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11.15.2008
 
हसरत
श्यामल सुमन

ज़िंदगी के भले दिन हैं कम ही तो क्या, हसरतें हों बड़ी और लगन चाहिए।
दिल की चाहत ही ख़्वाबों में ढलती सदा, ऐसे ख़्वाबों को धरती गगन चाहिए॥

ठोकरों से भरी ज़िंदगी का सफर, है सिखाती हमें नित नए फ़लसफ़े।
यदि जीने की ताक़त चुभन से मिले, फ़िर तो काँटा वही आदतन चाहिए॥

जो न सोचा वही आज क्यों हो रहा, साजिशें चल रहीं हैं यहाँ से वहाँ।
आज फटते हैं आँचल कफ़न के लिए, नहीं ऐसा किसी को कफ़न चाहिए॥

आग कैसे लगी है ये किसको पता, मगर सच है की कुछ झोंपड़े जल गए।
जिसकी साजिश उसी ने बनाया महल, नहीं ऐसा हमें फिर चमन चाहिए॥

अब इशारों पे चलती वसंती हवा, फिर सुमन क्या करे ये तो सोचो ज़रा।
बैठ चुपचाप रहना भी मुमकिन नहीं, है बदलना तो दिल में अगन चाहिए॥
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