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12.30.2007
 
पहचान
श्यामल सुमन

शक्ल हो बस आदमी का क्या यही पहचान है।
ढूँढता हूँ दर-ब-दर मिलता नहीं इंसान है॥

घाव छोटा या बड़ा एहसास दर्द का एक है।
दर्द एक दूजे का बाटें तो यही एहसान है॥

अपनी मस्ती राग अपना जी लिए तो क्या जीए।
ज़िंदगी, उनको जगाना हक से भी अनजान हैं॥

लूटकर खुशियाँ हमारी अब हँसी वे बेचते।
दीख रहा, वो व्यावसायिक झूठी सी मुस्कान है॥

हार के भी अब सुमन के हार की चाहत उन्हें।
ताज काँटों का न छूटे बस यही अरमान है॥
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