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ISSN 2292-9754

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08.27.2016

जाल
श्यामल सुमन

जाल मछुए ने, फेंका सलीके से अब।
मछलियाँ फँस न जाएँ, कहीं सबके सब।।

कोशिशें, आशियां चाँद पर भी बने।
हमको डर, चाँदनी कैद हो जाए कब।।

रू-ब-रू बात करने से, घबराते वो।
होशवाले की मैयत हो, मुस्काते तब।।

बात बातों से बन जाए, तो बात है।
बात बिगड़े, नहीं बात सुनते वे जब।।

बिक रहीं, आज कलियाँ हीं बाजार में।
होगा फिर क्या, सुमन का बता मेरे रब।।
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