातार भागती दुनियाँ के पीछे,
लोग भाग रहे हैं लगातार।
इस आपाधापी में भाग रहा हूँ मैं भी,
सार्थक परिवर्तन के लिए।

बदल रही है लगातार ये दुनियाँ,
बदल रहे हैं लोग भी।
मैं भी मजबूर हूँ,
खुद को बदलने के लिए।
लेकिन पता नहीं,
परिवर्तन की दिशा-दशा?
इसी प्रश्न के मूल में छुपी है,
हमारी जिजीविषा।

परिवर्तन तो होते रहेंगे,
लोग भी बदलते रहेंगे,
और बदलेंगी उनकी चाहत भी।
लेकिन चाहत कैसी होगी?
परिवर्तन की दिशा-दशा के,
अनुरूप ही तो होगी।

फिर वही यक्ष-प्रश्न खड़ा है,
मेरे सामने,
कहीं यह दिशाहीन परिवर्तन,
विनाश का कारण तो नहीं?
मानवता के।

यदि हाँ तो क्या मायने हैं,
इस परिवर्तन के?
क्यों भाग रहे हैं लोग बेतहाशा?
इस अंधी दौड़ में,
क्यों मैं भी भाग रहा हूँ,
इस अनसुलझे प्रश्न के उत्तर की तलाश में,
अबतक जाग रहा हूँ।

क्या सिर्फ पिछलग्गू बनना ही,
समाधान है?
व्यवस्था परिवर्तन में यही,
सबसे बड़ा व्यवधान है।।


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