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ISSN 2292-9754

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08.27.2016

खिलौना
श्यामल सुमन

देख के नए खिलौने खुश हो जाता था बचपन में।
बना खिलौना आज देखिये अपने ही जीवन में।।

चाभी से गुड़िया चलती थी बिन चाभी अब मैं चलता।
भाव खुशी के न हो फिर भी मुस्काकर सबको छलता।।
सभी काम का समय बँटा है अपने खातिर समय कहाँ।
रिश्ते नाते संबंधों का बुनते हैं नित जाल यहाँ।।
चेहरा खोज रहा हूँ अपना जा जाकर दर्पण में।
बना खिलौना आज देखिये अपने ही जीवन में।।

अलग थे रंग खिलौने के पर ढंग तो निश्चित था उनका।
रंग ढंग बदला सब अपना लगता है जीवन तिनका।।
मेरे होने का मतलब क्या अबतक समझ न पाया हूँ।।
रोटी से ज्यादा दुनियाँ में ठोकर ही तो खाया हूँ।।
नहीं चाहकर खड़ी हो रहीं दीवारें आँगन में।
बना खिलौना आज देखिये अपने ही जीवन में।।

फेंक दिया करता था बाहर टूटे हुए खिलौने।
सक्षम होकर भी बाहर हूँ बिखरे स्वप्न सलोने।।
अपनापन बाँटा था जैसा वैसा ना मिल पाता है।
अब बगिया से नहीं सुमन का बाजारों से नाता है ।।
खुशबू से ज्यादा बदबू अब फैल रही मधुबन में।
बना खिलौना आज देखिये अपने ही जीवन में।।
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